वन्देमातरम्: राष्ट्रवादी बनाम दरबारी बुद्धिजीवी 89 - कौटिल्य का भारत

Breaking News

Home Top Ad

विज्ञापन के लिए संपर्क करें - 9415671117

Post Top Ad

बुधवार, 11 मार्च 2026

वन्देमातरम्: राष्ट्रवादी बनाम दरबारी बुद्धिजीवी 89

वन्देमातरम 89 श्रृंखला 

 




वन्देमातरम्: राष्ट्रवादी बनाम दरबारी बुद्धिजीवी

भारत के राष्ट्रीय जीवन में कुछ शब्द केवल भाषा के शब्द नहीं होते, वे इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक बन जाते हैं। “वन्देमातरम्” ऐसा ही एक अमर मंत्र है जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को ऊर्जा दी, गुलामी से जूझते समाज को आत्मगौरव का संदेश दिया और लाखों भारतीयों के हृदय में राष्ट्रभक्ति की ज्योति प्रज्वलित की। किंतु आजादी के दशकों बाद भी यह गीत कुछ तथाकथित “दरबारी बुद्धिजीवियों” के लिए विवाद का विषय बना हुआ है।प्रश्न यह उठता है कि जिस गीत ने स्वतंत्रता संग्राम को दिशा दी, जिस उद्घोष के साथ क्रांतिकारी फाँसी के फंदे पर चढ़ गए, उसी को लेकर आज संदेह क्यों पैदा किया जाता है? इस प्रश्न का उत्तर भारत के वैचारिक संघर्ष में छिपा हुआ है — एक ओर राष्ट्रवादी चेतना है और दूसरी ओर दरबारी बौद्धिकता।

वन्देमातरम् का उद्गम और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि,,“वन्देमातरम्” की रचना महान साहित्यकार बाँकीम चंद्र चट्टोंपाध्याय ने की थी। यह गीत उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित हुआ। उस समय भारत अंग्रेजी शासन की कठोर दासता में था और समाज में स्वतंत्रता की चेतना धीरे-धीरे जाग रही थी।बंकिमचन्द्र ने भारतभूमि को माँ के रूप में चित्रित करते हुए इस गीत की रचना की। इसमें भारत की धरती, प्रकृति, नदियों और संस्कृति का अद्भुत वर्णन है। यह केवल साहित्यिक कृति नहीं थी बल्कि एक सांस्कृतिक घोषणा थी कि भारत केवल भौगोलिक भूभाग नहीं बल्कि एक जीवंत मातृशक्ति है।

स्वतंत्रता आंदोलन का घोष,,जब 1905 में अंग्रेजों ने पार्टीशन ऑफ़ बंगाल का निर्णय लिया, तब पूरे बंगाल में व्यापक आंदोलन शुरू हुआ। उस आंदोलन का सबसे बड़ा नारा बना — “वन्देमातरम्”।विद्यार्थियों, क्रांतिकारियों और सामान्य जनता के बीच यह गीत राष्ट्रभक्ति का प्रतीक बन गया। सभाओं, जुलूसों और आंदोलनों में “वन्देमातरम्” का उद्घोष वातावरण को आंदोलित कर देता था।महान राष्ट्रवादी चिंतक श्री औरोबिंदो ने कहा था कि वन्देमातरम् केवल गीत नहीं बल्कि राष्ट्र की आत्मा की आवाज है।इसी प्रकार बल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल जैसे नेताओं ने इसे स्वतंत्रता आंदोलन का प्रेरणास्रोत बनाया।

अंग्रेजी सत्ता का भय,,अंग्रेजी शासन “वन्देमातरम्” से इतना भयभीत था कि कई स्थानों पर इसे गाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। अंग्रेज अधिकारियों को लगता था कि यह गीत भारतीयों के भीतर विद्रोह की भावना पैदा करता है।कई क्रांतिकारी जब अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ संघर्ष करते हुए गिरफ्तार हुए, तो उन्होंने अदालतों में और जेलों में “वन्देमातरम्” का उद्घोष किया। अनेक स्वतंत्रता सेनानी फाँसी के फंदे पर चढ़ते समय भी यही नारा लगाते थे।इस प्रकार यह गीत केवल साहित्यिक रचना नहीं रहा बल्कि राष्ट्रीय क्रांति का प्रतीक बन गया।

राष्ट्रवादी दृष्टिकोण,,राSष्ट्रवादी विचारधारा के लिए “वन्देमातरम्” भारत की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है। भारत की परंपरा में भूमि को माता माना गया है।वेदों में कहा गया है—“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।”अर्थात पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं।इस दृष्टि से मातृभूमि को प्रणाम करना भारतीय संस्कृति की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। “वन्देमातरम्” इसी सांस्कृतिक भावना का काव्यात्मक रूप है। राष्ट्रवादी मानते हैं कि यह गीत भारत की एकता, गौरव और स्वतंत्रता का प्रतीक है।

दरबारी बुद्धिजीवी और वैचारिक विवाद,,स्वतंत्रता के बाद भारत में एक ऐसा बौद्धिक वर्ग विकसित हुआ जिसे अक्सर “दरबारी बुद्धिजीवी” कहा जाता है। यह वर्ग प्रायः सत्ता के निकट रहता है और राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना के बजाय वैचारिक राजनीति को अधिक महत्व देता है।कुछ बुद्धिजीवी “वन्देमातरम्” के संदर्भ में यह तर्क देते हैं कि इसमें देवी की उपमा है और इसलिए यह सभी समुदायों के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता।लेकिन राष्ट्रवादी विचारक इस तर्क को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ से काटकर देखा गया तर्क मानते हैं। उनका कहना है कि इस गीत में देवी की उपमा प्रतीकात्मक है और इसका उद्देश्य मातृभूमि के प्रति सम्मान व्यक्त करना है, न कि किसी विशेष धार्मिक पूजा का आग्रह करना।

संवैधानिक स्थिति,,भारत की संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को “वन्देमातरम्” को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। उसी दिन जाना बगना मना को भारत का राष्ट्रगान स्वीकार किया गया।इस प्रकार भारतीय राष्ट्रजीवन में दोनों का अपना विशेष महत्व है—

राष्ट्रगान – औपचारिक राष्ट्रीय प्रतीक,,राष्ट्रीय गीत – स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीकआज का वैचारिक संघर्ष,ज भारत में राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पहचान पर व्यापक बहस चल रही है। कुछ लोग राष्ट्र की परंपराओं और प्रतीकों को गौरव के साथ स्वीकार करने की बात करते हैं, जबकि कुछ उन्हें औपनिवेशिक या सांप्रदायिक दृष्टि से देखने का प्रयास करते हैं।“वन्देमातरम्” इसी वैचारिक संघर्ष का एक उदाहरण बन गया है।राष्ट्रवादी दृष्टिकोण कहता है कि राष्ट्र के प्रतीकों पर अनावश्यक विवाद खड़ा करना समाज को विभाजित करता है। वहीं दरबारी बुद्धिजीवी इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बहुलतावाद के नाम पर प्रश्नों के घेरे में रखते हैं।

“वन्देमातरम्” भारत के स्वतंत्रता संग्राम की अमर स्मृति है। यह गीत गुलामी के अंधकार में आशा की किरण बनकर उभरा था और इसने लाखों भारतीयों को स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी।आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इस गीत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को समझें। इसे विवाद का विषय बनाने के बजाय राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक के रूप में स्वीकार करें।

क्योंकि “वन्देमातरम्” केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का स्वर है। 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Post Bottom Ad