आद्य सरसंघचालक प्रणाम!
राजेंद्र नाथ तिवारी,प्रमुख संपादक कौटिल्य का भारत,20-3-26 प्रात:7.40
भारत की सांस्कृतिक चेतना, संगठन-शक्ति और राष्ट्र जीवन के पुनरुत्थान की बात जब भी होती है, तब आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का नाम अत्यंत श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ स्मरण किया जाता है। उनका जीवन केवल एक व्यक्ति का जीवन नहीं, बल्कि एक युगदृष्टा की साधना थी—जिसने सोए हुए समाज को संगठन और स्वाभिमान का मंत्र दिया।
व्यक्तित्व और संकल्प,डॉ. हेडगेवार का जन्म ऐसे समय में हुआ जब भारत गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। चारों ओर निराशा, विभाजन और आत्महीनता का वातावरण था। परंतु उनके अंतर्मन में एक अग्नि प्रज्वलित थी—राष्ट्र को पुनः जागृत करने की। उन्होंने समझ लिया था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं, बल्कि समाज का आंतरिक संगठन और चरित्र निर्माण आवश्यक है।इसी उद्देश्य से उन्होंने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। यह स्थापना कोई साधारण घटना नहीं थी, बल्कि भारत के पुनरुत्थान की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम था। उन्होंने किसी आंदोलन, विरोध या हिंसा का मार्ग नहीं चुना, बल्कि “मनुष्य निर्माण” को ही राष्ट्र निर्माण का आधार माना।
उनका दृष्टिकोण स्पष्ट था,संगठित समाज ही सशक्त राष्ट्र का आधार है।चरित्रवान व्यक्ति ही राष्ट्र की वास्तविक पूंजी है।संस्कृति से कटकर कोई भी राष्ट्र दीर्घकाल तक जीवित नहीं रह सकता।
डॉ. हेडगेवार ने अपने जीवन में त्याग, अनुशासन और समर्पण का जो उदाहरण प्रस्तुत किया, वह आज भी प्रत्येक स्वयंसेवक के लिए प्रेरणा स्रोत है। उन्होंने स्वयं को कभी केंद्र में नहीं रखा, बल्कि संगठन को ही सर्वोपरि माना। यही कारण है कि उनका व्यक्तित्व एक दीपक की भांति है, जो स्वयं जलकर समाज को प्रकाश देता है।
आदर्श और वर्तमान प्रासंगिकता-आज जब हम “आद्य सरसंघचालक प्रणाम” कहते हैं, तो यह केवल एक औपचारिक अभिवादन नहीं होता, बल्कि एक संकल्प होता है—उनके दिखाए मार्ग पर चलने का। वर्तमान समय में जब समाज अनेक प्रकार की चुनौतियों से जूझ रहा है—सांस्कृतिक भ्रम, सामाजिक विखंडन और वैचारिक आक्रमण—तब हेडगेवार जी की विचारधारा और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है।
उन्होंने सिखाया कि राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि एक जीवंत चेतना है। यह चेतना तब तक सशक्त नहीं हो सकती जब तक समाज में एकता, समरसता और आत्मगौरव न हो। उनके विचारों में “हिंदुत्व” किसी संकीर्णता का प्रतीक नहीं, बल्कि व्यापक सांस्कृतिक एकता का दर्शन है।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी—व्यवहारिकता। उन्होंने बड़े-बड़े भाषणों के बजाय दैनिक जीवन में अनुशासन, समयबद्धता और राष्ट्रभक्ति को उतारने पर बल दिया। शाखा पद्धति इसका सजीव उदाहरण है, जहां व्यक्ति स्वयं को गढ़ता है और समाज के लिए जीना सीखता है।
आज के युवा के लिए उनका संदेश अत्यंत स्पष्ट है—स्वयं को मजबूत बनाओ, राष्ट्र स्वतः मजबूत होगा।संगठन में शक्ति है, अकेलेपन में नहीं।संस्कृति से जुड़कर ही आधुनिकता सार्थक हो सकती है।
“आद्य सरसंघचालक प्रणाम” केवल शब्द नहीं, बल्कि एक भाव है—श्रद्धा, कृतज्ञता और संकल्प का। यह हमें स्मरण कराता है कि एक साधारण व्यक्ति भी अपने दृढ़ निश्चय और समर्पण से इतिहास की दिशा बदल सकता है।
डॉ. हेडगेवार ने जो बीज बोया था, वह आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है। परंतु उस वृक्ष की जड़ों में आज भी वही तप, त्याग और राष्ट्रनिष्ठा का जल प्रवाहित हो रहा है।अतः हम सबका यह कर्तव्य है कि हम उनके आदर्शों को केवल स्मरण न करें, बल्कि अपने जीवन में उतारें—
“राष्ट्र प्रथम, समाज सर्वोपरि और स्वयं अंत में।”इसी भावना के साथ—आद्य सरसंघचालक को कोटि-कोटि प्रणाम।,🙏
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