वंदे मातरम् बनाम नैरेटिव पॉलिटिक्स
(राष्ट्र, स्मृति और वैचारिक अधिग्रहण पर एक संपादकीय निबंध)
भारत में राजनीति केवल सत्ता-प्रबंधन का उपकरण नहीं रही; वह लंबे समय से अर्थ-निर्माण (meaning-making) की प्रयोगशाला भी रही है। यहाँ प्रश्न यह नहीं होता कि क्या घटित हुआ, बल्कि यह होता है कि किस तरह बताया गया। इसी प्रक्रिया को आज की भाषा में नैरेटिव पॉलिटिक्स कहा जाता है। इस नैरेटिव पॉलिटिक्स की सबसे बड़ी कसौटी—और शायद सबसे बड़ी बाधा—वंदे मातरम् है।
यह संपादकीय उसी टकराव का दस्तावेज़ है:एक ओर भारत की ऐतिहासिक आत्मा, दूसरी ओर उसके चारों ओर बुना गया वैचारिक जाल।
नैरेटिव पॉलिटिक्स क्या है?-नैरेटिव पॉलिटिक्स सत्ता का वह रूप है जिसमें—
इतिहास को तथ्यों से नहीं, व्याख्याओं से नियंत्रित किया जाता है प्रतीकों को उनके मूल संदर्भ से काटकर नया अर्थ दिया जाता है असुविधाजनक स्मृतियों को “विवाद” घोषित कर दिया जाता है,यह राजनीति चुनाव से नहीं, पाठ्यपुस्तकों, मीडिया विमर्श और बौद्धिक संस्थानों से चलती है।
भारत में नैरेटिव पॉलिटिक्स का लक्ष्य रहा है—राष्ट्र की चेतना को सांस्कृतिक से हटाकर केवल संवैधानिक बना देना।
वंदे मातरम् : एक असुविधाजनक सत्य,वंदे मातरम् इस नैरेटिव के लिए असुविधाजनक है, क्योंकि—यह राष्ट्र को माता कहता है यह राष्ट्रवाद को आध्यात्मिक बनाता है,यह औपनिवेशिक सत्ता से पहले की स्मृति को जीवित रखता है
यह गीत भारत को केवल नागरिकों का समूह नहीं,सांस्कृतिक इकाई घोषित करता है।और यही बात कुछ विचारधाराओं को असहज करती है। इतिहास से काटकर राजनीति में फेंका गया प्रतीक,नैरेटिव पॉलिटिक्स की पहली चाल होती है—
इतिहास को संदर्भहीन कर देना।वंदे मातरम् को—उसके कालखंड से अलग कर
उसके आंदोलनकारी संदर्भ से काटकर,केवल कुछ पंक्तियों तक सीमित कर दिया गया फिर पूछा गया—“क्या यह सबके लिए स्वीकार्य है?”यह प्रश्न ईमानदार नहीं है,
क्योंकि इससे पहले यह नहीं बताया गया कि—यह क्यों लिखा गया
किसके विरुद्ध लिखा गया,किन परिस्थितियों में गाया गया
जब राष्ट्रवाद ‘संदेह’ बना दिया गया -स्वतंत्रता के बाद भारत में एक विचित्र प्रयोग हुआ— राष्ट्रवाद को ही संदिग्ध बना दिया गया।देशभक्ति को ‘अतिरेक’ कहा गया
सांस्कृतिक गर्व को ‘खतरा’ बताया गया और वंदे मातरम् जैसे प्रतीकों को ‘विभाजनकारी’यह सब उस समय हुआ जब—अंग्रेज चले गए थे,लेकिन अंग्रेजी मानसिकता बनी रही,नैरेटिव यह बना—भारत को प्रेम करो, पर ज़्यादा नहीं।
संविधान सभा का निर्णय और उसकी अनदेखी-नैरेटिव पॉलिटिक्स का दूसरा चरण होता है— असुविधाजनक निर्णयों को चुपचाप किनारे कर देना।
संविधान सभा ने—"वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत माना,और जन गण मन को राष्ट्रगान
यह संतुलन था, समझौता नहीं।लेकिन बाद की पीढ़ियों को यह संतुलन पढ़ाया नहीं गया। उन्हें केवल यह बताया गया—राष्ट्रगान अनिवार्य है,राष्ट्रीय गीत वैकल्पिक है
यहीं से वंदे मातरम् को धीरे-धीरे,औपचारिक स्मृति से बाहर धकेल दिया गया।
मीडिया और अकादमिक जगत की भूमिका-नैरेटिव पॉलिटिक्स अकेले नहीं चलती। इसके तीन स्तंभ होते हैं—अकादमिक संस्थान,मीडिया,सांस्कृतिक मंच इन तीनों ने मिलकर—वंदे मातरम् को “बहस योग्य” बना दिया जबकि उसके ऐतिहासिक योगदान पर बहस की कोई ज़रूरत नहीं थी,जब कोई चीज़ लगातार विवाद में रखी जाए, तो वह धीरे-धीरे अपरिचित और फिर अस्वीकार्य लगने लगती है।
नई पीढ़ी और स्मृति-विच्छेदन-सबसे बड़ा नुकसान हुआ— नई पीढ़ी का।
आज का युवा—वंदे मातरम् जानता है, पर समझता नहीं उसे बताया गया कि यह “संवेदनशील मुद्दा” है लेकिन यह नहीं बताया गया कि यह संघर्ष का गीत है
यह स्मृति-विच्छेदन (memory erasure)किसी भी राष्ट्र के लिए घातक होता है।
क्या वंदे मातरम् बनाम जन गण मन?यह भी एक नैरेटिव ट्रिक है— दो प्रतीकों को आपस में टकरा देना।जबकि सच्चाई यह है—दोनों भारत की आत्मा के अलग-अलग स्वर हैं दोनों का जन्म अलग संदर्भों में हुआ,दोनों का उद्देश्य एक ही है—राष्ट्र की एकता,टकराव कृत्रिम है, उद्देश्य केवल विभाजन है।
कौटिल्य दृष्टि : नैरेटिव क्यों खतरनाक है?कौटिल्य ने कहा था—“राज्य का पतन शस्त्रों से नहीं,स्मृति-भ्रंश से होता है।”नैरेटिव पॉलिटिक्स—स्मृति को तोड़ती है
प्रतीकों को कमजोर करती है और नागरिक को जड़ों से काट देती है
वंदे मातरम् का विरोध असल में भारत की दीर्घ सांस्कृतिक निरंतरता का विरोध है।
इस टकराव का समाधान—चुप्पी नहीं-प्रतिबंध नहीं-बल्कि खुली बहस है
नई पीढ़ी को—पूरा इतिहास बताया जाए-सभी दृष्टिकोण रखे जाएँ-और निर्णय करने का अधिकार दिया जाए-डर के साथ पढ़ाया गया इतिहास-कभी भी राष्ट्र नहीं बनाता।अब प्रश्न यह नहीं होना चाहिए—“वंदे मातरम् किसका एजेंडा है?”सही प्रश्न यह है—“भारत का इतिहास किसके नैरेटिव में कैद है?”
जब तक इस प्रश्न पर ईमानदारी से विमर्श नहीं होगा, तब तक वंदे मातरम् और नैरेटिव पॉलिटिक्स का यह संघर्ष जारी रहेगा।वंदे मातरम् कोई चुनौती नहीं,
वह भारत की चेतना की परीक्षा है।जो इसे सह नहीं पाता, वह दरअसल भारत की स्मृति से डरता है।
(राष्ट्र, स्मृति और वैचारिक अधिग्रहण पर एक संपादकीय निबंध)
भारत में राजनीति केवल सत्ता-प्रबंधन का उपकरण नहीं रही; वह लंबे समय से अर्थ-निर्माण (meaning-making) की प्रयोगशाला भी रही है। यहाँ प्रश्न यह नहीं होता कि क्या घटित हुआ, बल्कि यह होता है कि किस तरह बताया गया। इसी प्रक्रिया को आज की भाषा में नैरेटिव पॉलिटिक्स कहा जाता है। इस नैरेटिव पॉलिटिक्स की सबसे बड़ी कसौटी—और शायद सबसे बड़ी बाधा—वंदे मातरम् है।
यह संपादकीय उसी टकराव का दस्तावेज़ है:एक ओर भारत की ऐतिहासिक आत्मा, दूसरी ओर उसके चारों ओर बुना गया वैचारिक जाल।
नैरेटिव पॉलिटिक्स क्या है?-नैरेटिव पॉलिटिक्स सत्ता का वह रूप है जिसमें—
इतिहास को तथ्यों से नहीं, व्याख्याओं से नियंत्रित किया जाता है प्रतीकों को उनके मूल संदर्भ से काटकर नया अर्थ दिया जाता है असुविधाजनक स्मृतियों को “विवाद” घोषित कर दिया जाता है,यह राजनीति चुनाव से नहीं, पाठ्यपुस्तकों, मीडिया विमर्श और बौद्धिक संस्थानों से चलती है।
भारत में नैरेटिव पॉलिटिक्स का लक्ष्य रहा है—राष्ट्र की चेतना को सांस्कृतिक से हटाकर केवल संवैधानिक बना देना।
वंदे मातरम् : एक असुविधाजनक सत्य,वंदे मातरम् इस नैरेटिव के लिए असुविधाजनक है, क्योंकि—यह राष्ट्र को माता कहता है यह राष्ट्रवाद को आध्यात्मिक बनाता है,यह औपनिवेशिक सत्ता से पहले की स्मृति को जीवित रखता है
यह गीत भारत को केवल नागरिकों का समूह नहीं,सांस्कृतिक इकाई घोषित करता है।और यही बात कुछ विचारधाराओं को असहज करती है। इतिहास से काटकर राजनीति में फेंका गया प्रतीक,नैरेटिव पॉलिटिक्स की पहली चाल होती है—
इतिहास को संदर्भहीन कर देना।वंदे मातरम् को—उसके कालखंड से अलग कर
उसके आंदोलनकारी संदर्भ से काटकर,केवल कुछ पंक्तियों तक सीमित कर दिया गया फिर पूछा गया—“क्या यह सबके लिए स्वीकार्य है?”यह प्रश्न ईमानदार नहीं है,
क्योंकि इससे पहले यह नहीं बताया गया कि—यह क्यों लिखा गया
किसके विरुद्ध लिखा गया,किन परिस्थितियों में गाया गया
जब राष्ट्रवाद ‘संदेह’ बना दिया गया -स्वतंत्रता के बाद भारत में एक विचित्र प्रयोग हुआ— राष्ट्रवाद को ही संदिग्ध बना दिया गया।देशभक्ति को ‘अतिरेक’ कहा गया
सांस्कृतिक गर्व को ‘खतरा’ बताया गया और वंदे मातरम् जैसे प्रतीकों को ‘विभाजनकारी’यह सब उस समय हुआ जब—अंग्रेज चले गए थे,लेकिन अंग्रेजी मानसिकता बनी रही,नैरेटिव यह बना—भारत को प्रेम करो, पर ज़्यादा नहीं।
संविधान सभा का निर्णय और उसकी अनदेखी-नैरेटिव पॉलिटिक्स का दूसरा चरण होता है— असुविधाजनक निर्णयों को चुपचाप किनारे कर देना।
संविधान सभा ने—"वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत माना,और जन गण मन को राष्ट्रगान
यह संतुलन था, समझौता नहीं।लेकिन बाद की पीढ़ियों को यह संतुलन पढ़ाया नहीं गया। उन्हें केवल यह बताया गया—राष्ट्रगान अनिवार्य है,राष्ट्रीय गीत वैकल्पिक है
यहीं से वंदे मातरम् को धीरे-धीरे,औपचारिक स्मृति से बाहर धकेल दिया गया।
मीडिया और अकादमिक जगत की भूमिका-नैरेटिव पॉलिटिक्स अकेले नहीं चलती। इसके तीन स्तंभ होते हैं—अकादमिक संस्थान,मीडिया,सांस्कृतिक मंच इन तीनों ने मिलकर—वंदे मातरम् को “बहस योग्य” बना दिया जबकि उसके ऐतिहासिक योगदान पर बहस की कोई ज़रूरत नहीं थी,जब कोई चीज़ लगातार विवाद में रखी जाए, तो वह धीरे-धीरे अपरिचित और फिर अस्वीकार्य लगने लगती है।
नई पीढ़ी और स्मृति-विच्छेदन-सबसे बड़ा नुकसान हुआ— नई पीढ़ी का।
आज का युवा—वंदे मातरम् जानता है, पर समझता नहीं उसे बताया गया कि यह “संवेदनशील मुद्दा” है लेकिन यह नहीं बताया गया कि यह संघर्ष का गीत है
यह स्मृति-विच्छेदन (memory erasure)किसी भी राष्ट्र के लिए घातक होता है।
क्या वंदे मातरम् बनाम जन गण मन?यह भी एक नैरेटिव ट्रिक है— दो प्रतीकों को आपस में टकरा देना।जबकि सच्चाई यह है—दोनों भारत की आत्मा के अलग-अलग स्वर हैं दोनों का जन्म अलग संदर्भों में हुआ,दोनों का उद्देश्य एक ही है—राष्ट्र की एकता,टकराव कृत्रिम है, उद्देश्य केवल विभाजन है।
कौटिल्य दृष्टि : नैरेटिव क्यों खतरनाक है?कौटिल्य ने कहा था—“राज्य का पतन शस्त्रों से नहीं,स्मृति-भ्रंश से होता है।”नैरेटिव पॉलिटिक्स—स्मृति को तोड़ती है
प्रतीकों को कमजोर करती है और नागरिक को जड़ों से काट देती है
वंदे मातरम् का विरोध असल में भारत की दीर्घ सांस्कृतिक निरंतरता का विरोध है।
इस टकराव का समाधान—चुप्पी नहीं-प्रतिबंध नहीं-बल्कि खुली बहस है
नई पीढ़ी को—पूरा इतिहास बताया जाए-सभी दृष्टिकोण रखे जाएँ-और निर्णय करने का अधिकार दिया जाए-डर के साथ पढ़ाया गया इतिहास-कभी भी राष्ट्र नहीं बनाता।अब प्रश्न यह नहीं होना चाहिए—“वंदे मातरम् किसका एजेंडा है?”सही प्रश्न यह है—“भारत का इतिहास किसके नैरेटिव में कैद है?”
जब तक इस प्रश्न पर ईमानदारी से विमर्श नहीं होगा, तब तक वंदे मातरम् और नैरेटिव पॉलिटिक्स का यह संघर्ष जारी रहेगा।वंदे मातरम् कोई चुनौती नहीं,
वह भारत की चेतना की परीक्षा है।जो इसे सह नहीं पाता, वह दरअसल भारत की स्मृति से डरता है।
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