वन्देमातरम पञ्चचत्वारिंशत् श्रृंखला
वन्दे मातरम और तिलक का स्वराज्य:
स्वतंत्रता संग्राम के प्रेरणा वन्देमातरम और बाल गंगाधर तिलक का नारा "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है" भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दो शक्तिशाली प्रतीक हैं। ये राष्ट्रवाद की ज्वाला को प्रज्वलित करने वाले सांस्कृतिक और राजनीतिक हथियार साबित हुए।वन्दे मातरम का उद्भव बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1882 में 'आनंदमठ' उपन्यास में वन्दे मातरम गीत रचा। यह भारत माता की आराधना का प्रतीक बना, जो ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रवाद की प्रेरणा स्रोत कहलाया।
1886 में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे कांग्रेस अधिवेशन में गाया, जिससे यह लोकप्रिय हो गया। स्वदेशी आंदोलन (1905) में पहली बार इसे जनगीत के रूप में अपनाया गया।तिलक का स्वराज्य नाराबाल गंगाधर तिलक ने 1 जून 1916 को अहमदाबाद में होम रूल आंदोलन के दौरान घोषणा की: "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा।" यह नारा पूर्ण स्वराज की मांग को नैतिक आधार प्रदान करता था। तिलक ने केसरी और मराठा अखबारों से जनजागरण किया, गणेशोत्सव व शिवाजी जयंती आयोजित कर राष्ट्रवाद फैलाया।दोनों का ऐतिहासिक संबंध तिलक ने स्वदेशी आंदोलन में वन्दे मातरम को राष्ट्रप्रेम का क्रियात्मक रूप माना। उन्होंने बहिष्कार, स्वदेशी, राष्ट्रीय शिक्षा व शांतिपूर्ण प्रतिरोध के चार सूत्र दिए, जहां वन्दे मातरम सांस्कृतिक एकता का प्रतीक था।
बंगाल विभाजन विरोधी प्रदर्शनों में तिलक समर्थकों ने इसे गाया, जिससे स्वराज्य आंदोलन मजबूत हुआ।स्वतंत्रता संग्राम में प्रभाववन्दे मातरम ने क्रांतिकारियों को उत्साह दिया, जबकि तिलक का नारा होम रूल लीग (1916) के माध्यम से स्वशासन की मांग तेज की। जवाहरलाल नेहरू ने इसे स्वतंत्रता संग्राम की ऐतिहासिक परंपरा कहा। दोनों ने जाति-धर्म की दीवारें तोड़ीं, जनता को एकजुट किया। 1950 में संविधान सभा ने वन्दे मातरम को राष्ट्रीय गीत घोषित किया।
समकालीन प्रासंगिकताये प्रतीक आज भी राष्ट्रवाद जगाते हैं। तिलक का दर्शन स्वराज को सनातन अधिकार मानता है, जबकि वन्दे मातरम सांस्कृतिक गौरव सिखाता है। बिरसा मुंडा जैसे आंदोलनों से जुड़कर ये युवाओं को प्रेरित करते हैं
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें