संस्कृति, सेवा और सरस्वती साधना का जीवंत प्रतीक: पंडित चंद्रबली मिश्रा,"टॉफी बाबा"
बस्ती से वेदप्रकाश सिंह
तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ONGC) से सेवानिवृत्त अधिकारी पंडित चंद्रबली मिश्रा आज बस्ती जनपद में एक विशिष्ट सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना के रूप में चर्चित हैं। सेवा-निवृत्ति को उन्होंने विश्राम नहीं, बल्कि समाज-सेवा, वरिष्ठजनों की सेवा, वैचारिक लेखन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का साधन बना लिया है। मां सरस्वती के प्रति उनकी गहन आराधना और निष्ठा उन्हें एक साधक-पुरुष के रूप में प्रतिष्ठित करती है।
पंडित मिश्रा द्वारा रचित पुस्तक “बस्ती वसुधा” आज बस्ती, संत कबीर नगर और सिद्धार्थनगर के विद्यार्थियों तथा शोधार्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ के रूप में स्वीकृत है। यह पुस्तक न केवल स्थानीय इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेज है, बल्कि क्षेत्रीय चेतना का बौद्धिक आधार भी प्रस्तुत करती है।
उनकी दैनिक दिनचर्या अपने आप में एक संदेश है। प्रातः लगभग 10 बजे झोला लेकर निकलना, तीन-चार घंटे दीवानी कचहरी एवं अन्य सार्वजनिक स्थलों पर भ्रमण करना, और लौटते समय सभी को टॉफी वितरित करते हुए आशीर्वाद देना—यह सब केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और सामाजिक समरसता का जीवंत अभ्यास है। वे प्रत्येक व्यक्ति का सम्मान करते हुए सबकी जय-जयकार करते हैं, जिससे वातावरण सकारात्मक ऊर्जा से भर उठता है।
बसंत पंचमी के पावन अवसर पर पंडित चंद्रबली मिश्रा ने मां सरस्वती की आराधना के साथ युवाओं और बच्चों के उज्ज्वल, सुसंस्कृत एवं सफल जीवन की कामना की। उनका स्पष्ट उद्घोष—“यह देश राम और कृष्ण का है, यह देश सरस्वती और गणेश का है, यह देश ब्रह्मा और विष्णु का है”—भारतीय सांस्कृतिक आत्मा का निर्भीक उद्घाटन है।
निस्संदेह, पंडित चंद्रबली मिश्रा आज के समय में संस्कृति, सेवा और साधना के दुर्लभ समन्वय के प्रतीक हैं, जिनकी उपस्थिति समाज को दिशा और ऊर्जा प्रदान करती है।

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