वन्दे मातरम और आदिवासी स्मृति
वन्देमातरम श्रृंखला 86
राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से समावेशी राष्ट्रवाद, ऐतिहासिक द्वंद्व और सांस्कृतिक समन्वय पर केंद्रित है।वन्दे मातरम का ऐतिहासिक उद्भव,वन्दे मातरम की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1882 को 'आनंदमठ' उपन्यास के लिए की, जो 18वीं शताब्दी के संन्यासी विद्रोह पर आधारित है। संस्कृत-बंगाली मिश्रण में रचित यह गीत मातृभूमि को दुर्गा-रूपी देवी के रूप में वंदना करता है: "सुजलां सुफलां मलयजशीतलां शस्यश्यामलां मातरम।" स्वदेशी आंदोलन (1905) में यह राष्ट्रवादी नारा बना, जब बंगाल विभाजन के विरुद्ध प्रभात फेरियां निकलीं।
रवींद्रनाथ टैगोर ने 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में इसे पहली बार गाया, जबकि अरविंद घोष ने अपना पत्र 'बंदे मातरम' नामित किया। ब्रिटिश ने इसे राजद्रोही घोषित कर दमन किया, लेकिन यह किसान विद्रोहों से जनजातीय आंदोलनों तक फैला। उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में लाला लाजपत राय ने इसे प्रचारित किया।आदिवासी स्मृति का स्वरूपआदिवासी स्मृति प्रकृति-आधारित है, जहां भूमि 'मां' नहीं बल्कि साझा जीवन-जगत है। झारखंड, छत्तीसगढ़ के मुंडा, संथाल समुदाय सरना पूजा करते हैं, जो वनों की रक्षा पर केंद्रित है। बिरसा मुंडा (1875-1900) का 'उलगुलान' ब्रिटिश वन-नीतियों के विरुद्ध था, जहां उन्होंने 'धरती आबा' (पृथ्वी पिता) का नारा दिया। आदिवासी कविता (डॉ. भगवान गव्हाड़े) अस्मिता को प्रकृति-संरक्षण से जोड़ती है।संविधान की पांचवीं अनुसूची आदिवासी स्वायत्तता मानती है, लेकिन मुख्यधारा राष्ट्रवाद वैदिक प्रतीकों पर आधारित रहा। आदिवासी इतिहासकार वेरियर एल्विन ने इसे 'वनवासी संस्कृति' कहा, जो वैदिक आर्य-आगमन से पूर्व का है।
स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी भागीदारीआदिवासी विद्रोह मुख्यधारा से समानांतर चले: संथाल हूल (1855), भील uprising (1818)। बिरसा मुंडा ने ईसाई मिशनरियों और ब्रिटिश के विरुद्ध 'अबुआ राज' (हमारा राज्य) का नारा दिया। वन्दे मातरम इनमें प्रत्यक्ष नहीं, लेकिन 'भारत माता की जय' जैसे नारों से जुड़ा। 1942 भारत छोड़ो में आदिवासी नेता जयपाल सिंह ने भूमिका निभाई।
उत्तर प्रदेश के बस्ती क्षेत्र में थारू आदिवासी ब्रिटिश कर-विरोध में सक्रिय रहे, जो राष्ट्रवाद से जुड़े। फिर भी, गांधीवादी आंदोलन आदिवासियों को 'हरिजन' मानकर मुख्यधारा में विलीन करने का प्रयास था।वन्दे मातरम का आदिवासी संदर्भवन्दे मातरम के देवी-वर्णन (दुर्गा, लक्ष्मी) आदिवासी प्रकृति-पूजा से भिन्न हैं। मुंडा में कोई एकल 'मां' नहीं, बल्कि बहुदेववादी परंपरा। 2025 में बिरसा मुंडा जयंती को वन्दे मातरम 150 वर्ष से जोड़ा गया, जहां पीआईबी ने जनजातीय गौरव दिवस घोषित किया।कुछ आदिवासी इसे 'बंगाली-हिंदू थोपना' मानते, लेकिन भूपेश बघेल जैसे नेता इसे समावेशी बताते। बस्ती मंडल जैसे स्थानीय संगठनों में यह सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। राष्ट्रवादी दृष्टि से, यह सभी की मातृभूमि है—आदिवासी सहित।विवाद और सांस्कृतिक द्वंद्वमुख्य विवाद मुस्लिम लीग से (1937 कांग्रेस संकल्प), लेकिन आदिवासी संदर्भ में सवाल: क्या वैदिक प्रतीक आदिवासी अस्मिता को समाहित करते? मुस्लिम लीग ने 'शिर्क' कहा, लीग ने इसे 'हिंदू राष्ट्रवाद'। आदिवासी बुद्धिजीवी राम दयाल मुंडा ने समन्वय की वकालत की।2025 विवाद में मोदी ने नेहरू पर 'दुर्गा हटाने' का आरोप लगाया, जबकि आदिवासी कार्यक्रमों में इसे शामिल किया। यह समावेशी राष्ट्रवाद का उदाहरण है।समावेशी राष्ट्रवाद का निर्माणसंविधान सभा में वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बनाया (1950), जन गण मन के साथ। आदिवासी प्रतिनिधि जयपाल सिंह ने समर्थन किया। आधुनिक भारत में ट्राइबल सब प्लान और वन अधिकार अधिनियम आदिवासी स्मृति को मान्यता देते। कautilya फाउंडेशन जैसे संगठन बस्ती में सांस्कृतिक संवाद आयोजित करते।वन्दे मातरम को आदिवासी नृत्यों (करमा, सैला) से जोड़ें, तो समृद्धि बनेगी। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (आदिवासी) ने इसे राष्ट्र-एकता का प्रतीक कहा।उत्तर प्रदेश और बस्ती संदर्भलखनऊ-बस्ती में थारू, बौध राजी आदिवासी हैं। स्वतंत्रता संग्राम में बस्ती के किसान-आदिवासी चंदा सेना में शामिल रहे ।
"कौटिल्य का भारत" जैसे प्लेटफॉर्म पर वन्दे मातरम संपादकीय छपते, जो स्थानीय अस्मिता से जोड़ते। 2026 में राष्ट्रपति ट्रंप के दौरों से प्रेरित राष्ट्रवाद यहां प्रासंगिक। विश्लेषणवन्दे मातरम आदिवासी स्मृति को समाहित कर समावेशी बने। यह राष्ट्रवाद की मुख्यधारा आदिवासी विद्रोहों को अपनाए। शोध सुझाव: क्षेत्रीय अध्ययन से नया 'आदिवासी वन्दे मातरम' रचना। भारत की विविधता ही उसकी शक्ति है. और वन्देमातरम क़ो सम्मानदेना राष्ट्रधर्म!
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें