रेडक्रॉस में चंदे का खेल? या नियति का मेल!
सदस्यता शुल्क स्थानीय खाते में क्यों, किसके आदेश से और किसके लाभ के लिए?
बस्ती।उत्तरप्रदेश
मानवीय सेवा और पारदर्शिता की प्रतीक मानी जाने वाली भारतीय रेडक्रॉस सोसाइटी आज जनपद बस्ती में गंभीर सवालों के घेरे में आ खड़ी हुई है। सवाल यह नहीं है कि सदस्य बनाए गए या नहीं, सवाल यह है कि सदस्यता शुल्क की राशि किस नियम से, किस अधिकार से और किस उद्देश्य से स्थानीय खाते में रखी जा रही है?
हाल ही में सामने आए एक आधिकारिक पत्र के अनुसार, 221 नए आजीवन सदस्यों से वसूले गए कुल 2,21,000 रुपये की राशि को अलग-अलग तिथियों में स्थानीय स्तर पर जमा किया गया और अब उसमें से 30 प्रतिशत अंशदान राज्य शाखा को भेजने के निर्देश दिए गए हैं।
लेकिन बड़ा सवाल यह है—क्या रेडक्रॉस के नियम इसकी अनुमति देते हैं? क्या सदस्यता शुल्क को स्थानीय खाते में रखना वैधानिक है? और सबसे अहम—क्या इससे विवाद और अविश्वास को जानबूझकर जन्म नहीं दिया जा रहा?रेडक्रॉस कोई निजी संस्था नहीं है,रेडक्रॉस कोई क्लब, ट्रस्ट या निजी संगठन नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय–अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त मानवीय संस्था है,जिसकी पहचान पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिक अनुशासन से है।ऐसी संस्था में—सदस्यता शुल्क का खंडित संधारण स्थानीय स्तर पर धन रखने की व्यवस्था और बाद में प्रतिशत भेजने का आदेश
यह सब न केवल संदिग्ध, बल्कि संस्थागत मर्यादा के विरुद्ध प्रतीत होता है।स्थानीय खाते में पैसा क्यों?सबसे तीखा सवाल यही है—जब सदस्यता शुल्क सीधे राज्य या केंद्रीय खाते में जमा हो सकता है, तो उसे पहले स्थानीय खाते में रखने की आवश्यकता ही क्या है?क्या यह—प्रशासनिक सुविधा है?या लेखा-नियंत्रण से बचने की तरकीब?या फिर भविष्य के विवादों की पूर्व-भूमिका?रेडक्रॉस जैसी संस्था में “पहले यहाँ रखो, फिर भेजो” जैसी व्यवस्था नियमों से अधिक संदेह को जन्म देती है।आजीवन सदस्य ने उठाया सवाल इस पूरे प्रकरण पर रेडक्रॉस के एक आजीवन सदस्य, राजेंद्र नाथ तिवारी ने कड़ा ऐतराज जताया है।उनका स्पष्ट कहना है—“रेडक्रॉस के सदस्यता शुल्क को स्थानीय खाते में रखने का कोई औचित्य नहीं है।यह व्यवस्था विवाद पैदा करने वाली है।अध्यक्ष को स्वयं हस्तक्षेप कर स्थायी समाधान निकालना चाहिए।”यह सवाल किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप नहीं,बल्कि प्रणाली पर सीधा हमला है।प्रशासनिक चुप्पी और बढ़ता संदेह,सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि—इस व्यवस्था को लेकर कोई स्पष्ट सार्वजनिक दिशा-निर्देश नहीं हैन ही यह बताया गया है कि यह निर्णय किस स्तर पर लिया गया और न ही यह स्पष्ट किया गया है कि इसका ऑडिट ढांचा क्या होगाजब सवाल उठते हैं और जवाब नहीं आते,तो संदेह स्वाभाविक रूप से गहराता है।क्या रेडक्रॉस की साख दांव पर है?रेडक्रॉस जैसी संस्था की ताकत उसकी इमारत या खाते नहीं,जन-विश्वास है।ले
किन जब—पैसे को लेकर अस्पष्टता हो,नियमों की व्याख्या मनमानी होऔर सवाल उठाने वालों को चुप कराने की कोशिश होतो सबसे पहले विश्वास टूटता है।
अब सवाल अध्यक्ष सेअब गेंद सीधे रेडक्रॉस के अध्यक्ष के पाले में है— क्या सदस्यता शुल्क को स्थानीय खाते में रखने की व्यवस्था वैध है? क्या इस पर कोई लिखित नियम मौजूद है?और क्या इस व्यवस्था को तुरंत समाप्त कर एक एकीकृत, पारदर्शी प्रणाली लागू की जाएगी?अगर समय रहते स्पष्ट निर्णय नहीं लिया गया,तो यह मामला सिर्फ आंतरिक विवाद नहीं,बल्कि संस्थागत संकट में बदल सकता है
यह खबर किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं,प्रणाली की खामियों के खिलाफ है।रेडक्रॉस को याद रखना होगा—यह संस्था सेवा के लिए है,संदेह के लिए नहीं।अब भी समय है कि शीर्ष नेतृत्व हस्तक्षेप करे,और इस विवाद का स्थायी, पारदर्शी और नियमसम्मत समाधान निकाले।
आखिर कलक्टर, सी एम ओ कब निर्णायक भूमिका मे आएंगे?

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें