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गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

अमेरिका ने हमारी हालत टायलट पेपर से भीबदतर करदिया, पकिस्तान

 




“इस्तेमाल” का विलाप और राष्ट्रों का आत्मधर्म
काल बोलता है—
मैं वह हूँ जो न सीमाओं में बँधता है, न घोषणाओं में।मैंने सिन्धु के तट पर सभ्यताओं को जन्म लेते देखा है,
मैंने तैमूर और बाबर के पदचिन्ह भी देखे हैं,मैंने 1947 की विभाजन-रेखा पर रक्त को बहते देखा है।
आज जब एक राष्ट्र कहता है—“अमेरिका ने हमें इस्तेमाल कर फेंक दिया”—तो मैं केवल घटना नहीं देखता,
मैं प्रवृत्ति देखता हूँ।
*राष्ट्र का जन्म और आत्म-संकट हे पाकिस्तान,तुम्हारा जन्म भूगोल से अधिक विचारधारा की कोख से हुआ। तुम्हारी नींव “विरोध” पर रखी गई—नकार पर, भय पर, विभाजन पर।जब किसी राष्ट्र की आत्मा सकारात्मक निर्माण के स्थान पर प्रतिस्पर्धी अस्मिता से गढ़ी जाती है,तो उसकी विदेश नीति भी प्रतिक्रिया बन जाती है, दृष्टि नहीं। तुमने स्वयं को “भारत के विकल्प” के रूप में परिभाषित किया,
पर विकल्प कभी मूल नहीं बनता। मूल बनने के लिए आत्म-साधना चाहिए—संस्कृति का आत्मविश्वास चाहिए, लोकतंत्र की जड़ें चाहिए, आर्थिक आत्मनिर्भरता चाहिए।
*शीत युद्ध: पहला मोड़ 1950–60 के दशक में जब विश्व दो ध्रुवों में बँटा था,तुमने पश्चिम का हाथ थामा।
SEATO, CENTO, सैन्य सहायता, डॉलर की वर्षा—तुमने सोचा, यह सुरक्षा है।पर क्या यह सुरक्षा थी,या आश्रय? अमेरिका ने तुम्हें सोवियत-विरोधी मोर्चे का प्रहरी बनाया। तुमने स्वीकार किया।पर उस समय क्या तुमने सोचा— कि जब भू-राजनीतिक आवश्यकता समाप्त होगी, तो यह संरक्षण भी समाप्त हो जाएगा?
*अफगान जिहाद: आग के साथ खेल 1979—सोवियत सेना अफगानिस्तान में प्रवेश करती है।तुमने स्वयं को “जिहाद” का सेतु बनाया। डॉलर आए, हथियार आए,ISI की शक्ति बढ़ी, मदरसे रणनीति के उपकरण बने। तुमने सोचा—यह सामरिक गहराई है। पर मैंने देखा—यह भविष्य की आग है। जिसे तुमने “रणनीति” कहा, वह धीरे-धीरे समाज की नसों में उतर गया। कट्टरता केवल सीमा पार का औजार नहीं रही,वह राष्ट्रीय चरित्र का संकट बन गई। 9/11: आत्मविरोध का चरम 11 सितम्बर 2001—विश्व-व्यापी आतंक का प्रतीक दिवस। अमेरिका ने कहा—“या तो हमारे साथ, या हमारे विरुद्ध।”तुमने साथ चुना। परंतु क्या भीतर से तुम पूरी तरह साथ थे? एक ओर सहयोग, दूसरी ओर संरक्षित तंत्र—यह दोहरा खेल अंततः स्वयं के विरुद्ध गया। तुम कहते हो—“हमने बहुत नुकसान झेला।”सच है। पर प्रश्न यह है—क्या यह केवल बाहरी युद्ध का परिणाम था?या वर्षों की नीतिगत असंगति का?
*“इस्तेमाल” का दर्शन हे राष्ट्र,किसी भी महाशक्ति का स्वभाव उपयोग करना है। पर उपयोग तभी संभव है जब कोई स्वयं को उपयोग योग्य बनाए। कौटिल्य ने कहा था—“स्वामी का प्रथम कर्तव्य है—स्व-हित की रक्षा।” यदि कोई राज्य दूसरे की रणनीति का विस्तार बन जाए, तो वह उपकरण है, सहयोगी नहीं।
“इस्तेमाल” शब्द में पीड़ा है,पर साथ ही स्वीकार भी—कि निर्णय स्वयं का था।
* लोकतंत्र बनाम सैन्य प्रभुत्व,तुम्हारी राजनीति का बड़ा भाग सैन्य नेतृत्व के अधीन रहा। जब लोकतंत्रस्थायी न हो, तो विदेश नीति भी दीर्घकालिक नहीं होती।सत्ता परिवर्तन के साथ दिशा बदलती रह
कभी अमेरिका, कभी चीन,कभी खाड़ी।यह संतुलन नहीं,निर्भरता का चक्र है।
* चीन का नया अध्याय: पुनरावृत्ति?आज तुम कहते हो—“हम अब चीन के साथ हैं।”CPEC, निवेश बुनियादी ढाँचा—यह अवसर है।पर इतिहास पूछता है—क्या यह आत्मनिर्भरता की ओर कदम है?या एक नए आश्रय की ओर?यदि आर्थिक निर्णय ऋण-जाल में बदल जाएँ,तो “इस्तेमाल” की कथा फिर लिखी जाएगी। दक्षिण एशिया का संतुलन भारत ने अपनी राह चुनी—गुटनिरपेक्षता से रणनीतिक स्वायत्तता तक। अमेरिका से साझेदारी, रूस से संबंध,मध्य-पूर्व से सहयोग, परंतु अंतिम निर्णय—स्वयं का।
यही अंतर है— आश्रित और स्वायत्त में।यदि तुम भी यह मार्ग चुनो,तो उपमहाद्वीप स्थिर होगा।अन्यथा अस्थिरता का चक्र जारी रहेगा। धर्म और राजनीति का मिश्रण,जब धर्म राजनीतिक औजार बनता है,
तो वह नीति को भावनात्मक बना देता है। राज्य-नीति तर्क से चलती है,
आस्था से नहीं।यदि राज्य स्वयं को धार्मिक पहचान से ऊपर उठाकर नागरिक राष्ट्र बनाए,तो दीर्घकालिक स्थिरता संभव है।
काल का अंतिम सन्देश हे पाकिस्तान,तुम्हारी पीड़ा वास्तविक हो सकती है, पर समाधान आत्मावलोकन में है।इतिहास दोषारोपण से नहीं बदलता, दिशा-परिवर्तन से बदलता है।यदि तुम स्वीकार करो—कि निर्णय तुम्हारे थे,कि भूलें तुम्हारी थीं,और सुधार भी तुम्हारा होगा—तो “इस्तेमाल” की कथा एक नए अध्याय में बदल सकती है। अन्यथा—मैं, काल, प्रतीक्षा करूँगा। क्योंकि मैं जानता हूँ—जो राष्ट्र स्वयं को नहीं बदलते,
उन्हें परिस्थितियाँ बदल देती हैं।

“अमेरिका ने हमें इस्तेमाल किया”—यह वाक्य केवल आरोप नहीं,एक दर्पण है।उस दर्पण में यदि साहस से देखा जाए,तो भविष्य सुरक्षित है।यदि दर्पण तोड़ दिया जाए, तो प्रतिबिंब नहीं बदलता—केवल भ्रम बढ़ता है.
पाकिस्तान समझो और आत्मनिर्भर बनो परावलम्बी नहीं.

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