यदि आज आदि शंकराचार्य होते… धर्म, मर्यादा और समय का संदेश
भारत की आध्यात्मिक परंपरा में आदि शंकराचार्य केवल एक दार्शनिक या संन्यासी नहीं थे, बल्कि वे उस सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण पुरुष थे जिन्होंने बिखरते भारत को वैचारिक सूत्र में पिरोने का कार्य किया। आठवीं शताब्दी का भारत अनेक मतों, संप्रदायों और दार्शनिक विवादों से गुजर रहा था। उस समय शंकराचार्य ने संघर्ष का मार्ग नहीं, बल्कि शास्त्रार्थ, तर्क और आध्यात्मिक संवाद का मार्ग चुना। इसलिए जब आज धार्मिक पदों, कथित शंकराचार्यों और सत्ता के बीच सार्वजनिक विवाद दिखाई देते हैं, तब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है — यदि आज आदि शंकराचार्य स्वयं उपस्थित होते, तो वे क्या कहते?
संभवतः उनका पहला संदेश वाणी की मर्यादा पर केंद्रित होता। भारतीय परंपरा में शब्द केवल अभिव्यक्ति नहीं, साधना माने गए हैं। एक संन्यासी का प्रत्येक कथन समाज के लिए दिशा बनता है, इसलिए उसमें संतुलन, करुणा और विवेक अपेक्षित होता है। आदि शंकराचार्य ने अपने जीवन में तीखे दार्शनिक मतभेदों का सामना किया, परंतु उन्होंने कभी व्यक्तिगत कटुता को स्थान नहीं दिया। वे शायद स्मरण कराते कि धर्माचार्य की शक्ति उसकी आवाज़ की ऊँचाई में नहीं, बल्कि विचार की गहराई में होती है। जो वाणी समाज को उत्तेजित करे, वह धर्म की नहीं, अहंकार की अभिव्यक्ति बन जाती है।
दूसरा संदेश पद और पात्रता के संबंध में होता। शंकराचार्य की उपाधि केवल परंपरा का नाम नहीं, बल्कि त्याग, ज्ञान और आत्मसंयम की पराकाष्ठा का प्रतीक है। यह पद सम्मान प्राप्त करने का नहीं, बल्कि सम्मान त्यागने का मार्ग है। आदि शंकराचार्य स्वयं अल्पायु में समूचे भारत का भ्रमण करते हुए ज्ञान का प्रसार करते रहे। उन्होंने कभी स्वयं को केंद्र में नहीं रखा; उनके लिए धर्म और समाज ही सर्वोपरि थे। वे संभवतः कहते — “आचार्य वह नहीं जो स्वयं को स्थापित करे, बल्कि वह जो सत्य को स्थापित करे।”
तीसरा और अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश धर्म और राजनीति के संबंध को लेकर होता। भारतीय इतिहास में धर्म और राज्य एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। धर्म ने नैतिक दिशा दी और राज्य ने व्यवस्था को संरक्षित किया। किंतु जब धर्म स्वयं राजनीतिक संघर्ष का उपकरण बन जाता है, तब उसकी आध्यात्मिक गरिमा प्रभावित होती है। आदि शंकराचार्य ने चार मठों की स्थापना कर भारत की सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ किया; उनका उद्देश्य समाज को जोड़ना था, किसी पक्ष या सत्ता के विरुद्ध वैचारिक युद्ध खड़ा करना नहीं। वे शायद कहते — “धर्म मार्गदर्शक बने, प्रतिस्पर्धी नहीं।”
आज के समय में यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि क्या धर्माचार्य का दायित्व केवल विरोध करना है, या समाज को समाधान देना भी है। शंकराचार्य की परंपरा समाधान की परंपरा रही है। उन्होंने वैचारिक मतभेदों को संवाद से समाप्त किया, न कि सार्वजनिक टकराव से। वे यह भी स्मरण कराते कि समाज में श्रद्धा सबसे संवेदनशील तत्व है; यदि धार्मिक नेतृत्व स्वयं विवाद का केंद्र बन जाए, तो सामान्य जन का विश्वास डगमगाने लगता है।
संभवतः उनका चौथा संदेश राजधर्म और सन्यासधर्म की सीमाओं पर होता। भारतीय चिंतन में राजा और ऋषि दोनों आवश्यक माने गए, परंतु दोनों की भूमिकाएँ अलग थीं। राजा शासन चलाता है, पर ऋषि उसे मर्यादा का बोध कराता है। यदि संन्यासी सत्ता बनने का प्रयास करे या सत्ता धर्म की भूमिका ग्रहण करे, तो संतुलन टूट जाता है। शंकराचार्य शायद यही कहते कि मार्गदर्शन और शासन के बीच दूरी ही दोनों की गरिमा को सुरक्षित रखती है।
पाँचवाँ और सबसे गहरा संदेश अहंकार के त्याग का होता। अद्वैत वेदांत का मूल भाव यह है कि समस्त जगत एक ही चेतना का विस्तार है। जब सबमें एक ही आत्मा का दर्शन होता है, तब विरोध भी संवाद में बदल जाता है। इसलिए धर्माचार्य का कर्तव्य स्वयं को केंद्र में रखना नहीं, बल्कि समाज को आत्मबोध की ओर ले जाना है। व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के संघर्ष में धर्म का स्वर कमजोर पड़ जाता है।
यदि आज आदि शंकराचार्य होते, तो संभवतः वे किसी व्यक्ति या पक्ष का समर्थन या विरोध करने के बजाय यह कहते — “धर्म की रक्षा क्रोध से नहीं, करुणा से होती है; सत्य की स्थापना शोर से नहीं, साधना से होती है; और आचार्य वही है जो समाज को जोड़ता है, न कि उसे खेमों में विभाजित करता है।”
आज भारत को टकराव नहीं, संतुलन की आवश्यकता है। धर्म की गरिमा और राज्य की मर्यादा — दोनों का संरक्षण तभी संभव है जब संवाद, संयम और विवेक को प्राथमिकता दी जाए। सनातन परंपरा की वास्तविक शक्ति इसी में रही है कि उसने मतभेदों को भी समन्वय में बदल दिया। शायद यही संदेश आज भी समय के पार से आदि शंकराचार्य हमें देना चाहते — संयम ही धर्म की सबसे बड़ी विजय है, और एकता ही राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति।
भारत की आध्यात्मिक परंपरा में आदि शंकराचार्य केवल एक दार्शनिक या संन्यासी नहीं थे, बल्कि वे उस सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण पुरुष थे जिन्होंने बिखरते भारत को वैचारिक सूत्र में पिरोने का कार्य किया। आठवीं शताब्दी का भारत अनेक मतों, संप्रदायों और दार्शनिक विवादों से गुजर रहा था। उस समय शंकराचार्य ने संघर्ष का मार्ग नहीं, बल्कि शास्त्रार्थ, तर्क और आध्यात्मिक संवाद का मार्ग चुना। इसलिए जब आज धार्मिक पदों, कथित शंकराचार्यों और सत्ता के बीच सार्वजनिक विवाद दिखाई देते हैं, तब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है — यदि आज आदि शंकराचार्य स्वयं उपस्थित होते, तो वे क्या कहते?
संभवतः उनका पहला संदेश वाणी की मर्यादा पर केंद्रित होता। भारतीय परंपरा में शब्द केवल अभिव्यक्ति नहीं, साधना माने गए हैं। एक संन्यासी का प्रत्येक कथन समाज के लिए दिशा बनता है, इसलिए उसमें संतुलन, करुणा और विवेक अपेक्षित होता है। आदि शंकराचार्य ने अपने जीवन में तीखे दार्शनिक मतभेदों का सामना किया, परंतु उन्होंने कभी व्यक्तिगत कटुता को स्थान नहीं दिया। वे शायद स्मरण कराते कि धर्माचार्य की शक्ति उसकी आवाज़ की ऊँचाई में नहीं, बल्कि विचार की गहराई में होती है। जो वाणी समाज को उत्तेजित करे, वह धर्म की नहीं, अहंकार की अभिव्यक्ति बन जाती है।
दूसरा संदेश पद और पात्रता के संबंध में होता। शंकराचार्य की उपाधि केवल परंपरा का नाम नहीं, बल्कि त्याग, ज्ञान और आत्मसंयम की पराकाष्ठा का प्रतीक है। यह पद सम्मान प्राप्त करने का नहीं, बल्कि सम्मान त्यागने का मार्ग है। आदि शंकराचार्य स्वयं अल्पायु में समूचे भारत का भ्रमण करते हुए ज्ञान का प्रसार करते रहे। उन्होंने कभी स्वयं को केंद्र में नहीं रखा; उनके लिए धर्म और समाज ही सर्वोपरि थे। वे संभवतः कहते — “आचार्य वह नहीं जो स्वयं को स्थापित करे, बल्कि वह जो सत्य को स्थापित करे।”
तीसरा और अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश धर्म और राजनीति के संबंध को लेकर होता। भारतीय इतिहास में धर्म और राज्य एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। धर्म ने नैतिक दिशा दी और राज्य ने व्यवस्था को संरक्षित किया। किंतु जब धर्म स्वयं राजनीतिक संघर्ष का उपकरण बन जाता है, तब उसकी आध्यात्मिक गरिमा प्रभावित होती है। आदि शंकराचार्य ने चार मठों की स्थापना कर भारत की सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ किया; उनका उद्देश्य समाज को जोड़ना था, किसी पक्ष या सत्ता के विरुद्ध वैचारिक युद्ध खड़ा करना नहीं। वे शायद कहते — “धर्म मार्गदर्शक बने, प्रतिस्पर्धी नहीं।”
आज के समय में यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि क्या धर्माचार्य का दायित्व केवल विरोध करना है, या समाज को समाधान देना भी है। शंकराचार्य की परंपरा समाधान की परंपरा रही है। उन्होंने वैचारिक मतभेदों को संवाद से समाप्त किया, न कि सार्वजनिक टकराव से। वे यह भी स्मरण कराते कि समाज में श्रद्धा सबसे संवेदनशील तत्व है; यदि धार्मिक नेतृत्व स्वयं विवाद का केंद्र बन जाए, तो सामान्य जन का विश्वास डगमगाने लगता है।
संभवतः उनका चौथा संदेश राजधर्म और सन्यासधर्म की सीमाओं पर होता। भारतीय चिंतन में राजा और ऋषि दोनों आवश्यक माने गए, परंतु दोनों की भूमिकाएँ अलग थीं। राजा शासन चलाता है, पर ऋषि उसे मर्यादा का बोध कराता है। यदि संन्यासी सत्ता बनने का प्रयास करे या सत्ता धर्म की भूमिका ग्रहण करे, तो संतुलन टूट जाता है। शंकराचार्य शायद यही कहते कि मार्गदर्शन और शासन के बीच दूरी ही दोनों की गरिमा को सुरक्षित रखती है।
पाँचवाँ और सबसे गहरा संदेश अहंकार के त्याग का होता। अद्वैत वेदांत का मूल भाव यह है कि समस्त जगत एक ही चेतना का विस्तार है। जब सबमें एक ही आत्मा का दर्शन होता है, तब विरोध भी संवाद में बदल जाता है। इसलिए धर्माचार्य का कर्तव्य स्वयं को केंद्र में रखना नहीं, बल्कि समाज को आत्मबोध की ओर ले जाना है। व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के संघर्ष में धर्म का स्वर कमजोर पड़ जाता है।
यदि आज आदि शंकराचार्य होते, तो संभवतः वे किसी व्यक्ति या पक्ष का समर्थन या विरोध करने के बजाय यह कहते — “धर्म की रक्षा क्रोध से नहीं, करुणा से होती है; सत्य की स्थापना शोर से नहीं, साधना से होती है; और आचार्य वही है जो समाज को जोड़ता है, न कि उसे खेमों में विभाजित करता है।”
आज भारत को टकराव नहीं, संतुलन की आवश्यकता है। धर्म की गरिमा और राज्य की मर्यादा — दोनों का संरक्षण तभी संभव है जब संवाद, संयम और विवेक को प्राथमिकता दी जाए। सनातन परंपरा की वास्तविक शक्ति इसी में रही है कि उसने मतभेदों को भी समन्वय में बदल दिया। शायद यही संदेश आज भी समय के पार से आदि शंकराचार्य हमें देना चाहते — संयम ही धर्म की सबसे बड़ी विजय है, और एकता ही राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति।
शिवो भुट्टवास शिवम यजेत

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