बस्ती की मंडियों में ‘भाव का भ्रम’ और प्लास्टिक का ज़हर — आखिर कब जागेगा प्रशासन?
बस्ती जनपद की फल-सब्जी मंडियों में इन दिनों एक खतरनाक प्रवृत्ति तेजी से फैल रही है। ग्राहक जब किसी सब्जी या फल का भाव पूछता है तो विक्रेता एक कीमत बताता है, लेकिन सामान तौलने और पैक करने के बाद अचानक दावा किया जाता है कि “आपने गलत सुन लिया।” 25 की जगह 40, 40 की जगह 50 रुपये — और फिर बहस, विवाद और कई बार झगड़े तक की स्थिति बन जाती है। यह केवल व्यापारिक अनियमितता नहीं, बल्कि उपभोक्ता विश्वास की खुली हत्या है।
बाजार का आधार भरोसा होता है। जब ग्राहक को ही धोखे का अनुभव होने लगे तो स्थानीय अर्थव्यवस्था की नैतिकता कमजोर होने लगती है। बस्ती की मंडियों में यह समस्या अब अपवाद नहीं, बल्कि एक चलन बनती जा रही है। सवाल यह है कि क्या उपभोक्ता संरक्षण केवल कागज़ी कानून बनकर रह गया है?
इस अव्यवस्था का दूसरा और कहीं अधिक खतरनाक पहलू है — अधिमानक (नॉन-स्टैंडर्ड) प्लास्टिक का खुला उपयोग। फल और सब्जी विक्रेता बड़ी मात्रा में पतली, प्रतिबंधित प्लास्टिक पन्नियों का प्रयोग कर रहे हैं। ये पन्नियां न केवल पर्यावरण की कमर तोड़ रही हैं, बल्कि सीधे लोगों के घरों तक विष पहुंचा रही हैं। हर दिन कई कुंतल प्लास्टिक रेल मार्ग से बस्ती पहुंच रही है और खुलेआम बिक रही है।
विडंबना देखिए — पर्यावरण बचाने के नाम पर अभियान चलाए जाते हैं, शपथ दिलाई जाती है, पोस्टर लगाए जाते हैं; लेकिन जमीन पर प्रशासनिक तंत्र मौन दिखाई देता है। नगर पालिका, आपूर्ति विभाग, मार्केटिंग विभाग और जिला प्रशासन — सभी मानो “चयन की बंसी” बजा रहे हैं। प्रतिबंधित प्लास्टिक की सप्लाई कैसे हो रही है? किसके संरक्षण में यह व्यापार चल रहा है? इन सवालों का उत्तर कोई देने को तैयार नहीं।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि यही प्लास्टिक अंततः भोजन के संपर्क में आती है। गर्म सब्जियां और फल जब इन निम्नस्तरीय पन्नियों में रखे जाते हैं तो सूक्ष्म रासायनिक तत्व भोजन में मिलते हैं। इसका असर धीरे-धीरे मानव स्वास्थ्य पर पड़ता है — कैंसर, हार्मोनल गड़बड़ी और अनेक गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ता है। यानी सुविधा के नाम पर हम अपने ही घरों में बीमारी आमंत्रित कर रहे हैं।
समस्या केवल विक्रेताओं की नहीं है; यह व्यवस्था की विफलता है। यदि बाजार में अधिमानक प्लास्टिक पहुंच रही है तो आपूर्ति श्रृंखला में कहीं न कहीं प्रशासनिक ढील या मिलीभगत अवश्य है। प्रतिबंध तब तक प्रभावी नहीं हो सकता जब तक स्रोत पर रोक न लगे।
अब प्रश्न उठता है — समाधान क्या है?
पहला, मंडियों में स्पष्ट मूल्य-प्रदर्शन (रेट बोर्ड) अनिवार्य किया जाए। जो व्यापारी घोषित मूल्य से अधिक वसूली करे, उस पर तत्काल जुर्माना और लाइसेंस निलंबन की कार्रवाई हो।
दूसरा, प्लास्टिक प्रतिबंध को केवल अभियान नहीं, सख्त प्रवर्तन बनाया जाए। रेलवे और थोक बाजारों पर निगरानी बढ़ाई जाए, जहां से यह प्लास्टिक शहर में प्रवेश करती है।
तीसरा, कपड़े और जैविक बैग को प्रोत्साहन देने के लिए नगर पालिका स्वयं सस्ती वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध कराए।
चौथा, उपभोक्ता जागरूकता अभियान चलाया जाए — क्योंकि जागरूक ग्राहक ही सबसे बड़ा नियामक होता है।
पर्यावरण की शुचिता केवल भाषणों से नहीं बचेगी। यदि हम चाहते हैं कि हमारे घरों में शुद्ध भोजन पहुंचे, तो बाजार भी शुद्ध होना चाहिए — व्यवहार में भी और सामग्री में भी। “अधिमानक प्लास्टिक में सब्जी” और “भ्रामक भाव” — दोनों मिलकर समाज की सेहत और विश्वास को नष्ट कर रहे हैं।
अब समय आ गया है कि बस्ती प्रशासन जागे, व्यवस्था सुधारे और बाजार को अनुशासन दे। क्योंकि यदि आज नहीं संभले, तो कल प्लास्टिक केवल नालियों में नहीं, हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य में बहती दिखाई देगी।
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