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मंगलवार, 10 मार्च 2026

“पाप कमाओ, कथा कराओ और मोक्ष पाओ”

 मोक्ष लिमिटेड : पाप, पैसा, राजनीति और संतों की मार्केटिंग

“पाप कमाओ, कथा कराओ और मोक्ष पाओ”

संत, सत्ता और संपत्ति : मोक्ष का नया उद्योग”

(सामयिक व्यंग / अग्रलेख)

हमारे समय की सबसे बड़ी आध्यात्मिक उपलब्धि यह है कि मोक्ष अब तपस्या का विषय नहीं रहा, बल्कि व्यवस्था, संपर्क और प्रबंधन का विषय बन गया है।पहले लोग जंगलों में तप करते थे, आत्मसंयम रखते थे, और जीवन भर सत्य की साधना करने के बाद कहीं जाकर मोक्ष की चर्चा करते थे।

अब मोक्ष का रास्ता कुछ सरल हो गया है ,बस आपके पास धन होना चाहिए, थोड़ी राजनीतिक पहुँच होनी चाहिए और कोई प्रतिष्ठित संत आपकी आध्यात्मिक ब्रांडिंग कर दे।आज समाज में एक नया समीकरण दिखाई देता है,राजनीति, धन और आध्यात्मिकता का त्रिकोण।राजनेताओं को मोक्ष की उतनी चिंता नहीं होती जितनी छवि सुधार की होती है।

क्योंकि जनता की स्मृति कमजोर होती है, पर धर्मसभा की तस्वीरें बहुत काम आती हैं।इसलिए चुनाव के पहले अचानक अनेक राजनेता बड़े-बड़े संतों के चरणों में दिखाई देने लगते हैं।माथे पर चंदन, गले में रुद्राक्ष और हाथ में माला,जैसे देश की राजनीति नहीं, बल्कि कोई महान तपस्या चल रही हो।कल तक जो व्यक्ति मंचों पर गरज-गरज कर विरोधियों को कोस रहा था,वही आज किसी आश्रम में शांत मुद्रा में बैठकर आशीर्वाद ले रहा होता है।

यह दृश्य बड़ा रोचक होता है।संत समाज त्याग की महिमा सुना रहा होता है,और सामने बैठे नेता अगले चुनाव के लिए आशीर्वाद का निवेश कर रहे होते हैं।धनवान उद्योगपति भी इस आध्यात्मिक गठबंधन का आवश्यक अंग हैं।वे जानते हैं कि राजनीति से निकटता और संतों का आशीर्वाद—दोनों साथ हों तो समाज में प्रतिष्ठा स्वतः बढ़ जाती है।

इसलिए बड़े-बड़े धार्मिक आयोजनों में अक्सर एक ही मंच पर तीनों दिखाई देते हैं,संत, उद्योगपति और नेता।संत त्याग का उपदेश देते हैं,उद्योगपति दान की घोषणा करते हैं,और नेता समाज सेवा का संकल्प लेते हैं।फिर अखबारों में तस्वीर छपती है—“धर्म और समाज के महान सेवक।”इस पूरे आयोजन में मोक्ष कहीं पीछे छूट जाता है।क्योंकि यहाँ असली उद्देश्य मोक्ष नहीं, प्रतिष्ठा की पॉलिश होता है।आज आध्यात्मिकता भी एक प्रकार का सार्वजनिक संबंध (Public Relations) बन गई है।जिसके पास जितना बड़ा पंडाल, उतनी बड़ी कथा,जिसके मंच पर जितने बड़े संत और जितने बड़े नेता—उसकी आध्यात्मिक प्रतिष्ठा उतनी ही ऊँची मानी जाती है।

पर इस पूरे दृश्य में सबसे बड़ा व्यंग यह है कि जिन ऋषियों ने धर्म और मोक्ष की अवधारणा दी थी,वे सत्ता और धन से दूरी बनाकर रखते थे।उनके आश्रमों में न बड़े पंडाल थे,न दानदाताओं की वीआईपी पंक्ति।वहाँ केवल एक प्रश्न होता था—तुम्हारे जीवन में सत्य कितना है?आज यह प्रश्न पूछने का साहस बहुत कम लोग करते हैं।क्योंकि यदि सचमुच यह प्रश्न पूछ लिया जाए तोधनवान, नेता और आध्यात्मिक ब्रांड—तीनों असहज हो सकते हैं।इसलिए सब कुछ बड़े सौहार्द से चल रहा है

राजनीति अपना काम कर रही है,धन अपना प्रभाव दिखा रहा है,और संत समाज अपनी मार्केटिंग में व्यस्त है।और मोक्ष?मोक्ष शायद कहीं शांत बैठा यह दृश्य देख रहा हैऔर सोच रहा है—जिसे पाने के लिए मनुष्य को अहंकार त्यागना चाहिए था,उसे भी मनुष्य ने राजनीति, धन और प्रचार का उत्सव बना दिया है।

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