मन की होलिका जलाओ, प्रह्लाद बचाओ - कौटिल्य का भारत

Breaking News

Home Top Ad

विज्ञापन के लिए संपर्क करें - 9415671117

Post Top Ad

मंगलवार, 3 मार्च 2026

मन की होलिका जलाओ, प्रह्लाद बचाओ

 

अग्रलेख


अपने मन की होलिका भस्म करें, ताकि प्रह्लाद जिंदा रहे

 होली का दहन: बाहर की नहीं, भीतर की आग,फाल्गुन की पूर्णिमा को जब अग्नि प्रज्वलित होती है और लकड़ियाँ चटखती हैं, तो हम मान लेते हैं कि बुराई जल रही है। परंतु क्या सचमुच बुराई बाहर है? क्या होलिका केवल एक पौराणिक पात्र थी, या वह हमारे भीतर भी जीवित है? होलिका केवल एक कथा नहीं, बल्कि अहंकार, सत्ता के दुरुपयोग और दुष्ट संरक्षण का प्रतीक है। उसे वरदान था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती। यह वरदान आज भी जीवित है—जब व्यक्ति पद, प्रतिष्ठा या शक्ति के भरोसे अन्याय को संरक्षण देता है।और दूसरी ओर है प्रह्लाद—निर्दोष आस्था, सत्य के प्रति अडिग विश्वास और अन्याय के सामने न झुकने का साहस। समस्या यह नहीं कि होलिका थी। समस्या यह है कि हम अपने भीतर की होलिका को पहचानना नहीं चाहते।
जब परिवार में स्वार्थ न्याय को दबा देता है,
जब राजनीति में पद सेवा पर भारी पड़ जाता है,जब समाज में प्रतिष्ठा सत्य से बड़ी हो जाती है—तब होलिका जीवित होती है।
होली की असली प्रासंगिकता यही है—बाहर की लकड़ी नहीं, भीतर का अहंकार जलना चाहिए।
 हिरण्यकश्यप की सत्ता और आज का मनुष्य
हिरण्यकश्यप केवल एक असुर राजा नहीं था; वह विचार था—“मैं ही अंतिम सत्य हूँ।”यह विचार हर युग में लौटता है।जब कोई व्यक्ति या व्यवस्था यह मान लेती है कि उसके अतिरिक्त कोई सत्य नहीं, तब वह हिरण्यकश्यप बन जाती है। और जब सत्य बोलने वाला अकेला पड़ जाता है, तब वह प्रह्लाद होता है।
आज भी समाज में—सत्ता अपनी आलोचना को विद्रोह मानती है,परिवार में स्वतंत्र विचार को अवज्ञा समझा जाता है,संगठन में प्रश्न पूछने वाले को विरोधी माना जाता है।
प्रह्लाद का अपराध क्या था?सिर्फ यह कि उसने सत्य को पिता से बड़ा माना।यह प्रश्न हमें स्वयं से पूछना होगा—क्या हम अपने घरों, संस्थाओं और राजनीति में प्रह्लाद को जीवित रहने देते हैं?या हर बार होलिका की गोद में बैठाकर उसे जलाने की कोशिश करते हैं?
होलिका दहन की प्रक्रिया: आत्म संस्कार की अग्नि होली केवल उत्सव नहीं, आत्म परीक्षण का अवसर है।अग्नि दो काम करती है—नाश,
शुद्धि यदि हम केवल प्रतीकात्मक लकड़ियाँ जलाकर लौट आएँ, तो होली अधूरी रह जाती है।हमें जलाना होगा—अपना अहंकार अपना पूर्वाग्रह,अपनी ईर्ष्या,अपनी दंभपूर्ण सोच
भीतर की होलिका तभी भस्म होगी।
प्रह्लाद को बचाने के लिए बाहरी चमत्कार नहीं हुआ था। चमत्कार था उसकी अडिग निष्ठा।
आज आवश्यकता चमत्कार की नहीं, चरित्र की है। यदि व्यक्ति अपने भीतर के अन्याय को पहचान ले, तो समाज बदलने में देर नहीं लगती।
 नई होली: आत्मशुद्धि का संकल्प ,होली हमें सिखाती है—सत्ता से बड़ा सत्य है।अहंकार से बड़ी आस्था है।भय से बड़ा विश्वास है।जब हम अपने भीतर के द्वेष को जला देंगे,जब हम परिवार में संवाद को स्थान देंगे,जब हम राजनीति में सेवा को प्राथमिकता देंगे—
तभी प्रह्लाद जीवित रहेगा। होली का अर्थ रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि मूल्यों का पुनर्जन्म है। यदि समाज में प्रह्लाद जीवित रहेगा, तो ही मानवता सुरक्षित रहेगी।
आइए इस बार संकल्प लें— हम बाहर की होलिका नहीं, अपने मन की होलिका जलाएँगे। ताकि सत्य, साहस और आस्था का प्रह्लाद जीवित रह सके।

1 टिप्पणी:

Post Bottom Ad