वन्देमातरम्, बौद्धिक दासता और यूजीसी 72 - कौटिल्य का भारत

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बुधवार, 28 जनवरी 2026

वन्देमातरम्, बौद्धिक दासता और यूजीसी 72

वन्देमातरम 72 श्रृंखला





वन्देमातरम, बौद्धिक दासता और यूजीसी
(भारतीय शिक्षा पर एक वैचारिक अभियोग)

 प्रश्न केवल गीत का नहीं, चेतना का है“वन्देमातरम्” को लेकर जब भी विवाद उठता है, वह किसी गीत, किसी पंक्ति या किसी शब्द को लेकर नहीं होता—वह वास्तव में भारत की आत्मा को लेकर असहजता का प्रकटीकरण होता है।आज जब देश स्वतंत्रता के 75 वर्ष पार कर चुका है, तब यह प्रश्न और भी तीखा हो जाता है कि—क्या भारत राजनीतिक रूप से स्वतंत्र होकर भी बौद्धिक रूप से पराधीन बना हुआ है?और यदि हाँ, तो इस बौद्धिक दासता का सबसे बड़ा संरक्षक कौन है?इस प्रश्न के केंद्र में खड़ा है—यूजीसी (University Grants Commission)जो भारत की उच्च शिक्षा का नियामक तो है,परंतु धीरे-धीरे भारतीय चेतना का अवरोधक बनता जा रहा है। वन्देमातरम् : सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उद्घोष,वन्देमातरम् न तो संयोगवश रचा गया गीत है,न ही यह किसी धार्मिक आग्रह का दस्तावेज़ है। यह औपनिवेशिक काल मे
भारत को मात्र उपनिवेश मानने वाली दृष्टि के विरुद्ध “भारत माता” की अवधारणा का सांस्कृतिक प्रतिरोध था,बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने जब वन्देमातरम् लिखा, तब—भारत राजनीतिक रूप से गुलाम था
पर सांस्कृतिक रूप से जीवित वन्देमातरम् उसी जीवित चेतना की हुंकार था।
 बौद्धिक दासता : सबसे खतरनाक गुलामी,राजनीतिक दासता दिखती है—पर बौद्धिक दासता छिपी रहती है। बौद्धिक दासता का अर्थ है—अपने ज्ञान पर अविश्वास,अपनी परंपरा पर संदेह,विदेशी दृष्टि को ही “वैज्ञानिक” मान लेना मैकाले की शिक्षा नीति ने भारत में यही किया—“भारतीय शरीर में अंग्रेज़ी मस्तिष्क”
दुर्भाग्य यह है कि स्वतंत्र भारत ने इस दासता को औपचारिक रूप से समाप्त नहीं किया, बल्कि उसे संस्थागत बना दिया।
 यूजीसी : नियामक से विचार-निर्देशक तक-यूजीसी का गठन शिक्षा के मानक सुधार हेतु हुआ था,पर आज उसकी भूमिका—पाठ्यक्रम निर्धारित करने से आगे बढ़कर विचारों की सीमा तय करने तक पहुँच गई है,आज स्थिति यह है कि—भारतीय ज्ञान परंपरा को “वैकल्पिक” कहा जाता है,पाश्चात्य सिद्धांत“मुख्यधारा” बन जाते हैं,राष्ट्रबोध को “भावनात्मक” कहकर खारिज कर दिया जाता है,यह शैक्षिक तानाशाही नहीं तो और क्या है?
वन्देमातरम् से भय : किसे और क्यों? यूजीसी से जुड़े अनेक परिपत्रों, दिशानिर्देशों और मौन स्वीकृतियों में एक बात स्पष्ट दिखती है—“राष्ट्रवादी प्रतीकों से दूरी”वन्देमातरम् को “संवेदनशील” बताया जाता है
राष्ट्रगीतों को “विवादास्पद” भारतीय प्रतीकों को “समावेशन के लिए खतरा”पर प्रश्न है— क्या भारत की पहचान स्वयं भारत के लिए ही असहज हो गई है? यदि वन्देमातरम् से समस्या है,
तो फिर—फ्रांस का राष्ट्रगान कैसे स्वीकार्य है?अमेरिका का झंडा-संस्कार क्यों स्वाभाविक है?
सेकुलरिज़्म की विकृत व्याख्या-यूजीसी और उससे प्रभावित अकादमिक जगत में “सेकुलरिज़्म” का अर्थ बन गया है—“भारतीयता से दूरी”यह भारत के संविधान की भावना के विपरीत है।संविधान—संस्कृति को नकारता नहीं उसे समन्वित करता है,वन्देमातरम् न किसी पूजा का आदेश देता है,न किसी धर्म को श्रेष्ठ ठहराता है।फिर भी उसे—धार्मिक कहकर,विवादास्पद बनाकर,पाठ्यक्रम और परिसरों से दूर रखा जाता है
यह निरपेक्षता नहीं, आत्मविस्मृति है।
यूजीसी और चयनात्मक साहस,यूजीसी का साहस देखिए—वह जाति, जेंडर, पहचान पर आक्रामक पाठ्यक्रम ला सकती है,वह पश्चिमी राजनीतिक विचारधाराओं को स्थान दे सकती है,वह भारत की आलोचना को अकादमिक स्वतंत्रता कह सकती है,पर—वन्देमातरम् पर मौन,भारतीय ज्ञान परंपरा पर संकोच,राष्ट्रबोध पर चेतावनी,यह चयनात्मक साहस दरअसल वैचारिक पक्षधरता है।
शिक्षा या वैचारिक प्रशिक्षण? आज विश्वविद्यालय—आलोचना सिखाते हैं,पर आत्मसम्मान नहीं,प्रश्न उठाते हैं,पर उत्तर खोजने की दिशा नहीं,विद्यार्थी—अपने इतिहास से कटता जा रहा है,अपनी संस्कृति पर शर्म महसूस करता है,और पश्चिमी अनुमोदन को ही सफलता मानता है,यह वही स्थिति है, जिसे बंकिमचन्द्र ने “आत्महीनता” कहा था। वन्देमातरम् : वैचारिक मुक्ति का प्रतीक,वन्देमातरम्—भूमि को माँ मानने की दृष्टि देता है-उपभोग नहीं, कर्तव्य सिखाता है-अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व जगाता है-यही कारण है कि
औपनिवेशिक शक्तियों को इससे भय था,और आज उनके वैचारिक उत्तराधिकारियों को भी है
क्योंकि जो राष्ट्र अपनी भूमि को माँ मान ले,वह फिर बाज़ार या एजेंडे से नहीं चलता।
 यूजीसी का भारतीयकरण हो!
समस्या का समाधान यूजीसी को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसका भारतीयकरण हो!आवश्यक है—
भारतीय ज्ञान परंपरा को मुख्यधारा बनाना,राष्ट्रगीतों को संवैधानिक सम्मान देना,अकादमिक स्वतंत्रता के नाम पर राष्ट्रविरोध को रोकना,शिक्षा को केवल कौशल नहीं, संस्कार बनानावन्देमातरम् एक कसौटी है
वन्देमातरम्—यह परख है कि हम कितने स्वतंत्र हैं,यह दर्पण है कि हमारी शिक्षा कितनी आत्मनिर्भर है
यदि यूजीसी और शैक्षिक संस्थान—इससे असहज हैं, तो समस्या गीत में नहीं, दृष्टि में है।आज आवश्यकता है—राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद बौद्धिक स्वराज की।और उस स्वराज का प्रथम उद्घोष आज भी वही है—वन्देमातरम्।

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