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सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

“सत्ता की भूख ने संसद की आत्मा निगल ली”

 संसद/राजनीति से भागती नैतिकता

(एक विचारात्मक संपादकीय)


राजेंद्र नाथ तिवारी

भारतीय लोकतंत्र की आत्मा कभी संसद की गरिमा में बसती थी। संसद केवल कानून बनाने का भवन नहीं थी — वह राष्ट्र की नैतिक चेतना का मंच थी। यहाँ शब्द हथियार नहीं होते थे, बल्कि विचार राष्ट्र निर्माण के औज़ार बनते थे। आज स्थिति उलटती दिखाई देती है। राजनीति तेज़ हुई है, सत्ता संघर्ष तीखा हुआ है, लेकिन नैतिकता मानो संसद के गलियारों से धीरे-धीरे बाहर निकलती जा रही है।

संसद: बहस से प्रदर्शन तक -कभी संसद में वैचारिक मतभेद होते थे, पर व्यक्तिगत मर्यादा बनी रहती थी। विपक्ष सरकार को कठोर प्रश्नों से घेरता था, लेकिन राष्ट्रहित सर्वोपरि रहता था। आज बहस की जगह शोर, तर्क की जगह पोस्टर, और संवाद की जगह आरोपों की राजनीति ने ले ली है। संसद का समय, जो नीति निर्माण के लिए होना चाहिए, वह अक्सर नारेबाज़ी और व्यवधान में समाप्त हो जाता है। लोकतंत्र में विरोध आवश्यक है, पर जब विरोध प्रदर्शन में बदल जाए और समाधान गायब हो जाए — तब नैतिकता पीछे हटने लगती है।

 नैतिकता क्यों भाग रही है?_राजनीति में नैतिक गिरावट अचानक नहीं आती; यह धीरे-धीरे बनती प्रक्रिया है।चुनावी जीत ही अंतिम लक्ष्य राजनीति अब सेवा नहीं, “जीत की मशीन” बनती जा रही है। सिद्धांत हार जाएँ तो भी चलेगा, पर चुनाव नहीं हारना चाहिए — यही मानसिकता नैतिकता की पहली हार है।

व्यक्तिवाद बनाम विचारधारा_पहले दल विचारधारा से पहचाने जाते थे; आज नेता केंद्र बन गया है। जब राजनीति व्यक्ति-पूजा में बदलती है, तब नैतिक जवाबदेही कमजोर हो जाती है।

मीडिया और तात्कालिक लोकप्रियता_आज का राजनीतिक संवाद कैमरे और सोशल मीडिया के लिए रचा जाता है। त्वरित सुर्खियाँ दीर्घकालिक नीति पर भारी पड़ती हैं। नैतिक निर्णय अक्सर लोकप्रिय नहीं होते — इसलिए उन्हें टाल दिया जाता है।

सत्ता और विपक्ष — दोनों की समान जिम्मेदारी_नैतिकता का संकट केवल सत्ता पक्ष का नहीं और न ही केवल विपक्ष का।सत्ता यदि अहंकार में आलोचना को अस्वीकार करे — नैतिकता कमजोर होती है।विपक्ष यदि विरोध के लिए विरोध करे — लोकतंत्र की विश्वसनीयता घटती है। लोकतंत्र का संतुलन तभी संभव है जब दोनों पक्ष स्वयं को राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी मानें, केवल समर्थकों के प्रति नहीं।

लोकतंत्र का सबसे बड़ा खतरा_लोकतंत्र चुनाव हारने से नहीं टूटता; वह तब टूटता है जब जनता का विश्वास टूट जाता है।जब नागरिक यह मानने लगे कि संसद समाधान का स्थान नहीं बल्कि राजनीतिक नाटक का मंच बन गई है — तब लोकतंत्र का नैतिक आधार हिलने लगता है। नैतिकता के बिना लोकतंत्र केवल संख्या का खेल बन जाता है, और संख्या का खेल अंततः शक्ति संघर्ष में बदल जाता है।

  नैतिक पुनर्जागरण की आवश्यकता_राजनीति में नैतिकता लौट सकती है — यदि कुछ मूलभूत परिवर्तन हों:संसदीय आचरण संहिता का कठोर पालन ,विचार आधारित बहस को प्रोत्साहन ,दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र,राजनीतिक शिक्षा और सार्वजनिक जवाबदेही जनता की सजगता — क्योंकि लोकतंत्र में अंतिम नैतिक शक्ति मतदाता ही होता है। संसद का

संसद राष्ट्र का दर्पण है। यदि राजनीति से नैतिकता भागती है, तो उसका अर्थ है कि समाज स्वयं भी मूल्य संकट से गुजर रहा है। लोकतंत्र केवल संविधान से नहीं चलता; वह चरित्र से चलता है। आज आवश्यकता किसी नए कानून की नहीं, बल्कि पुराने मूल्यों की पुनर्स्थापना की है — जहाँ सत्ता सेवा बने, विरोध जिम्मेदारी बने, और संसद फिर से राष्ट्र की नैतिक आत्मा का प्रतीक बन सके। क्योंकि जब राजनीति से नैतिकता चली जाती है, तब लोकतंत्र जीवित तो रहता है — पर महान नहीं रह पाता। सर्वस्पर्शी समाज ही लोकतंत्र की आत्मा है।

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