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मंगलवार, 3 मार्च 2026

“समय किसी का इंतज़ार नहीं करता—क्या भारत तैयार है?”

 


नवसंवत्सर 2083: कालचक्र पर खड़ा भारत और @2047 की दिशा

भारत में नया वर्ष केवल तिथि परिवर्तन नहीं -समय के साथ आत्मा का संवाद है।

जब विक्रम संवत का नया संवत प्रारंभ होता है, तो वह हमें स्मरण कराता है कि भारत की सभ्यता समय को केवल मापती नहीं, उसे जीती है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा-जिस दिन से नवसंवत्सर आरंभ होता है-भारतीय परंपरा में सृष्टि-आरंभ का प्रतीक है। महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा, दक्षिण में उगादि, उत्तर भारत में चैत्र नवरात्रि-ये सब केवल पर्व नहीं, राष्ट्रचेतना के उत्सव हैं। आज जब भारत 2047 की ओर अग्रसर है, तो यह नवसंवत्सर केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं-यह राष्ट्रीय संकल्प का क्षण है।

समय का भारतीय दर्शन: रेखा नहीं, चक्र:पश्चिम का समय रेखीय है—बीता हुआ अतीत, वर्तमान और अनिश्चित भविष्य।भारत का समय चक्राकार है-युगों का आवर्तन, अनुभव का पुनर्जन्म।

कालचक्रे प्रवर्तन्ते राष्ट्राणां भाग्यरेखिकाः।

यः सजाग्रत एवास्तेस विजयी भवेद् ध्रुवम्॥

अर्थात राष्ट्रों की भाग्यरेखाएँ कालचक्र में घूमती रहती हैं; जो सजग रहता है वही विजयी होता है। भारत के लिए यह सजगता क्या है?यह है-इतिहास का बोध, वर्तमान का विवेक और भविष्य का साहस।सांस्कृतिक पुनर्जागरण: भारत की आत्मा का पुनर्प्रकाश ,भारत की शक्ति उसकी अर्थव्यवस्था से पहले उसकी संस्कृति है।जब तक भारतीय समाज अपनी जड़ों से जुड़ा है, तब तक कोई शक्ति उसे पराजित नहीं कर सकती।

योग, आयुर्वेद, गीता, रामायण, महाभारत—ये केवल ग्रंथ नहीं, राष्ट्र-मन के स्तंभ हैं।

यत्र वेदा प्रबोधाय यत्र गीता प्रकाशिका।

तदेव राष्ट्रं भवति दीप्यमानं जगत्तले॥

जहाँ वेद जागृति देते हैं और गीता प्रकाश देती है, वही राष्ट्र विश्व में प्रकाशित होता है।आज विश्व मानसिक तनाव, पर्यावरण संकट और नैतिक शून्यता से जूझ रहा है।भारत का भविष्य इसी में है कि वह अपनी ज्ञान-परंपरा को आधुनिक संदर्भों में पुनः प्रस्तुत करे।डिजिटल भारत: तकनीक और नैतिकता का संतुलन भारत विश्व की सबसे बड़ी डिजिटल लोकतांत्रिक शक्ति बन चुका है।आधार, डिजिटल भुगतान, स्टार्टअप क्रांति—ये केवल आर्थिक उपकरण नहीं, प्रशासनिक क्रांति के संकेत हैं।

परंतु प्रश्न है-क्या तकनीक नैतिकता से जुड़ी है?

विज्ञानं यदि धर्मेण संयुक्तं स्यात् सुदृढं भवेत्।

विनाऽधर्मं तु तद् सर्वं नाशायैवोपकल्पते॥

विज्ञान यदि धर्म (नैतिकता) से जुड़ा हो तो सुदृढ़ होता है; अन्यथा विनाश का कारण बनता है।भारत का भविष्य इस संतुलन में है-डिजिटल शक्ति, पर मानवीय संवेदना के साथ। भू-राजनीतिक भारत: बाज़ार नहीं, नीति-निर्माता।21वीं सदी का भारत केवल उपभोक्ता बाज़ार नहीं रहेगा। वह नीति-निर्माता के रूप में उभरेगा-ऊर्जा, रक्षा, सेमीकंडक्टर, वैश्विक दक्षिण की आवाज़ के रूप में।भारत की विदेश नीति आज संतुलन का उदाहरण है-न किसी का उपनिवेश, न किसी का विरोधी; बल्कि स्वाधीन ध्रुव।

न परतन्त्रता शोभा न च भीतिः कथंचन।

स्वधर्मे स्थितिमापन्नं राष्ट्रं भवति भूषणम्॥

न परतंत्रता शोभा देती है, न भय; जो राष्ट्र अपने स्वधर्म में स्थित होता है वही भूषण बनता है।

युवा शक्ति: 2047 का निर्धारक तत्व:भारत की सबसे बड़ी संपत्ति उसकी युवा जनसंख्या है।यदि यह शक्ति कौशल, अनुशासन और राष्ट्रचेतना से जुड़ गई—तो 2047 का भारत केवल महाशक्ति नहीं, जगतगुरु होगा।

उत्तिष्ठत जाग्रत वीराः स्वकर्तव्ये निवेशिताः।

नवसंवत्सरसंयुक्ताः भवतु भारतं जयम्॥

उठो, जागो, वीर बनो और अपने कर्तव्य में लगो; नवसंवत्सर के साथ भारत विजय प्राप्त करे।

नवसंवत्सर का त्रिसंकल्प:संस्कृति की जड़ों को सुदृढ़ करना,प्रौद्योगिकी को राष्ट्रहित में साधनान्यायपूर्ण, आत्मनिर्भर और नैतिक भारत का निर्माण 

शुभं भवतु राष्ट्राय कल्याणं भूयात् प्रजासु च।

नवसंवत्सरे संकल्पः जयतु भारतं सदा॥

नया वर्ष केवल आतिशबाज़ी का शोर नहीं-यह आत्मा की आहट है। संवत बदलता है, पर प्रश्न वही रहता है-क्या हम समय के साथ चल रहे हैं, या समय हमें पीछे छोड़ रहा है?यदि भारत अपनी परंपरा, प्रौद्योगिकी और नीति-तीनों को एक सूत्र में बाँध सका,तो आने वाला दशक “भारत का दशक” होगा।और तब इतिहास लिखेगा-नवसंवत्सर 2083 वह मोड़ था, जहाँ भारत ने स्वयं को पुनः पहचाना।

यही भारतीय जनमानस को मां भारती व नियति से अभिप्रेत है।


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