अधोमानक प्लास्टिक से हारता बस्ती का प्रबुद्ध समाज — एक चिंताजनक विडंबना
बस्ती, उत्तरप्रदेश, 272001,राजेंद्र नाथ तिवारी, प्रमुख सम्पादक, कौटिल्य का भारत, 18मार्च 26
बस्ती जैसे सांस्कृतिक और बौद्धिक रूप से समृद्ध जनपद में आज एक विचित्र और चिंताजनक स्थिति दिखाई दे रही है। यहाँ का प्रबुद्ध समाज, जो कभी सामाजिक चेतना, स्वच्छता और सार्वजनिक हित के मुद्दों पर अग्रणी भूमिका निभाता था, आज अधोमानक प्लास्टिक के बढ़ते प्रयोग के सामने लगभग असहाय दिखाई दे रहा है। यह केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं है, बल्कि सामाजिक चेतना और जिम्मेदारी का भी गंभीर विषय है।
प्लास्टिक का प्रयोग आधुनिक जीवन का हिस्सा बन चुका है, लेकिन जब यह प्रयोग अनियंत्रित और अधोमानक हो जाता है, तब यह समाज और प्रकृति दोनों के लिए घातक सिद्ध होता है। बस्ती में बाजारों, सब्जी मंडियों, मिठाई की दुकानों और छोटे व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर सस्ती और घटिया प्लास्टिक की थैलियों का खुलेआम प्रयोग हो रहा है। प्रशासन द्वारा समय-समय पर प्रतिबंध और जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं, फिर भी यह प्रवृत्ति थमने का नाम नहीं ले रही।
विडंबना यह है कि इस समस्या के प्रति सबसे अधिक जागरूक होने की अपेक्षा जिस वर्ग से की जाती है—अर्थात् शिक्षक, अधिवक्ता, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षित नागरिक—वही वर्ग भी इस अधोमानक प्लास्टिक के उपयोग को रोकने में प्रभावी भूमिका नहीं निभा पा रहा है। कई बार तो यही वर्ग सुविधा के नाम पर प्लास्टिक के उपयोग को स्वीकार कर लेता है। इससे समाज में एक गलत संदेश जाता है कि यदि पढ़े-लिखे लोग ही इस विषय पर गंभीर नहीं हैं, तो सामान्य जनता से क्या अपेक्षा की जाए।
अधोमानक प्लास्टिक केवल पर्यावरण को ही नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य को भी गंभीर रूप से प्रभावित करता है। जब यही प्लास्टिक खाद्य पदार्थों के संपर्क में आता है, तो इससे निकलने वाले रसायन शरीर के लिए हानिकारक होते हैं। यह प्लास्टिक नालियों को जाम करता है, जिससे बरसात के समय जलभराव की समस्या उत्पन्न होती है। खेतों और जल स्रोतों में पहुँचकर यह मिट्टी की उर्वरता को भी प्रभावित करता है। धीरे-धीरे यह माइक्रोप्लास्टिक के रूप में खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर जाता है।
प्रशासनिक स्तर पर प्रतिबंध और दंड का प्रावधान अवश्य है, लेकिन केवल दंड से समस्या का समाधान नहीं हो सकता। जब तक समाज का प्रबुद्ध वर्ग स्वयं आगे बढ़कर उदाहरण प्रस्तुत नहीं करेगा, तब तक इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। विद्यालयों, सामाजिक संगठनों और नागरिक मंचों को मिलकर एक व्यापक जागरूकता अभियान चलाना होगा। कपड़े या कागज के थैलों का उपयोग बढ़ाना होगा और व्यापारियों को भी इस दिशा में प्रेरित करना होगा।
बस्ती का प्रबुद्ध समाज यदि सचमुच अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को समझे और छोटे-छोटे व्यवहारिक बदलाव अपनाए, तो अधोमानक प्लास्टिक के उपयोग को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यह केवल पर्यावरण संरक्षण का ही प्रश्न नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य का भी विषय है।
अंततः प्रश्न यही है कि क्या बस्ती का प्रबुद्ध समाज अपनी सुविधा से ऊपर उठकर समाज और प्रकृति के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करेगा, या फिर अधोमानक प्लास्टिक के सामने अपनी हार स्वीकार करता रहेगा। यही इस समय का सबसे बड़ा सामाजिक प्रश्न?

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