वंदेमातरम श्रृंखला 69
मातृभूमि का दार्शनिक अर्थ और ‘वंदे मातरम्’भूमि नहीं, बोध
मातृभूमि शब्द सुनते ही आधुनिक मन अक्सर उसे भौगोलिक सीमा, राजनीतिक नक़्शा या प्रशासनिक इकाई के रूप में समझ लेता है। यही आधुनिकता की सबसे बड़ी वैचारिक त्रुटि है। भारत में भूमि कभी केवल मिट्टी नहीं रही; वह माता रही है। यही कारण है कि भारत ने ‘देश’ नहीं कहा, मातृभूमि कहा; और इसी मातृभूमि के चरणों में नमन का मंत्र बना — वंदे मातरम्।
‘वंदे मातरम्’ कोई गीत नहीं, कोई नारा नहीं, कोई भावुक उद्घोष भी नहीं — यह भारत की दार्शनिक घोषणा है कि राष्ट्र मनुष्य की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि मनुष्य राष्ट्र के संस्कार के लिए जन्म लेता है। मातृभूमि : पश्चिमी भूमि-बोध से भिन्न भारतीय दृष्टि
पश्चिमी दर्शन में भूमि एक संसाधन (resource) है —जिसे जोतना है, बाँटना है, बेचना है, जीतना है।राज्य भूमि पर अधिकार करता है, नागरिक उससे लाभ उठाता है।भारतीय दर्शन में भूमि संसाधन नहीं, संबंध है।यहाँ भूमि को माता कहा गया क्योंकि:वह बिना शर्त देती हैबिना अपेक्षा पालती है बिना शिकायत सहती है,ऋग्वेद में पृथ्वी को “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” कहा गया —अर्थात भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ। यह संबंध स्वामित्व का नहीं, कर्तव्य का है।यहीं से ‘वंदे मातरम्’ का दार्शनिक आधार जन्म लेता है।
मातृभूमि और माता : जैविक नहीं, नैतिक संबंध माता केवल जन्म देने वाली नहीं होती —माता वह होती है जो:संस्कार देती हैसीमाएँ सिखाती है ,त्याग की शिक्षा देती है।भारत में भूमि को माता कहने का अर्थ यह नहीं कि वह हमें जन्म देती है, बल्कि यह कि वह हमें मनुष्य से नागरिक, और नागरिक से संस्कारित व्यक्ति बनाती है। लूपइसलिए मातृभूमि की रक्षा केवल सैनिक कर्तव्य नहीं, नैतिक उत्तरदायित्व है।यह रक्षा तलवार से कम, चरित्र से अधिक होती है।
‘वंदे मातरम्’ : नमन की दार्शनिक क्रिया वंदे’ का अर्थ केवल जयकार नहीं है।संस्कृत में ‘वंदन’ का अर्थ है —स्वीकार करना, झुकना, आत्मसमर्पण करना। जब कोई कहता है वंदे मातरम् — तो वह कह रहा होता है:“मैं अपने अहंकार को इस मातृभूमि के चरणों में रखता हूँ।”यह उद्घोष सत्ता के विरुद्ध नहीं,यह उद्घोष स्वार्थ के विरुद्ध है।इसलिए ‘वंदे मातरम्’ किसी राजनीतिक दल का नारा नहीं हो सकता। यह व्यक्ति और राष्ट्र के बीच आत्मिक अनुबंध है।
बंकिमचंद्र और राष्ट्र का आध्यात्मिक पुनर्जागरण,बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वंदे मातरम्’ ऐसे समय में लिखा,जब भारत राजनीतिक रूप से पराजित था,लेकिन मानसिक रूप से अभी जीवित था। उन्होंने राष्ट्र को देवी के रूप में देखा —न कि इसलिए कि भारत शक्तिशाली था,बल्कि इसलिए कि भारत पीड़ित होते हुए भी पवित्र था।यह दृष्टि पश्चिमी राष्ट्रवाद से भिन्न थी: वहाँ राष्ट्र शक्ति का प्रतीक है ,यहाँ राष्ट्र तपस्या का प्रतीक है ,वंदे मातरम्’ का देवी-रूप कोई मूर्ति नहीं, वह भारत की आत्मा का मानवीकरण है।
मातृभूमि और धर्म : साम्प्रदायिक नहीं, सांस्कृतिक ,,अक्सर ‘वंदे मातरम्’ पर यह आरोप लगाया गया कि यह धार्मिक है।यह आरोप स्वयं में दार्शनिक अज्ञान है।भारत में ‘धर्म’ का अर्थ पूजा-पद्धति नहीं, धर्म का अर्थ है — जो धारण करे। मातृभूमि को माता मानना कोई संप्रदाय नहीं, यह एक सभ्यतागत मूल्य है।
जब कोई नदी को माँ कहता है,तो वह धर्म नहीं कर रहा —वह कृतज्ञता प्रकट कर रहा है। आधुनिक भारत और मातृभूमि का संकट,आज का भारत ‘वंदे मातरम्’ कह तो रहा है,पर मातृभूमि को उपभोग की वस्तु समझने लगा है।जंगल केवल खनन क्षेत्र बन गएनदियाँ केवल जल-स्रोत,पर्वत केवल पर्यटन स्थल,मातृभूमि माँ नहीं रही, वह “प्रोजेक्ट” बनती जा रही है। यही सबसे बड़ा संकट है
जहाँ राष्ट्रवाद भावुक है, पर दार्शनिक नहीं। वंदे मातरम्’ : भविष्य की शपथ वंदे मातरम्’ केवल अतीत का स्मरण नहीं,यह भविष्य की शपथ है। यह हमें याद दिलाता है कि: राष्ट्र अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है,भूमि बाजार नहीं, विरासत है ,नागरिक उपभोक्ता नहीं, रक्षक है,जब तक यह भाव जीवित रहेगा, भारत केवल एक देश नहीं, एक संस्कार बना रहेगा।
:नारा नहीं, संकल्प,जो ‘वंदे मातरम्’ को केवल गीत समझते हैं,वे ,भारत को केवल नक़्शा समझते हैं। जो इसे संकल्प मानते हैं,वे जानते हैं — भारत जीता नहीं जाता, भारत जिया जाता है।मातृभूमि कोई भूमि नहीं, वह हमारी आत्मिक पहचान है।और उस पहचान के सामने एक ही शब्द सार्थक है —वंदे मातरम्।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें