एक कर्मयोगी का प्रयाण - कौटिल्य का भारत

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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

एक कर्मयोगी का प्रयाण

 


परम श्रद्धेय विंध्यवासिनी कुमार जी का निधन हम सभी के लिए अत्यंत पीड़ादायक और अपूरणीय क्षति है।उनका जाना केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक विचार, एक संस्कार और एक युग का अवसान है।अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से लेकर सार्वजनिक जीवन तक उनका योगदान सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा।संगठन के प्रति उनकी निष्ठा और समर्पण अद्वितीय था।

भारतीय जनता पार्टी में उन्होंने प्रदेश महामंत्री एवं विधान परिषद सदस्य के रूप में अनुकरणीय भूमिका निभाई। वे पद से नहीं, अपने व्यवहार और कर्म से बड़े नेता थे।उनका सहज, मिलनसार और हँसमुख स्वभाव हर कार्यकर्ता के हृदय में बसता था।छोटे कार्यकर्ता से लेकर वरिष्ठ नेतृत्व तक सबके साथ उनका आत्मीय संबंध था।संगठन निर्माण में उनका जीवन पूर्णतः समर्पित रहा।उन्होंने अनगिनत युवाओं को राष्ट्रसेवा का मार्ग दिखाया।

उनके शब्दों में सदैव ऊर्जा, और व्यक्तित्व में सदैव अपनापन झलकता था।आज उनका अभाव संगठन परिवार को गहराई से महसूस हो रहा है।उनका जीवन हमें कर्तव्य, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति का संदेश देता रहेगा।वे सदैव कर्मयोगी की तरह कार्य करते हुए आगे बढ़ते रहे।अंतिम समय तक संगठन और समाज की चिंता ही उनके मन में रही।

ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें।शोकाकुल परिवार एवं समर्थकों को यह असहनीय दुःख सहने की शक्ति मिले।उनका स्मरण हम सबके लिए प्रेरणा और संकल्प का स्रोत बना रहेगा।

उनके अधूरे सपनों को पूरा करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।— भावभीनी श्रद्धांजलि,

 राजेंद्र नाथ तिवारी।

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