शंकराचार्यो क़ो जनक की सभा में ऋषि अष्टावक्र की तरह चुनौती का समय आगया है?
यह विषय अपने-आप में धर्म, सत्ता और आत्मा—तीनों का एक साथ परीक्षण का है। आप जिस प्रश्न को उठा रहे हैं, वह किसी व्यक्ति-विशेष पर टिप्पणी नहीं, बल्कि शंकराचार्य परंपरा के ऐतिहासिक अवसान और संभावित पुनर्जागरण का विमर्श है।?यदि मैं शंकराचार्य होता तो धर्म सत्ता से ऊपर और धर्मदंड सत्ता काअनुशासन होता आदि शंकराचार्य से अभिमुक्तेश्वरानंद तक : एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रश्न नहीँ आता. भारत की आत्मा कभी सत्ता से नहीं, धर्म से संचालित रही है। यहाँ धर्म का अर्थ पंथ नहीं, बल्कि ऋत—न्याय, मर्यादा, विवेक और उत्तरदायित्व की वह व्यवस्था है जो राजा को भी बाँधती थी। इसी कारण भारत में “राजा” नहीं, राजर्षि की परिकल्पना विकसित हुई। यदि मैं शंकराचार्य होता, तो मेरी पहली उद्घोषणा यही होती—
धर्म सत्ता का अनुचर नहीं, सत्ता का अनुशासक है। आदि शंकराचार्य : सत्ता से परे खड़ा धर्म आदि शंकराचार्य (8वीं शताब्दी) का सबसे बड़ा योगदान केवल अद्वैत वेदांत नहीं था, बल्कि धर्म की सार्वभौमिक सत्ता को पुनः प्रतिष्ठित करना था।(क) शंकराचार्य सत्ता-समर्थक नहीं, सत्ता-सुधारक थे उन्होंने किसी राजा की प्रशंसा में ग्रंथ नहीं लिखे,किसी राजसिंहासन के संरक्षण में मठों को नहीं बाँधावे राजनीतिक सत्ता से दूर, पर सांस्कृतिक सत्ता के केंद्र थे चार मठों की स्थापना सत्ता के लिए नहीं, सभ्यता की सीमा-रेखाओं के संरक्षण हेतु थी।ख) धर्मदंड : राजा से ऊपर शास्त्र शंकराचार्य परंपरा में धर्मदंड का अर्थ था—राजा भी शास्त्र के अधीन है नीति, करुणा और लोकहित से विचलन पर उसे चेताया जा सकता है,धर्माचार्य राजभक्त नहीं, राजप्रबोधक होता है.. मध्यकाल से आधुनिक काल : गिरता हुआ शिखर समय के साथ शंकराचार्य परंपरा में तीन परिवर्तन हुए—(क) वैचारिक ऊँचाई से औपचारिक प्रतिष्ठा तक.
दर्शन → अनुष्ठान लोकमार्गदर्शन → संस्थागत पद निर्भीक विवेक → सावधान बयान (ख) सत्ता से दूरी के स्थान पर सत्ता-समीपता,जहाँ शंकराचार्य का कार्य सत्ता को धर्म की कसौटी पर कसना था,वहीं धीरे-धीरे वे सत्ता से मान्यता पाने वाले संत बनते चले गए। (ग) राष्ट्र के प्रश्नों पर मौन या विभाजनकारी स्वरआ धुनिक भारत में—सांस्कृतिक राष्ट्रवाद,मंदिर, परंपरा, शिक्षा, भाषा,आक्रांताओं के ऐतिहासिक मूल्यांकन,इन विषयों पर शंकराचार्य परंपरा का स्वर या तो मौन रहा या विवादास्पद। अभिमुक्तेश्वरानंद : समस्या व्यक्ति नहीं, प्रवृत्ति है,यह स्पष्ट होना चाहिए कि प्रश्न अभिमुक्तेश्वरानंद जी व्यक्ति का नहीं,बल्कि उस धार्मिक दृष्टि का है जो—राष्ट्र को सत्ता की इकाई मानती है, सभ्यता की नहीं,धर्म को निजी आचरण मानती है, सार्वजनिक नैतिकता नहीं,राज्य को प्रश्नों से मुक्त समझती है, धर्म को सीमित
जब कोई शंकराचार्य—ऐतिहासिक आक्रमणों पर अस्पष्टता रखे,राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता पर राजनीतिक चश्मे से बोले,या धर्म की जगह राजनीतिक नैरेटिव को बढ़ावा दे,तो समस्या व्यक्ति नहीं, शंकर परंपरा का क्षरण है।यदि मैं शंकराचार्य होता : एक वैकल्पिक घोषणापत्रय,दि आज मैं शंकराचार्य होता, तो—(1) मैं कहता : धर्म सत्ता से ऊपर हैसरकार आए-जाए, धर्म स्थायी है,संविधान बदला जा सकता है, संस्कृति नहीं,कानून मानव लिखता है, धर्म सभ्यता गढ़ती है) मैं धर्मदंड को पुनः सक्रिय करता,सत्ता को लोकधर्म की याद दिलाता शिक्षा, संस्कृति, इतिहास पर हस्तक्षेप करता,राजनीतिक सुविधा के लिए सत्य के साथ समझौता नहीं करता मैं राष्ट्र को धर्म का विस्तार मानता,भारत केवल भूगोल नहीं, संस्कार-भूमि है
शंकराचार्य का कर्तव्य है इस भूमि की आत्मा की रक्षा सांस्कृतिक पुनर्जागरण : शंकराचार्य परंपरा का भविष्य,आज आवश्यकता है—नए आदि शंकराचार्य की नहीं, बल्कि आदि शंकराचार्य के पुनर्पाठ कीशंकराचार्य को चाहिए—टीवी स्टूडियो से बाहर निकलना राजनीतिक खेमों से दूरीऔर सभ्यता के प्रश्नों पर स्पष्ट, निर्भीक, तर्कसंगत स्वर देता.शिखर फिर ऊँचा हो सकता है शंकराचार्य पद भारत का नैतिक शिखर है।
यदि यह शिखर सत्ता की छाया में चला जाए,तो धर्म बौना और राजनीति निरंकुश हो जाती है।आज प्रश्न यह नहीं कि शंकराचार्य कौन है,प्रश्न यह है कि—क्या शंकराचार्य अभी भी शंकर की परंपरा में है?यदि उत्तर “नहीं” है,तो सांस्कृतिक पुनर्जागरण केवल आंदोलन नहीं,धर्म का कर्तव्य बन जाता है।
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