बस्ती मंडल की मरती नदियाँ — प्रशासन और समाज से 10 कठोर प्रश्न
कभी जिन नदियों ने पूर्वांचल की धरती को जीवन दिया, आज वही नदियाँ स्वयं जीवन के लिए संघर्ष कर रही हैं। बस्ती मंडल की धरती पर बहने वाली सरयू, राप्ती ,कुंवानो , मनोरमा और आमी कभी इस क्षेत्र की जीवनरेखा थीं।
आज इन नदियों की स्थिति देखकर यह प्रश्न उठता है कि आखिर विकास के इस दौर में हमारी जीवनदायिनी नदियाँ इतनी उपेक्षित क्यों हैं?यह केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं है; यह हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता और हमारे भविष्य का प्रश्न है।
प्रशासन से पहला प्रश्न,नदियों की सफाई और संरक्षण के नाम पर हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। तो फिर क्यों इन नदियों का पानी आज भी काला और दूषित दिखाई देता है?
दूसरा प्रश्न,,शहरों के गंदे नाले सीधे नदियों में क्यों गिराए जा रहे हैं?क्या सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट केवल कागजों में ही मौजूद हैं?
तीसरा प्रश्न,,नदियों के किनारों पर अवैध अतिक्रमण लगातार बढ़ रहा है।आखिर प्रशासन की नजर इस पर क्यों नहीं पड़ती?
चौथा प्रश्न,,रेत खनन ने नदियों के प्राकृतिक स्वरूप को बुरी तरह प्रभावित किया है।क्या यह खनन नियमों के अनुसार हो रहा है या केवल राजस्व का साधन बन गया है?
पाँचवाँ प्रश्न,,नदियों के किनारे वृक्षों की अंधाधुंध कटाई क्यों हो रही है?
क्या पर्यावरण संरक्षण केवल भाषणों तक सीमित रह गया है?
छठा प्रश्न,,गाँवों और शहरों का कूड़ा सीधे नदी में फेंका जा रहा है।क्या इसके लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं बनाई जा सकती?
सातवाँ प्रश्न,,स्कूलों और कॉलेजों में पर्यावरण शिक्षा दी जाती है, पर क्या वास्तव में युवाओं को नदियों के संरक्षण के लिए प्रेरित किया जा रहा है?आठवाँ प्रश्न
जब कोई नदी सूखने लगती है या प्रदूषण बढ़ता है, तब प्रशासनिक तंत्र क्यों मौन हो जाता है?
नौवाँ प्रश्न,,क्या स्थानीय जनप्रतिनिधियों के लिए यह मुद्दा महत्वपूर्ण नहीं है?
क्या चुनावी भाषणों में पर्यावरण केवल एक औपचारिक शब्द बनकर रह गया है?
दसवाँ और सबसे बड़ा प्रश्न,,क्या हम सचमुच नदियों को बचाना चाहते हैं, या केवल उनके नाम पर योजनाएँ बनाकर संतोष कर लेते हैं?
समाधान क्या है?नदियों को बचाने के लिए केवल सरकार या प्रशासन जिम्मेदार नहीं है; समाज की भी उतनी ही भूमिका है।नदियों में कूड़ा डालना बंद करना होगा
तटों पर वृक्षारोपण करना होगाअवैध खनन और अतिक्रमण पर सख्त कार्रवाई करनी होगी,और सबसे महत्वपूर्ण — नदियों को केवल संसाधन नहीं बल्कि जीवनदायिनी धरोहर मानना होगा।अंतिम चेतावनी-यदि आज हमने नदियों की पुकार नहीं सुनी, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ नहीं करेंगी।क्योंकि जब नदियाँ मरती हैं तो केवल जलधारा नहीं रुकती —एक पूरी सभ्यता की साँस रुक जाती है।

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