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सोमवार, 5 जनवरी 2026

कांग्रेस सदा अधर्म क़े साथ ही देश में ख़डी मिली है,"प्रेस से भागते नेता और भागता सच: राष्ट्रवादी विमर्श की कसौटी पर कांग्रेस



चयनात्मक संवेदना और मौन की राजनीति-
फिलिस्तीन पर मुखर, बांग्लादेश के हिंदुओं पर खामोश कांग्रेस,लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की पहचान उनके घोषणापत्र से नहीं, बल्कि उनकी संवेदनाओं की निरंतरता और नैतिक साहस से होती है। जब कोई दल किसी एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर मुखर हो और उसी समय दूसरे, उससे भी अधिक निकट और मानवीय संकट पर मौन साध ले, तो प्रश्न केवल राजनीति का नहीं रह जाता—वह प्रश्न नैतिकता, राष्ट्रहित और ईमानदारी का बन जाता है।
कांग्रेस की वर्तमान राजनीति इसी विरोधाभास का जीवंत उदाहरण बन चुकी है।
पत्रकार वार्ता से पलायन: असहज प्रश्नों का डर बीते वर्षों में कांग्रेस नेतृत्व का पत्रकार वार्ताओं से बचना कोई संयोग नहीं, बल्कि एक राजनीतिक रणनीति है। पत्रकारों के प्रश्न आज नीतियों पर नहीं, बल्कि दोहरे मापदंडों पर केंद्रित हैं—और यही प्रश्न कांग्रेस को असहज करते हैं। सवाल पूछे जाते हैं कि फिलिस्तीन पर तीव्र प्रतिक्रिया देने वाली कांग्रेस, बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों पर क्यों चुप है? इन सवालों से बचना दरअसल उत्तरदायित्व से बचना है।
लोकतंत्र में मौन कभी तटस्थ नहीं होता—वह या तो सहमति होता है या कायरता।
फिलिस्तीन: मानवीय चिंता या राजनीतिक संकेत? फिलिस्तीन के मुद्दे पर कांग्रेस की भावनात्मक भाषा और आक्रामक बयानबाज़ी को केवल मानवीय संवेदना कहकर नहीं टाला जा सकता। यह रुख एक खास वोट-बैंक संकेत भी देता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बोलना आसान है, क्योंकि वहाँ न तो प्रत्यक्ष जवाबदेही होती है और न ही घरेलू राजनीतिक जोखिम। लेकिन राष्ट्रवाद यह सिखाता है कि विदेश नीति भावनाओं से नहीं, राष्ट्रीय हित और संतुलन से संचालित होती है। किसी एक पक्ष के प्रति अंधी सहानुभूति भारत जैसे संप्रभु राष्ट्र की कूटनीतिक परंपरा के विपरीत है।
बांग्लादेश के हिंदू: असुविधाजनक पीड़ा,बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले, मंदिरों का विध्वंस, महिलाओं के साथ हिंसा और संपत्तियों पर कब्ज़े की घटनाएँ कोई छिपा हुआ सच नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें, वीडियो और प्रत्यक्षदर्शी बयान इस पीड़ा को लगातार उजागर कर रहे हैं। इसके बावजूद कांग्रेस का मौन बताता है कि यह पीड़ा राजनीतिक रूप से असुविधाजनक है।जब पीड़ित हिंदू हों और अत्याचारी इस्लामी कट्टरपंथी, तब कांग्रेस की कथित धर्मनिरपेक्षता अचानक मौनव्रत धारण कर लेती है। यह मौन मानवाधिकारों के प्रति उदासीनता नहीं, बल्कि चयनात्मक नैतिकता का प्रमाण है।
राष्ट्रवाद और मानवाधिकार: दोहरा पैमाना क्यों? सच्चा राष्ट्रवाद किसी एक समुदाय, देश या विचारधारा तक सीमित नहीं होता। वह हर उस पीड़ा के साथ खड़ा होता है, जहाँ अन्याय हो। लेकिन कांग्रेस का दृष्टिकोण—कुछ पीड़ाओं पर बयान,कुछ पर चुप्पी,और कुछ पर प्रश्न पूछने वालों से पलायन,यह दर्शाता है कि मानवाधिकार उसके लिए मूल्य नहीं, उपकरण हैं।दोगली रणनीति का राजनीतिक मूल्य
इस दोहरे चरित्र का परिणाम कांग्रेस को लगातार भुगतना पड़ रहा है। राष्ट्रवादी चेतना से जुड़ा समाज अब यह समझ चुका है कि—यह राजनीति साहस से नहीं, संकोच से चलती है,यह नैतिकता से नहीं, समीकरणों से संचालित होती है
और शायद यही कारण है कि कांग्रेस आज न तो स्पष्ट विपक्ष बन पा रही है, न ही वैकल्पिक नेतृत्व।
फिलिस्तीन पर बोलना आसान है, बांग्लादेश के हिंदुओं पर बोलना साहस मांगता है।
पत्रकार वार्ता में सवालों का सामना करना लोकतंत्र है, उनसे भागना राजनीतिक पतन का संकेत। कांग्रेस यदि वास्तव में मानवाधिकार और धर्मनिरपेक्षता की पक्षधर है, तो उसे अपनी चयनात्मक संवेदनाओं से बाहर आना होगा। अन्यथा इतिहास उसे एक ऐसे दल के रूप में याद रखेगा, जिसने राष्ट्रवाद नहीं, राजनीतिक सुविधा को अपना धर्म बनाया। देश में जबभी धर्म अधर्म लड़ते है तब कांग्रेस हमेशा अधर्म क़े ही साथ रही है यही उसका पतंनमुक्ख चरित्र है.
राजेंद्र नाथ तिवारी

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