इतिहास किसका है?स्मृति-विरोध, वैचारिक वर्चस्व और रोमिला थापर का इतिहास-बोध
इतिहास कोई निर्जीव अनुशासन नहीं है। वह केवल विश्वविद्यालयों की कक्षाओं, शोध-पत्रिकाओं या सेमिनारों में बंद कोई बौद्धिक प्रयोगशाला नहीं, बल्कि किसी राष्ट्र की सामूहिक स्मृति, सभ्यतागत आत्मबोध और भविष्य-दृष्टि का आधार होता है। इसलिए इतिहास पर नियंत्रण केवल अकादमिक विषय नहीं, बल्कि वैचारिक सत्ता का प्रश्न भी है।
रोमिला थापर का हालिया बयान—जिसमें उन्होंने पाठ्यपुस्तकों से मुग़लों और दिल्ली सल्तनत जैसे अध्याय हटाए जाने को “बेतुका” बताया—इसी वैचारिक सत्ता को बचाने की बेचैनी का सार्वजनिक प्रकटीकरण है। यह बयान जितना अकादमिक दिखता है, उससे कहीं अधिक वैचारिक, राजनीतिक और राष्ट्र-बोध विरोधी है।
इतिहास की ‘निरंतरता’: एक सुविधाजनक अवधारणा-रोमिला थापर बार-बार कहती हैं कि इतिहास एक निरंतर प्रक्रिया है और उसे टुकड़ों में नहीं पढ़ाया जा सकता। यह कथन आधा सच है—और आधा सच अक्सर पूरे झूठ से अधिक खतरनाक होता है। इतिहास अवश्य निरंतर है, लेकिन प्रश्न यह है किकिस दृष्टि से निरंतर? किसके अनुभव को केंद्र में रखकर?
यदि किसी सभ्यता पर बार-बार आक्रमण हुए हों, उसकी आस्था, ज्ञान-परंपरा और सांस्कृतिक प्रतीकों को योजनाबद्ध ढंग से नष्ट किया गया हो, तो क्या उस आक्रमण को भी “सांस्कृतिक विकास की प्रक्रिया” कहकर सामान्य बना देना इतिहास की ईमानदारी है?
उदाहरण के लिए—यदि किसी परिवार की पीढ़ियों की कथा में बार-बार हिंसा, विस्थापन और शोषण हो, तो क्या उस कथा को “सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया” कहकर नैतिक रूप से तटस्थ बना दिया जाएगा? नहीं।
तो फिर भारत के इतिहास के साथ यह बौद्धिक छल क्यों?मुग़ल और सल्तनत: सत्ता या आक्रमण?भारत के इतिहास में मुग़ल और सल्तनत काल कोई साधारण राजवंशीय परिवर्तन नहीं था। यह एक सभ्यतागत टकराव था—जहाँ सत्ता केवल राजनीतिक नहीं, सांस्कृतिक और धार्मिक भी थी।बाबर भारत किसी आमंत्रण पर नहीं आया था।उसने स्वयं अपनी आत्मकथा बाबरनामा में भारत को “काफ़िरों की भूमि” कहा है। फिर भी उसे भारतीय इतिहास में “संस्थापक शासक” की तरह पढ़ाया गया।
औरंगज़ेब ने सैकड़ों मंदिरों को ध्वस्त किया—यह कोई लोककथा नहीं, फ़ारसी फ़रमानों और ऐतिहासिक अभिलेखों में दर्ज तथ्य है। फिर भी उसे “जटिल व्यक्तित्व” कहकर संतुलित कर दिया गया। यही वह बिंदु है जहाँ रोमिला थापर और उनके वैचारिक सहचर इतिहासकार नैतिक साहस खो देते हैं।आक्रमण को आक्रमण कहने का साहस।
स्मृति से भय: इतिहासकारों की असली समस्या-वास्तविक समस्या यह नहीं है कि मुग़ल अध्याय हटाए जा रहे हैं।वास्तविक समस्या यह है कि अब इतिहास को सभ्यतागत स्मृति के साथ जोड़कर पढ़ने की माँग उठ रही है।लोकस्मृति—मंदिरों के खंडहर,तीर्थों की टूटी परंपराएँ,लोकगीतों में दर्ज पीड़ा,और पीढ़ियों से चली आ रही कहानियाँ—इन सबको अब तक “अविश्वसनीय” कहकर खारिज किया जाता रहा।
लेकिन जब वही स्मृति सवाल पूछने लगती है,तो इतिहासकारों को “लोकप्रिय इतिहास” से खतरा महसूस होने लगता है।यह भय अकादमिक नहीं, वैचारिक है।
‘लोकप्रिय इतिहास’ बनाम ‘पेशेवर इतिहास’: सत्ता की भाषा,रोमिला थापर का यह कहना कि लोगों को सोशल मीडिया नहीं, पेशेवर इतिहासकारों पर भरोसा करना चाहिए—अपने आप में एक अभिजात्य वक्तव्य है। क्योंकि प्रश्न यह है— क्या पेशेवर इतिहासकार कभी वैचारिक नहीं हो सकते? क्या विश्वविद्यालयों और पाठ्यपुस्तकों पर दशकों तक एक ही विचारधारा का कब्ज़ा नहीं रहा? यदि कोई आम नागरिक यह पूछे कि“हमने आक्रमणकारियों को नायक क्यों पढ़ा?” तो उसे “लोकप्रिय भ्रम” कह देना दरअसल जनता की बौद्धिक क्षमता का अपमान है। इतिहास केवल इतिहासकारों की जागीर नहीं है। वह राष्ट्र की साझा संपत्ति है।राष्ट्रवादी प्रतीकों से असहजता क्यों?यह कोई संयोग नहीं है कि जैसे-जैसे भारत राम, मंदिर, तीर्थ, सभ्यता, परंपरा इन विषयों पर खुलकर बात कर रहा है—वैसे-वैसे कुछ इतिहासकारों की भाषा तीखी और रक्षात्मक होती जा रही है।
राम को “मिथक” कहना सहज है,लेकिन बाबर को “इतिहास” कहना अनिवार्य। यह द्वंद्व अकादमिक नहीं, वैचारिक पक्षधरता है। राष्ट्रवादी चेतना से असहजता दरअसल उस इतिहास-बोध से असहजता है,जो भारत को केवल “भौगोलिक इकाई” नहीं,एक सतत सभ्यता के रूप में देखता है।
नारीवादी इतिहास और चयनात्मक स्वतंत्रता-रोमिला थापर नारीवादी इतिहास की बात करती हैं,लेकिन यह प्रश्न अनुत्तरित रहता है कि क्या विदेशी आक्रमणों में भारतीय स्त्रियों पर हुए अत्याचार इतिहास के योग्य नहीं हैं? यदि नारीवादी इतिहास केवल वैचारिक एजेंडे तक सीमित रह जाए,और सभ्यतागत पीड़ा से कट जाए, तो वह भी चयनात्मक नैतिकता का शिकार हो जाता है।
इतिहास अब प्रश्न करेगा!आज का भारत इतिहास को मिटा नहीं रहा। वह इतिहास से प्रश्न कर रहा है।आक्रमण को आक्रमण क्यों न कहा जाए? पीड़ित को केंद्र में क्यों न रखा जाए? स्मृति को प्रमाण क्यों न माना जाए? रोमिला थापर का बयान इसी प्रश्नवाचक भारत से भय की अभिव्यक्ति है। यह भय इतिहास के टूटने का नहीं, वैचारिक वर्चस्व के टूटने का भय है। इतिहास अब एकतरफ़ा नहीं चलेगा।वह न तो थोपे जाने देगा, और न ही नैतिक शून्यता में ढकेला जाएगा।क्योंकि इतिहास अंततः सत्ता का नहीं, सभ्यता का पक्ष लेता है।
रोमिला थापर एकदा वर्चस्व वाली इतिहास कार रही हैं , बर्चस्व टूटेगा तो उन्हें भयानक वैचारिक दर्द स्वाभाविक है।
राजेंद्र नाथ तिवारी

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