वंदेमातरम और भारत का वाम पंथ!
वन्देमातरम श्रृंखला 68
वंदे मातरम भारत का राष्ट्रीय गीत है, जो स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बना, जबकि वामपंथी विचारधारा ने इसके राष्ट्रवादी स्वरूप पर ऐतिहासिक विवाद खड़े किए। यह विस्तृत लेख इसकी पृष्ठभूमि, विवादों और वामपंथी आलोचना को समेटेगा। यह विश्लेषण राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से प्रस्तुत है। वंदे मातरम का उद्भवबंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1882 में उपन्यास 'आनंदमठ' में वंदे मातरम की रचना की, जो संस्कृत-बंगाली मिश्रित भाषा में है। यह गीत मातृभूमि की आराधना करता है, स्वदेशी आंदोलन में नारा बना। 1905 के बंगाल विभाजन विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे गाया, जिससे यह राष्ट्रवादी जागरण का प्रतीक बना। संविधान सभा ने 1950 में इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया, जन गण मन के समकक्ष। 2025 में इसके 150 वर्ष पूरे होने पर PIB ने एकता और गौरव की विरासत पर जोर दिया। वामपंथी आलोचना की जड़ें वामपंथियों ने वंदे मातरम को 'हिंदू राष्ट्रवाद' का प्रतीक बताकर खारिज किया, विशेषकर मुस्लिम विरोधी भावना का आरोप लगाया। 1937 में कांग्रेस अधिवेशन में नेहरू ने इसका विरोध किया, क्योंकि दूसरे छंदों में देवी-रूपी मातृभूमि का वर्णन धार्मिक लगता था। वामपंथी इतिहासकारों ने दावा किया कि यह 'भारत माता' को हिंदू देवी के रूप में चित्रित करता है, जो धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध है। एनसीईआरटी किताबों में मनुस्मृति जैसे ग्रंथों के साथ जोड़कर वामपंथ ने सामाजिक विभाजन को बढ़ावा दिया। ऐतिहासिक साजिश का पर्दाफाश वामपंथी इतिहासकारों ने भारत को 'हजारों वर्ष पुराना राष्ट्र' मानने से इनकार किया, जबकि प्राचीन ग्रंथ राष्ट्र की अवधारणा सिद्ध करते हैं। यूट्यूब विडियो में तर्क दिया गया कि मिशनरी कैथरीन मेयो की 'मदर इंडिया' (1927) को वामपंथ ने प्रचारित कर मनुवाद विरोध फैलाया। गांधीजी ने भी किताब की निंदा की, लेकिन वामपंथियों ने गांधी के विचारों को दबाया। स्वतंत्रता के बाद वाम प्रभाव वाली NCERT ने मनुस्मृति को 'कानून की किताब' बताकर नफरत भरा। यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विरुद्ध साजिश थी।
वर्तमान संदर्भ2025-26 में अमित शाह जैसे नेताओं ने इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की उद्घोषणा कहा। पीएम मोदी ने 50-100 वर्ष पूरे होने पर गुलामी-अपातकाल का उल्लेख कर इसका महत्व रेखांकित किया। वामपंथ का विरोध जारी है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों में गायन को वैकल्पिक माना। हिंदू जागृति समिति जैसे संगठन इसे अनिवार्य करने की मांग करते हैं। राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया वंदे मातरम ने क्रांतिकारियों को लाठियां सहने की शक्ति दी। वामपंथी एजेंडा समाज तोड़ने का था, जबकि यह मातृभूमि भक्ति है। आज kautilya फाउंडेशन जैसे संस्थान इसे पुनर्जीवित कर रहे।
वामपंथियों ने वंदे मातरम का विरोध मुख्यतः इसके धार्मिक और सांप्रदायिक स्वरूप को लेकर किया, क्योंकि यह आनंदमठ उपन्यास का हिस्सा है जिसमें हिंदू संन्यासियों का विद्रोह चित्रित है। वे इसे मुस्लिम-विरोधी और मूर्तिपूजा को बढ़ावा देने वाला मानते हैं। यह विवाद 1937 से चला आ रहा है। धार्मिक आपत्तिवामपंथी तर्क देते हैं कि गीत के बाद के छंदों में भारतमाता को दुर्गा, लक्ष्मी जैसी देवियों के रूप में वर्णित किया गया है, जो इस्लाम के एकेश्वरवाद के विरुद्ध है। गांधी ने 1940 में कहा कि इसे मुसलमानों को ठेस पहुंचाने के इरादे से न गाया जाए। नेहरू ने 1937 में कांग्रेस अधिवेशन में इसे सीमित रखा ताकि सांप्रदायिक सद्भाव बना रहे। DMK सांसद ए राजा ने 2025 में लोकसभा में दावा किया कि आनंदमठ में मुसलमानों को बाहर निकालने और मस्जिदों को तोड़ने का उल्लेख है, जो हिंदू राष्ट्रवाद को दर्शाता है। राजनीतिक कारण। मुस्लिम लीग ने 1937 में इसे इस्लाम-विरोधी घोषित किया, जिसे वामपंथियों ने समर्थन दिया क्योंकि वे धर्मनिरपेक्षता को प्राथमिकता देते हैं। नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस को पत्र लिखा कि यह मुसलमानों को भड़का सकता है। वाम इतिहासकार इसे ब्रिटिश के साथ-साथ मुस्लिम शासन विरोधी बताते हैं। 1937 के फैसले में केवल पहले दो छंद स्वीकार किए गए, बाकी को हटा दिया गया ताकि विवाद न हो। ऐतिहासिक संदर्भआनंदमठ 1770 के बंगाल अकाल और संन्यासी विद्रोह पर आधारित है, जहां ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का उल्लेख है, लेकिन वामपंथ इसे सामान्य मुस्लिम विरोध से जोड़ते हैं। 2009 देवबंद फतवे ने भी एकेश्वरवाद का हवाला दिया। वामपंथी इसे राष्ट्रगान न बनाने का तर्क देते हैं क्योंकि धुन विदेशी दृष्टि से कमजोर है।
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