बस्ती–अयोध्या रोड :ह्ररैया से चौकड़ी टोल प्लाज़ा तक उगे ‘लॉन-विहीन होटल’ — यह सिर्फ़ व्यापार नहीं, एक मनोवैज्ञानिक और प्रशासनिक विफलता है:वेद प्रकाश शांडिल्य
इमेज शोसल मीडिया
बस्ती–अयोध्या रोड पर हरिया के आगे, चौकड़ी टोल प्लाज़ा के आसपास अचानक उग आए लॉन-विहीन होटल, ढाबा-नुमा रिसॉर्ट और तथाकथित फैमिली रेस्ट हाउसकेवल ईंट–सीमेंट की संरचनाएँ नहीं हैं। ये प्रशासनिक अंधेपन, शासन की उदासीनता और सामाजिक क्षरण के मौन प्रतीक बन चुके हैं।सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि ये बन कैसे रहे हैं —सबसे खतरनाक प्रश्न यह है कि सब कुछ जानते हुए भी शासन–प्रशासन आखिर क्यों नहीं समझना चाहता? ये होटल क्यों “लॉन-विहीन” हैं? — एक मनोवैज्ञानिक संकेत कोई भी वैध हाईवे होटल या रिसॉर्ट—खुला परिसर बनाता है पार्किंग, लॉन, पारदर्शिता रखता है,दृश्यता (Visibility) चाहता है,लेकिन यहाँ जो बन रहा है वह—सड़क से थोड़ा हटकर,ऊँची दीवारों में घिरा,भीतर से अदृश्य
CCTV बाहर कम, भीतर अधिक यह व्यवसायिक डिज़ाइन नहीं, व्यवहारिक मनोविज्ञान है।जो छिपना चाहता है, वही ऐसा ढांचा बनाता है। आमदनी का गणित: सवाल जो फाइलों में नहीं हैं
अब सीधा प्रश्न—?इन होटलों की आमदनी का स्रोत क्या है? क्या केवल चाय–नाश्ते से? क्या केवल ट्रक ड्राइवरों से? क्या केवल पारिवारिक यात्रियों से? उत्तर स्पष्ट है — नहीं।यदि ऐसा होता तो—GST रजिस्टर,आयकर प्रोफाइल,श्रम विभाग की उपस्थिति
खाद्य सुरक्षा मानक,सब कुछ साफ़ दिखाई देता।पर वास्तविकता यह है—
नकद लेन–देन,बही–खातों में न्यूनतम बिक्री,ज़मीन की कीमत से असंगत निवेश
तो पैसा आ कहाँ से रहा है? इनके ग्राहक कौन हैं?यह सवाल सबसे संवेदनशील है और इसी से प्रशासन भागता है। ग्राहक प्रोफाइल (स्थानीय संकेतों के आधार पर):
18–30 आयु वर्ग,अकेले या जोड़ों में,अल्प समय ठहराव
नंबर प्लेट ढकी/मिटाई गई गाड़ियाँ,स्थानीय नहीं, बाहरी आवाजाही क्या ये धार्मिक पर्यटक हैं? क्या ये पारिवारिक यात्री हैं? या ये वही ग्रे ज़ोन है, जिसे देखने से तंत्र कतराता है?यदि सब सामान्य है, तो पुलिस वेरिफिकेशन क्यों नहीं? प्रशासनिक मौन: अज्ञान या मिलीभगत?यह मान लेना भोलेपन की पराकाष्ठा होगी कि—SDM को पता नहीं,CO को जानकारी नहीं,थाने कीनज़र,नहीं,आबकारी,GST,नगरपंचायत,अनजान
इतनी बड़ी संरचनाएँ—बिना नक्शा पास,बिना अग्निशमन,बिना पर्यावरण स्वीकृति
नहीं बनतीं।तो फिर प्रश्न बदलता है— 👉 समझ नहीं रही या समझना नहीं चाहती?
सरकार बनाम ज़मीनी सच्चाई,सरकार—महिला सुरक्षा की बात करती है,नशामुक्तिकी बात करती है,कानून–व्यवस्था के दावे करती है,लेकिन ज़मीन पर—
हाईवे के किनारे संदिग्ध ठिकाने,न कोई नियमित चेकिंगन कोई सार्वजनिक रिपोर्ट
क्या शासन की दृष्टि सिर्फ़ फ़ाइलों तक सीमित है? यह केवल नैतिक नहीं, सुरक्षा का भी प्रश्न है,ऐसे स्थान—अवैध गतिविधियों के सेफ ज़ोन बनते हैं,अपराध से पहले का “ट्रांज़िट पॉइंट” होते हैं,नशा, देह व्यापार, ब्लैकमेलिंग का अड्डा बन सकते हैं
याद रखिए— हर बड़ा अपराध पहले एक छोटे ‘अवैध सामान्यीकरण’ से शुरू होता है।अनुत्तरित प्रश्न — जिनका उत्तर कौन देगा?अब सवाल सूचीबद्ध होने चाहिए—इन होटलों की वार्षिक आय कितनी है?GST और आयकर रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं?कितने कर्मचारियों का पुलिस सत्यापन हुआ?कितने कमरों का रजिस्टर थाने में नियमित जमा होता है?महिला सुरक्षा के क्या प्रोटोकॉल हैं?किस आधार पर इन्हें लाइसेंस मिला?
और सबसे अहम— यदि सब नियमों के तहत है, तो डर किस बात का है? समाज की चुप्पी भी अपराध है स्थानीय समाज भी दोषमुक्त नहीं।“हमें क्या?”“अपना काम देखो”“ऊपर से सब सेट है”यही वाक्य किसी दिन बड़े हादसे का आधार बनते हैं।अब जवाबदेही तय होनी चाहिए पर क्यों और किसकी?
अब सीधा प्रश्न—?इन होटलों की आमदनी का स्रोत क्या है? क्या केवल चाय–नाश्ते से? क्या केवल ट्रक ड्राइवरों से? क्या केवल पारिवारिक यात्रियों से? उत्तर स्पष्ट है — नहीं।यदि ऐसा होता तो—GST रजिस्टर,आयकर प्रोफाइल,श्रम विभाग की उपस्थिति
खाद्य सुरक्षा मानक,सब कुछ साफ़ दिखाई देता।पर वास्तविकता यह है—
नकद लेन–देन,बही–खातों में न्यूनतम बिक्री,ज़मीन की कीमत से असंगत निवेश
तो पैसा आ कहाँ से रहा है? इनके ग्राहक कौन हैं?यह सवाल सबसे संवेदनशील है और इसी से प्रशासन भागता है। ग्राहक प्रोफाइल (स्थानीय संकेतों के आधार पर):
18–30 आयु वर्ग,अकेले या जोड़ों में,अल्प समय ठहराव
नंबर प्लेट ढकी/मिटाई गई गाड़ियाँ,स्थानीय नहीं, बाहरी आवाजाही क्या ये धार्मिक पर्यटक हैं? क्या ये पारिवारिक यात्री हैं? या ये वही ग्रे ज़ोन है, जिसे देखने से तंत्र कतराता है?यदि सब सामान्य है, तो पुलिस वेरिफिकेशन क्यों नहीं? प्रशासनिक मौन: अज्ञान या मिलीभगत?यह मान लेना भोलेपन की पराकाष्ठा होगी कि—SDM को पता नहीं,CO को जानकारी नहीं,थाने कीनज़र,नहीं,आबकारी,GST,नगरपंचायत,अनजान
इतनी बड़ी संरचनाएँ—बिना नक्शा पास,बिना अग्निशमन,बिना पर्यावरण स्वीकृति
नहीं बनतीं।तो फिर प्रश्न बदलता है— 👉 समझ नहीं रही या समझना नहीं चाहती?
सरकार बनाम ज़मीनी सच्चाई,सरकार—महिला सुरक्षा की बात करती है,नशामुक्तिकी बात करती है,कानून–व्यवस्था के दावे करती है,लेकिन ज़मीन पर—
हाईवे के किनारे संदिग्ध ठिकाने,न कोई नियमित चेकिंगन कोई सार्वजनिक रिपोर्ट
क्या शासन की दृष्टि सिर्फ़ फ़ाइलों तक सीमित है? यह केवल नैतिक नहीं, सुरक्षा का भी प्रश्न है,ऐसे स्थान—अवैध गतिविधियों के सेफ ज़ोन बनते हैं,अपराध से पहले का “ट्रांज़िट पॉइंट” होते हैं,नशा, देह व्यापार, ब्लैकमेलिंग का अड्डा बन सकते हैं
याद रखिए— हर बड़ा अपराध पहले एक छोटे ‘अवैध सामान्यीकरण’ से शुरू होता है।अनुत्तरित प्रश्न — जिनका उत्तर कौन देगा?अब सवाल सूचीबद्ध होने चाहिए—इन होटलों की वार्षिक आय कितनी है?GST और आयकर रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं?कितने कर्मचारियों का पुलिस सत्यापन हुआ?कितने कमरों का रजिस्टर थाने में नियमित जमा होता है?महिला सुरक्षा के क्या प्रोटोकॉल हैं?किस आधार पर इन्हें लाइसेंस मिला?
और सबसे अहम— यदि सब नियमों के तहत है, तो डर किस बात का है? समाज की चुप्पी भी अपराध है स्थानीय समाज भी दोषमुक्त नहीं।“हमें क्या?”“अपना काम देखो”“ऊपर से सब सेट है”यही वाक्य किसी दिन बड़े हादसे का आधार बनते हैं।अब जवाबदेही तय होनी चाहिए पर क्यों और किसकी?
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