वन्देमातरम् और भयाक्रांत अंग्रेजी सत्ता
श्रृंखला 86
भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल राजनीतिक संघर्ष की कथा नहीं है, बल्कि वह सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक जागरण और राष्ट्रीय अस्मिता के पुनर्जागरण की गाथा भी है। इस महान गाथा के केंद्र में यदि किसी एक मंत्र ने भारतीय जनमानस को झकझोर कर जगाया, तो वह था – “वन्देमातरम्”। यह केवल एक गीत नहीं था, बल्कि भारत माता के प्रति श्रद्धा, समर्पण और स्वाधीनता के लिए संकल्प का उद्घोष था।जब अंग्रेजी सत्ता ने भारत को केवल एक उपनिवेश के रूप में देखा और उसके संसाधनों, संस्कृति तथा आत्मसम्मान को कुचलने का प्रयास किया, तब “वन्देमातरम्” उस आत्मा की आवाज बनकर उभरा जिसने भारतीय समाज को भय से मुक्त होकर संघर्ष करने की प्रेरणा दी। इसीलिए अंग्रेजी सत्ता इस गीत से भयभीत हो उठी।
वन्देमातरम् का उद्भव : राष्ट्रचेतना का मंत्र::“वन्देमातरम्” का उद्भव उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ। यह वह काल था जब भारत अंग्रेजी शासन के अधीन था और भारतीय समाज में निराशा, असहायता और दासता की मानसिकता गहरी हो चुकी थी। ऐसे समय में महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यास आनंदमठ में “वन्देमातरम्” की रचना की।यह गीत मात्र साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं था। इसमें भारत भूमि को माँ के रूप में चित्रित किया गया—“सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम्, शस्य श्यामलाम् मातरम्।”यह पंक्ति केवल प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन नहीं करती, बल्कि भारत की आत्मा का चित्र प्रस्तुत करती है। यह गीत भारतीयों को याद दिलाता था कि वे किसी दास राष्ट्र के निवासी नहीं, बल्कि एक महान सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं।
अंग्रेजी सत्ता का भय:ब्रिटिश शासन का आधार केवल सैन्य शक्ति नहीं था; उसका वास्तविक आधार भारतीय समाज के भीतर फैला भय और विभाजन था। अंग्रेज यह अच्छी तरह समझते थे कि यदि भारतीय समाज एक सांस्कृतिक और राष्ट्रीय भावना के साथ खड़ा हो गया, तो उनका शासन टिक नहीं पाएगा।“वन्देमातरम्” इसी एकता का प्रतीक बन गया। जब यह गीत सार्वजनिक सभाओं, जुलूसों और आंदोलनों में गूंजने लगा, तब अंग्रेजी शासन को यह स्पष्ट दिखाई देने लगा कि यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि क्रांति का मंत्र बन चुका है।इसी कारण ब्रिटिश प्रशासन ने अनेक स्थानों पर “वन्देमातरम्” के गायन पर प्रतिबंध लगा दिया। विद्यालयों और सार्वजनिक स्थलों पर इसे गाना अपराध घोषित किया गया। परन्तु इतिहास गवाह है कि जितना अधिक इसे दबाने का प्रयास किया गया, उतनी ही अधिक शक्ति के साथ यह जनमानस में फैलता गया।
बंग-भंग आंदोलन और वन्देमातरम्::1905 में जब तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्ज़न ने बंग-भंग का निर्णय लिया, तब पूरे भारत में आक्रोश की लहर फैल गई। इस आंदोलन में “वन्देमातरम्” राष्ट्रीय प्रतिरोध का मुख्य स्वर बन गया।छात्र, शिक्षक, किसान, व्यापारी—सभी इस गीत को गाते हुए सड़कों पर उतरने लगे। सभाओं में जब हजारों लोगों की आवाज एक साथ “वन्देमातरम्” का उद्घोष करती थी, तो वह केवल विरोध का स्वर नहीं होता था, बल्कि स्वाधीनता की घोषणा जैसा प्रतीत होता था।ब्रिटिश अधिकारियों की रिपोर्टों में बार-बार यह उल्लेख मिलता है कि “वन्देमातरम्” के नारों से जनता उग्र और निर्भीक हो जाती थी। इसीलिए अंग्रेजी सरकार ने इसे “राजद्रोही नारा” तक घोषित करने की कोशिश की।
क्रांतिकारियों की प्रेरणा::भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन में भी “वन्देमातरम्” का विशेष स्थान था। जब युवा क्रांतिकारी फांसी के फंदे पर चढ़ते थे या जेल की यातनाएं सहते थे, तब उनके होंठों पर यही शब्द होते थे“वन्देमातरम्”।खुदीराम बोस, भगत सिंह, और अनेक अज्ञात क्रांतिकारियों ने इसे अपने जीवन का मंत्र बना लिया था। यह गीत उन्हें यह स्मरण कराता था कि उनका संघर्ष व्यक्तिगत नहीं, बल्कि मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए है।इस प्रकार “वन्देमातरम्” ने स्वतंत्रता आंदोलन को केवल राजनीतिक दिशा ही नहीं दी, बल्कि उसे आध्यात्मिक शक्ति भी प्रदान की।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रतीक::“वन्देमातरम्” की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह किसी एक वर्ग या समुदाय का गीत नहीं था। यह भारतीय संस्कृति, प्रकृति और मातृभूमि के प्रति प्रेम का सार्वभौमिक भाव व्यक्त करता था।महान दार्शनिक अरविन्द घोष ने कहा था कि “वन्देमातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय आत्मा की अभिव्यक्ति है।”इसीलिए स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक नेताओं—जैसे बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, और बिपिन चंद्र पाल—ने इसे जनजागरण का प्रमुख माध्यम बनाया।
अंग्रेजी शासन की विफलता::अंग्रेजों ने यह समझ लिया था कि यदि इस गीत की लोकप्रियता बढ़ती रही, तो वह भारतीय जनता के भीतर विद्रोह की भावना को प्रज्वलित कर देगा। इसलिए उन्होंने दमन, प्रतिबंध और प्रचार के माध्यम से इसे रोकने का प्रयास किया।परंतु इतिहास का सत्य यह है कि विचारों को तलवार से नहीं रोका जा सकता। “वन्देमातरम्” एक विचार था—स्वाधीनता का, आत्मसम्मान का और मातृभूमि के प्रति समर्पण का।यही कारण है कि अंग्रेजी सत्ता के सभी प्रयास विफल हो गए और यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन की धड़कन बन गया।
स्वतंत्र भारत में वन्देमातरम् का महत्व::1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब यह स्पष्ट हो गया कि “वन्देमातरम्” केवल अतीत की स्मृति नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय जीवन की प्रेरणा है। इसी भावना को ध्यान में रखते हुए संविधान सभा ने इसे राष्ट्रीय गीत का सम्मान प्रदान किया।आज भी जब “वन्देमातरम्” का उद्घोष होता है, तो वह हमें केवल इतिहास की याद नहीं दिलाता, बल्कि यह भी स्मरण कराता है कि राष्ट्र की स्वतंत्रता और गरिमा को बनाए रखने के लिए सतत जागरूकता आवश्यक है।
“वन्देमातरम्” और भयाक्रांत अंग्रेजी सत्ता की कथा वास्तव में दासता और स्वाधीनता के संघर्ष की कथा है। एक ओर साम्राज्यवादी शासन की शक्ति थी, तो दूसरी ओर एक गीत के रूप में प्रकट हुई राष्ट्र की आत्मा।अंततः विजय उसी आत्मा की हुई।“वन्देमातरम्” ने भारतीय समाज को यह सिखाया कि जब कोई राष्ट्र अपनी मातृभूमि को माँ के रूप में स्वीकार करता है, तब उसकी स्वतंत्रता को कोई भी शक्ति लंबे समय तक दबा नहीं सकती।इस प्रकार “वन्देमातरम्” केवल एक ऐतिहासिक स्मृति नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद की अनश्वर ज्योति है,जो अतीत में भी प्रकाश देती रही है और भविष्य में भी राष्ट्र की चेतना को आलोकित करती रहेगी।वन्देमातरम्!🙏

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