धर्म संवाद में गूंजा सनातन का संदेश
कथित शंकराचार्य की सभा बनी समाजवादी पार्टी की मंच
बस्ती,29 मार्च
धर्मानुकूल जीवन ही कल्याण का मार्ग: शंकराचार्य का उद्बोधन, सभा में भीड़ ने किया किनारा
बस्ती के राजकीय इंटर कॉलेज में रविवार को राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा द्वारा आयोजित ‘सनातन धर्म संवाद’ कार्यक्रम में ज्योतिष्मठ पीठाधीश्वर कथित शंकराचार्य ने धर्म के मूल स्वरूप और उसके जीवन में महत्व पर गहन प्रकाश डाला। कार्यक्रम में अपेक्षा कृत भीड़ नदारद थी
बुद्धिजीवी और जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे, जिससे पूरा परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा।
धर्म ही उत्थान का आधार,अपने संबोधन में शंकराचार्य ने स्पष्ट कहा कि “धर्म के बिना किसी भी स्तर पर कल्याण संभव नहीं है।” उन्होंने व्यक्ति, समाज और राष्ट्र—तीनों के विकास के लिए धर्म को अनिवार्य बताया। उनके अनुसार, धर्म वह तत्व है जो मनुष्य को ऊँचा उठाता है, जबकि अधर्म पतन की ओर ले जाता है।
राष्ट्र की नई व्याख्या,राष्ट्र धर्म पर पूछे गए प्रश्न का उत्तर देते हुए शंकराचार्य ने राष्ट्र की व्यापक व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी संस्कृति, परंपरा और जीवन पद्धति का विस्तार है।“राष्ट्र हम हैं, राष्ट्र आप हैं”— इस कथन के माध्यम से उन्होंने हर व्यक्ति को राष्ट्र धर्म के पालन का दायित्व याद दिलाया।
सम्मान और परिवर्तन के क्षण,कार्यक्रम के दौरान कई महत्वपूर्ण घोषणाएं भी हुईं—राष्ट्रीय अधिकार मोर्चा के संस्थापक अलंकार अग्निहोत्री का नाम परिवर्तित कर ‘धर्मा अलंकार अग्निहोत्री’ रखा गया ,वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल मिश्रा को ‘धर्मभूषण’ की उपाधि से सम्मानित किया गया।
जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति,इस अवसर पर पूर्व विधायक कुशल तिवारी, सपा विधायक कविंद्र उर्फ अतुल चौधरी ,पूर्व विधायक राजमणि पांडे, सांपा नेता दयाशंकर मिश्रसहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम में आम जनता की भारी भीड़ ने यह स्पष्ट कर दिया कि बस्ती में धर्म और संस्कृति के प्रति लोगों की गहरी आस्था है।
यह आयोजन केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज में सांस्कृतिक चेतना और नैतिक मूल्यों के पुनर्स्मरण का एक सशक्त प्रयास बनकर सामने आया। शंकराचार्य का संदेश स्पष्ट है—यदि जीवन को दिशा देनी है, तो धर्म को अपनाना ही होगा।
आज का शंकराचार्य का मंच समाजवादी पर्टी की राजनीतिक सभा के अतिरिक्त और कुछ नहीं था।
संख्या बल अत्यंत कमजोर और संदेश देने में विफल रहे शंकराचार्य ।

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