संपादकीय:
अंत समय की पीड़ा — शब्दों का सम्राट और संपत्ति का सम्राट, दोनों ही असहाय
जब हम जीवन को “सफलता” के तराजू पर तौलते हैं, तो अक्सर दो पैमाने सामने रखते हैं—ज्ञान और धन।लेकिन हाल की दो घटनाएँ इस भ्रम को तोड़ देती हैं कि इनमें से कोई भी मनुष्य को अंततः संतुष्टि दे सकता है।एक ओर K. N. खंडेलवाल—500 से अधिक पुस्तकों के रचनाकार, पद्मश्री से सम्मानित, शब्दों के साधक।
दूसरी ओर विजय पति—हजारों करोड़ के औद्योगिक साम्राज्य के स्वामी, रेमंड ग्रुपके शिखर पुरुष। दोनों की यात्राएँ भिन्न थीं, लेकिन अंत की पीड़ा—वह कहीं न कहीं एक ही धागे से बंधी प्रतीत होती है।
ज्ञान का शिखर, भीतर का सूनापन,के.एन. खंडेलवाल—जिनके शब्दों ने समाज को दिशा दी,जिनकी लेखनी ने सैकड़ों पुस्तकों में विचारों का अमृत बहाया—उनके जीवन के अंतिम क्षणों में यदि कोई पीड़ा रही होगी, तो वह यह प्रश्न रहा होगा—“जिस समाज को इतना दिया, क्या वही समाज मेरे अकेलेपन को समझ पाया?”ज्ञान व्यक्ति को महान बनाता है,लेकिन वह मानवीय स्पर्श का विकल्प नहीं बन सकता।
धन का शिखर, रिश्तों का पतन,विजयपत सिंघानिया—जिन्होंने उद्योग की दुनिया में एक साम्राज्य खड़ा किया,जिनके नाम से “ब्रांड” बनते थे,लेकिन अंत समय में वही व्यक्ति जब अपने ही घर में अधिकार और सम्मान के लिए संघर्ष करता दिखे, तो यह प्रश्न उठता है“क्या 11,000 करोड़ रुपये भी एक सम्मानजनक संबंध खरीद नहीं सके?”
तुलनात्मक पीड़ा: दो छोर, एक ही शून्य पक्ष के.एन. खंडेलवालविजयपत सिंघानियाउपलब्धि500+ पुस्तकें, पद्मश्री,11,000 करोड़ का साम्राज्य,पहचान,बौद्धिक और साहित्यिक,आर्थिक और औद्योगिक
अंत समय की चुनौती,सामाजिक/भावनात्मक अकेलापन,पारिवारिक संघर्ष और अधिकार की लड़ाईमूल पीड़ा“समझे जाने” की कमी सम्मान मिलने” की कमीदोनों के पास वह सब था, जिसे दुनिया “सफलता” कहती है—लेकिन अंततः दोनों एक ही प्रश्न के सामने खड़े दिखते हैं—“क्या मैंने सच में जीवन जीया, या केवल उपलब्धियाँ जोड़ीं?”
समाज के लिए सबसे बड़ा सबक,इन दोनों जीवनों को साथ रखकर देखें, तो एक कठोर सत्य सामने आता हैज्ञान आपको महान बना सकता है,धन आपको शक्तिशाली बना सकता है,लेकिनरिश्ते और संवेदनाएँ ही आपको “पूर्ण” बना सकते हैं।
: सफलता की पुनर्परिभाषा,“अंत समय में न शब्द साथ जाते हैं, न संपत्ति—साथ जाता है केवल अपनापन।”के.एन. खंडेलवाल और विजयपत सिंघानिया—ये दो नाम नहीं, बल्कि दो आईने हैं,जो हमें यह दिखाते हैं कियदि जीवन की दौड़ में हम “मनुष्य” को ही पीछे छोड़ दें, तो जीत भी हार जैसी लगती है।यह केवल संपादकीय नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—सफलता की परिभाषा बदलनी होगी, वरना हर अंत एक अधूरी कहानी बन जाएगा।

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