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गुरुवार, 12 मार्च 2026

बस्ती में गैस का खेल! 1250 से 1800 रुपये तक वसूली, राजेतिक और प्रशासन मौन

 बस्ती में गैस  का खेल! 1250 से 1800 रुपये तक वसूली, प्रशासन मौन


बस्ती। जनपद में रसोई गैस वितरण व्यवस्था पूरी तरह सवालों के घेरे में है। उपभोक्ताओं का आरोप है कि गैस एजेंसियों पर निर्धारित मूल्य से कहीं अधिक—1250 से 1800 रुपये तक—वसूली की जा रही है। हालात ऐसे हैं कि हजारों उपभोक्ता रोज सुबह से लंबी कतारों में खड़े रहने को मजबूर हैं, फिर भी उन्हें समय पर गैस सिलेंडर नहीं मिल पा रहा।

शहर में स्थित कनक गैस सर्विस के बाहर हर दिन सुबह से ही उपभोक्ताओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। महिलाएं, बुजुर्ग और मजदूर वर्ग के लोग घंटों लाइन में खड़े रहते हैं, लेकिन सिलेंडर मिलने की कोई गारंटी नहीं होती। उपभोक्ताओं का कहना है कि यदि “अतिरिक्त रकम” दी जाए तो सिलेंडर जल्दी मिल जाता है, अन्यथा उन्हें कई दिनों तक चक्कर काटने पड़ते हैं।

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह एजेंसी कलेक्ट्रेट और मंडलायुक्त कार्यालय के बेहद करीब स्थित है। इसके बावजूद खुलेआम हो रही इस कथित मनमानी पर प्रशासनिक मशीनरी की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। लोगों का कहना है कि जब प्रशासन के नजदीक ही यह हाल है, तो दूरदराज़ क्षेत्रों में स्थिति और भी गंभीर हो सकती है।

सुबह से लाइन, फिर भी सिलेंडर नहीं,प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, हर दिन सुबह से ही सैकड़ों लोग एजेंसी के बाहर कतार में लग जाते हैं। कई बार तो हजारों लोगों की भीड़ जमा हो जाती है। गर्मी और भीड़ के बीच घंटों इंतजार के बाद भी कई लोगों को खाली हाथ लौटना पड़ता है।

कालाबाजारी का संदेह,उपभोक्ताओं का आरोप है कि गैस की कृत्रिम कमी पैदा कर कालाबाजारी और मनमानी वसूली का खेल चल रहा है। यदि यह आरोप सही हैं तो यह सीधे-सीधे आम जनता के साथ आर्थिक शोषण का मामला है।

प्रशासन की परीक्षा,अब बड़ा सवाल यह है कि जिला प्रशासन और आपूर्ति विभाग इस पूरे मामले पर कब संज्ञान लेगा। यदि जल्द ही जांच और कार्रवाई नहीं हुई तो यह मुद्दा बड़े जनआंदोलन का रूप भी ले सकता है।

जनता की मांग है कि—गैस एजेंसियों की तत्काल जांच हो।निर्धारित मूल्य से अधिक वसूली करने वालों पर कड़ी कार्रवाई हो।उपभोक्ताओं को पारदर्शी और समयबद्ध गैस आपूर्ति सुनिश्चित की जाए।

सवाल सीधा है—जब कलेक्ट्रेट के पास ही उपभोक्ता घंटों लाइन में खड़े होकर महंगी गैस खरीदने को मजबूर हों, तो आखिर प्रशासन किस बात का इंतजार कर रहा है?

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