राजनीति : लोकनीति से प्रेत छाया तक की यात्रा
राजनीति का मूल स्वरूप भारतीय परंपरा में लोककल्याण से जुड़ा रहा है। ‘राजनीति’ शब्द ही इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि राज्य का संचालन ऐसी नीति के अनुसार हो जो समाज के समग्र हित को साधे। भारतीय चिंतन में राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि लोकसेवक माना गया है। प्राचीन ग्रंथों में ‘राजधर्म’ का उल्लेख इसी भावना का विस्तार है। महर्षि कणाद, मनु, शुक्राचार्य और चाणक्य जैसे मनीषियों ने राजनीति को लोककल्याण का साधन माना। किंतु समय की धारा में यह लोकनीति धीरे-धीरे विकृत होती गई और आज अनेक स्थानों पर राजनीति लोकनीति के स्थान पर प्रेत छाया की तरह समाज पर मंडराती दिखाई देती है।
भारतीय परंपरा में राजनीति का अर्थ सत्ता प्राप्ति मात्र नहीं था। सत्ता तो केवल साधन थी, उद्देश्य था – धर्म, न्याय और लोकमंगल की स्थापना। महाभारत में भीष्म ने युधिष्ठिर को उपदेश देते हुए कहा था कि राज्य का संचालन करते समय राजा को अपने व्यक्तिगत सुख-दुख से ऊपर उठकर प्रजा के हित को सर्वोपरि रखना चाहिए। इसी भावभूमि पर भारतीय राजनीति की नींव पड़ी थी।प्राचीन भारत के राजाओं को ‘राजऋषि’ कहा गया। इसका अर्थ यह था कि शासन करने वाला व्यक्ति तप, संयम और नैतिकता से संपन्न हो। श्रीराम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहा गया क्योंकि उन्होंने सत्ता को अधिकार नहीं, बल्कि दायित्व माना। उनका राज्य ‘रामराज्य’ कहलाया, जहाँ न्याय, समता और लोककल्याण का वातावरण था। यह भारतीय लोकनीति का सर्वोच्च आदर्श था।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी राजनीति को राज्य और समाज के संतुलित विकास का उपकरण माना गया है। कौटिल्य ने स्पष्ट कहा कि राजा का सुख प्रजा के सुख में और राजा का हित प्रजा के हित में निहित है। यह कथन भारतीय राजनीतिक दर्शन का मूल सूत्र है। यहाँ सत्ता का लक्ष्य व्यक्तिगत वैभव नहीं बल्कि सामाजिक संतुलन और राष्ट्रीय शक्ति का निर्माण था।किन्तु इतिहास की धारा में जब राजनीति का केंद्र लोकहित से हटकर स्वार्थ और सत्ता की लालसा बन गया, तब राजनीति का स्वरूप बदलने लगा। विदेशी आक्रमणों और औपनिवेशिक शासन ने भारतीय राजनीतिक संरचना को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। अंग्रेजों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाकर समाज को जाति, धर्म और वर्ग के आधार पर विभाजित किया। राजनीति का उद्देश्य लोककल्याण के स्थान पर सत्ता की चालबाज़ियों में उलझता गया।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राजनीति पुनः लोकनीति के स्वरूप में उभरी। महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, सुभाषचंद्र बोस और भगत सिंह जैसे नेताओं ने राजनीति को राष्ट्रीय मुक्ति और सामाजिक जागरण का माध्यम बनाया। उस समय राजनीति में त्याग, आदर्श और राष्ट्रभक्ति का अद्भुत संगम दिखाई देता था। नेताओं के लिए सत्ता कोई लक्ष्य नहीं बल्कि स्वतंत्रता का साधन थी।किन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद धीरे-धीरे राजनीति का चरित्र बदलने लगा। लोकतंत्र की स्थापना के साथ सत्ता की होड़ भी तीव्र हो गई। चुनावी राजनीति ने सिद्धांतों के स्थान पर समीकरणों को महत्व देना शुरू किया। जाति, धर्म और क्षेत्रीयता के आधार पर वोट बैंक की राजनीति पनपने लगी। धीरे-धीरे राजनीति का आदर्शवादी स्वरूप धूमिल होता गया।
यहीं से राजनीति की वह यात्रा आरंभ होती है जिसे ‘लोकनीति से प्रेत छाया तक की यात्रा’ कहा जा सकता है। जब राजनीति लोकसेवा के बजाय निजी स्वार्थ, भ्रष्टाचार और अवसरवाद का माध्यम बन जाती है, तब वह समाज के लिए कल्याणकारी शक्ति नहीं रहती बल्कि भयावह छाया बन जाती है।आज अनेक स्थानों पर राजनीति का स्वरूप ऐसा दिखाई देता है जिसमें सिद्धांतों की जगह अवसरवाद और आदर्शों की जगह प्रचार ने ले ली है। चुनाव जीतना ही अंतिम लक्ष्य बन गया है। इसके लिए झूठे वादे, भावनात्मक उकसावे और सामाजिक विभाजन तक का सहारा लिया जाता है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती है।
राजनीति में धनबल और बाहुबल का बढ़ता प्रभाव भी चिंता का विषय है। जब चुनावी प्रक्रिया अत्यधिक महंगी हो जाती है, तब ईमानदार और सिद्धांतनिष्ठ व्यक्ति राजनीति से दूर होने लगते हैं। परिणामस्वरूप राजनीति में ऐसे तत्व प्रवेश कर जाते हैं जिनका उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्ति और व्यक्तिगत लाभ होता है।इसके साथ ही राजनीतिक विमर्श का स्तर भी गिरता गया है। स्वस्थ बहस और वैचारिक संवाद के स्थान पर व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप और कटुता का वातावरण बन गया है। संसद और विधानसभाओं में भी कई बार वह गरिमा दिखाई नहीं देती जिसकी अपेक्षा लोकतांत्रिक संस्थाओं से की जाती है।
राजनीति की इस विकृत अवस्था को ही ‘प्रेत छाया’ कहा जा सकता है। प्रेत छाया वह स्थिति है जिसमें वास्तविकता के स्थान पर भय, भ्रम और स्वार्थ का अंधकार फैल जाता है। जब राजनीति समाज को जोड़ने के बजाय विभाजित करने लगती है, जब सत्ता सेवा के बजाय शोषण का साधन बन जाती है, तब वह लोकनीति नहीं रहती।फिर भी यह निराशा का अंतिम बिंदु नहीं है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि उसमें आत्मसुधार की क्षमता होती है। समाज यदि सजग और जागरूक हो तो राजनीति को पुनः लोकनीति के मार्ग पर लाया जा सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों के प्रति भी सचेत रहें।
राजनीति को स्वस्थ बनाने के लिए नैतिकता, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की भावना को मजबूत करना होगा। राजनीतिक दलों को भी यह समझना होगा कि सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन राष्ट्र और समाज स्थायी होते हैं। यदि राजनीति समाज का विश्वास खो देगी तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हो जाएँगी।भारतीय संस्कृति में राजनीति को कभी भी केवल शक्ति का खेल नहीं माना गया। यहाँ राजनीति को धर्म और नैतिकता से जोड़ा गया है। ‘राजधर्म’ का अर्थ ही है – न्याय, करुणा और लोककल्याण के साथ शासन करना। यदि आधुनिक राजनीति इस मूल भावना को पुनः स्वीकार कर ले तो वह फिर से लोकनीति के रूप में स्थापित हो सकती है।
इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति को पुनः मूल्य आधारित बनाया जाए। युवा पीढ़ी को राजनीति से विमुख होने के बजाय उसमें सकारात्मक भागीदारी करनी चाहिए। जब राजनीति में आदर्शवादी और राष्ट्रनिष्ठ व्यक्तियों की संख्या बढ़ेगी, तब प्रेत छाया का अंधकार स्वतः समाप्त हो जाएगा।अंततः यह कहना उचित होगा कि राजनीति स्वयं में न तो पवित्र होती है और न ही अपवित्र। उसका स्वरूप इस बात पर निर्भर करता है कि उसे संचालित करने वाले लोग किस प्रकार के मूल्य और उद्देश्य लेकर आते हैं। यदि राजनीति लोककल्याण की भावना से प्रेरित होगी तो वह लोकनीति बनेगी, और यदि वह स्वार्थ और छल से प्रेरित होगी तो प्रेत छाया में बदल जाएगी।
आज भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है कि वह राजनीति को पुनः लोकनीति के मार्ग पर स्थापित करे। जब यह परिवर्तन होगा, तब राजनीति समाज के लिए भय नहीं बल्कि आशा और विकास का माध्यम बनेगी। तभी लोकतंत्र अपने वास्तविक अर्थ में सफल हो सकेगा और राष्ट्र प्रगति के नए आयाम स्थापित हो सकेगा!

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