'मौत का साया' ले उड़ा पांच प्राण: अशोक राठी परिवार की मार्मिक अंतिम पुकार - कौटिल्य का भारत

Breaking News

Home Top Ad

विज्ञापन के लिए संपर्क करें - 9415671117

Post Top Ad

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

'मौत का साया' ले उड़ा पांच प्राण: अशोक राठी परिवार की मार्मिक अंतिम पुकार

  

'मौत का साया' ले उड़ा पांच प्राण: अशोक राठी परिवार की मार्मिक अंतिम पुकार



छवि सोशल मीडिया


मौत के साये में डूबा एक परिवार: सहारनपुर की सरसावा त्रासदी मानसिक संकट की चीख जनवरी 2026 की ठंडी सुबह उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के सरसावा क्षेत्र में एक ऐसा दृश्य प्रकट हुआ, जो हृदय को विदीर्ण कर देने वाला था। कौशिक विहार के एक साधारण मकान के भीतर, बंद कमरे में पांच प्राणों का अंतिम संस्कार स्वयं ही हो चुका था। 40 वर्षीय अशोक राठी—राजस्व विभाग में अमीन के पद पर कार्यरत एक साधारण सेवक—अपनी 70 वर्षीय मां विद्यावती, 37 वर्षीय पत्नी अंजता, और दो नन्हे सपूतों—16 वर्षीय कार्तिक व 13 वर्षीय देव—के साथ जीवन की अंतिम यात्रा पर प्रस्थित हो चुके थे। 

20 जनवरी की वह काली रात, जब पूरा परिवार एक ही कमरे में भय के आगोश में समेटा गया, आज भी स्थानीयता के अंतर्मन को कुरेद रही है।यह केवल एक अपराध की फाइल नहीं, बल्कि उस अदृश्य 'मौत के साये' की अमिट कहानी है, जिसका भय अशोक के मन को वर्षों से खोखला कर रहा था। पड़ोसियों के अनुसार, वे बार-बार यही दोहराते: "मौत का साया मेरा पीछा नहीं छोड़ता।" इसी आतंक ने पूरे परिवार को एक ही कमरे में बांध दिया था—एक किल्ला, जो अंततः उनकी समाधि बन गया। 

प्रारंभिक जांच में जहर का सेवन सामने आया, जो एक ही रात में सबको लील गया।अशोक का मानसिक संघर्ष कोई नई बात नहीं थी। पिता की असमय मृत्यु के बाद शुरू हुआ अवसाद, कोविड की महामारी में विकराल रूप धारण कर चुका था। पीजीआई चंडीगढ़ में मनोचिकित्सकीय उपचाररत रहने के बावजूद, वे छाया से जूझते रहे। एक वर्ष पूर्व की वह कोशिश—परिवार को नींद की गोलियों से हराने की—एक चेतावनी थी, जो अनसुनी रह गई। 

समाज की उस उदासीनता ने, जहाँ मानसिक रोगी को 'पागल' कहकर टाल दिया जाता है, इस त्रासदी को जन्म दिया।सबसे मार्मिक था वह अंतिम संदेश। रात करीब तीन बजे बहन मोहिनी के फोन पर आठ वॉयस नोट्स—एक भयानक स्वीकारोक्ति। "मैंने भयानक गलती कर दी," उन्होंने कहा, परिवार की विदाई सुनाई, एटीएम पासवर्ड और संपत्ति की कुंजियां सौंप दीं। उन कंठस्वरों में था हताशा का सैलाब, भय का तूफान, और शायद एक अंतिम पुकार मदद की।यह घटना भारत के मानसिक स्वास्थ्य तंत्र की पोल खोलती है। जहां एक ओर आंकड़े चीखते हैं—हर छठा व्यक्ति अवसाद से जूझ रहा—वहां दूसरी ओर सहायता के द्वार बंद। सरसावा की यह त्रासदी सवाल छोड़ जाती है: कब तक हम 'मौत के साये' को अनदेखा करेंगे? कब आएगा वह दिन, जब मन की बीमारी को शरीर जितना सम्मान मिले? अशोक का परिवार चला गया, किंतु उनकी चीख आज भी गूंज रही है—सुन लो, सुधारो, बचाओ!!








कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Post Bottom Ad