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बुधवार, 4 मार्च 2026

मोदी–इज़राइल पर सियासत बंद करो: विदेश नीति मस्जिद की माइक नहीं है,विदेश नीति गीता, कुरान,से नहीं चलेगी


 मोदी–इज़राइल संबंधों को ‘भारतीय मुसलमानों की ठेस’ से न जोड़ें

विदेश नीति आस्था से अलग है — कांग्रेस की दोहरी चाल पर विमर्श

भारत एक बहुधर्मी, बहुभाषी और बहु-सांस्कृतिक राष्ट्र है। यहाँ नीति का आधार राष्ट्रहित है, न कि किसी एक समुदाय की धार्मिक संवेदना। इसलिए जब भारत–इज़राइल संबंधों की बात होती है, तो उसे “भारतीय मुसलमानों की ठेस” के चश्मे से देखना न तो न्यायसंगत है, न ही दूरदर्शी। विदेश नीति आस्था से नहीं, रणनीतिक हितों से संचालित होती है।भारत–इज़राइल संबंध: इतिहास और यथार्थ:भारत ने 1992 में इज़राइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए थे, जब प्रधानमंत्री थे पी. वी. नरसिम्हा राव। उस समय भी भारत में करोड़ों मुसलमान थे, तब यह निर्णय किसी समुदाय के विरोध में नहीं था, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत के हितों के अनुरूप था।

आज इज़राइल भारत का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है—कृषि तकनीक,जल प्रबंधन,रक्षा सहयोग,साइबर सुरक्षा,स्टार्टअप नवाचारप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2017 की ऐतिहासिक इज़राइल यात्रा ने संबंधों को सार्वजनिक और पारदर्शी आयाम दिया। लेकिन यह समझना चाहिए कि भारत ने कभी भी फ़िलिस्तीन के समर्थन से अपने कदम पीछे नहीं खींचे। भारत ने संयुक्त राष्ट्र में दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन जारी रखा है। यह संतुलन बताता है कि भारत की विदेश नीति समन्वयी और बहुआयामी है।

 विदेश नीति और धार्मिक आस्था: दो अलग पथविदेश नीति का उद्देश्य है—राष्ट्रीय सुरक्षा ,आर्थिक प्रगति,तकनीकी सहयोग,वैश्विक प्रतिष्ठा यदि हर अंतरराष्ट्रीय संबंध को धार्मिक पहचान से जोड़ा जाएगा, तो भारत अपने ही कदम बाँध लेगा। भारत के मुसलमान उतने ही भारतीय हैं जितने अन्य समुदाय। क्या उन्हें यह विश्वास नहीं होना चाहिए कि उनकी सरकार राष्ट्रहित में निर्णय ले रही है?

विदेश नीति को “हिंदू बनाम मुस्लिम” के फ्रेम में डालना, दरअसल भारतीय मुसलमानों को संदेह की दृष्टि से देखना है। यह धारणा स्वयं में अपमानजनक है। भारतीय मुसलमानों की पहचान केवल वैश्विक इस्लामी राजनीति से नहीं, बल्कि भारत की मिट्टी, संविधान और साझा इतिहास से है।

कांग्रेस की दोहरी चाल: इतिहास की परछाईं:भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने दशकों तक “तुष्टिकरण” की राजनीति का आरोप झेला। एक ओर वह अरब देशों के साथ निकटता दिखाती रही, दूसरी ओर इज़राइल से रक्षा सौदे भी जारी रहे। परंतु सार्वजनिक विमर्श में उसने कभी स्पष्टता नहीं दिखाई।आज जब मोदी सरकार खुलकर रणनीतिक साझेदारी की बात करती है, तो वही कांग्रेस इसे “मुस्लिम भावनाओं” से जोड़ने लगती है। यह दोहरी चाल क्यों?क्या यह भारतीय मुसलमानों को केवल वोट-बैंक के रूप में देखने की मानसिकता नहीं दर्शाता?

कांग्रेस यदि हर वैश्विक मुद्दे को “धार्मिक संवेदना” के तराजू पर तौलेगी, तो वह अनजाने में एक नया “कांग्रेसी संस्करण” तैयार कर रही है, जो विभाजनकारी राजनीति की याद दिलाता है।

मुस्लिम समाज के लिए आत्मचिंतन:भारतीय मुसलमानों को यह समझना होगा कि विदेश नीति एक दिन की घटना नहीं होती। यह दशकों की रणनीति, संतुलन और दीर्घकालिक सोच का परिणाम है। क्या भारत के मुसलमान फ़िलिस्तीन के साथ सहानुभूति रख सकते हैं? - हाँ।क्या उसी समय वे भारत–इज़राइल तकनीकी सहयोग का समर्थन कर सकते हैं? -बिल्कुल।यह विरोधाभास नहीं, बल्कि परिपक्व लोकतांत्रिक समझ है।भारत का मुस्लिम समाज शिक्षा, उद्यमिता और सामाजिक सुधार के माध्यम से राष्ट्रनिर्माण में बड़ी भूमिका निभा सकता है। यदि हर अंतरराष्ट्रीय निर्णय को भावनात्मक मुद्दा बना दिया जाएगा, तो असली मुद्दे—रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य—पिछड़ जाएंगे।

मोदी की नीति और नियति: शंका से परे?प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति का एक प्रमुख तत्व है—रणनीतिक स्वायत्तता।अमेरिका से साझेदारी,रूस से रक्षा संबंध,अरब देशों से ऊर्जा सहयोग।

इज़राइल से तकनीकी सहयोग:यह बहु-दिशात्मक नीति दर्शाती है कि भारत किसी एक धुरी में बँधा नहीं है। इसे केवल “एक समुदाय के विरुद्ध” सिद्ध करना राजनीतिक सरलीकरण है।मोदी की नीतियों पर असहमति लोकतंत्र का अधिकार है, परंतु उन्हें “धार्मिक आघात” का रूप देना समाज को बाँटने का प्रयास है।

राष्ट्रहित सर्वोपरि: एक संतुलित दृष्टि:भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है। इसका अर्थ है—राज्य किसी धर्म के आधार पर निर्णय नहीं लेता। यदि भारत इज़राइल से ड्रोन तकनीक लेता है या जल संरक्षण सीखता है, तो उसका लाभ सभी भारतीयों को मिलता है—चाहे वे किसी भी आस्था के हों।विदेश नीति में भावनाओं का स्थान हो सकता है, परंतु निर्णय का आधार तर्क और रणनीति ही होना चाहिए।

 विभाजन नहीं, विवेक से कांग्रेस से समझे:मोदी–इज़राइल संबंधों को “भारतीय मुसलमानों की ठेस” से जोड़ना न तो न्यायसंगत है, न दूरदर्शी। यह विमर्श भारतीय मुसलमानों की राष्ट्रीय निष्ठा पर अनावश्यक प्रश्नचिह्न लगाता है।कांग्रेस सहित सभी दलों को चाहिए कि वे विदेश नीति को वोट-बैंक की राजनीति से ऊपर रखें।और भारतीय मुसलमानों को चाहिए कि वे स्वयं को वैश्विक धार्मिक राजनीति के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि भारत के समानाधिकार नागरिक के रूप में देखें।

विदेश नीति आस्था से नहीं, राष्ट्रहित से चलती है।यही परिपक्व लोकतंत्र का मार्ग है, और यही भारत की वैश्विक पहचान को सुदृढ़ करेगा।

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