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मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

वन्दे मातरम्, अंडमान की सेलुलर जेल और वीर सावरकर: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का त्रिकोण(52)

वन्देमातरम द्विपञ्चाशत् श्रृंखला

वन्दे मातरम्, अंडमान की सेलुलर जेल और वीर सावरकर: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का त्रिकोण



भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल राजनीतिक आंदोलनों, सभाओं और प्रस्तावों की कहानी नहीं है, बल्कि यह त्याग, तपस्या, पीड़ा और राष्ट्रभक्ति की वह दीर्घ गाथा है, जिसने भारत माता को पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त कराया। इस संघर्ष की आत्मा को यदि किसी एक उद्घोष में समेटा जा सकता है, तो वह है — “वन्दे मातरम्”। यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का मंत्र है। इसी मंत्र की प्रतिध्वनि अंडमान की सेलुलर जेल की कोठरियों में गूंजती रही और उसी प्रतिध्वनि के एक प्रमुख स्वर थे — वीर विनायक दामोदर सावरकर।वन्दे मातरम्, अंडमान की कालापानी की यातनाएं और सावरकर का क्रांतिकारी जीवन — ये तीनों भारतीय राष्ट्रवाद के ऐसे स्तंभ हैं, जिनके बिना स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अधूरा है। यह निबंध इन्हीं तीनों के अंतर्संबंध, ऐतिहासिक महत्व और वैचारिक प्रभाव का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

वन्दे मातरम्: एक गीत नहीं, राष्ट्र की आत्मा,,“वन्दे मातरम्” की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 19वीं शताब्दी में अपने उपन्यास आनंदमठ में की थी। यह गीत उस समय रचा गया, जब भारत औपनिवेशिक शोषण, आर्थिक लूट और सांस्कृतिक दमन से जूझ रहा था। वन्दे मातरम् ने पहली बार भारत को माता के रूप में देखने की चेतना जगाई। यह गीत भारतीय राष्ट्रवाद को भावनात्मक आधार प्रदान करता है। इसमें भूमि, संस्कृति, प्रकृति और मातृत्व का ऐसा समन्वय है, जो राजनीतिक विचारधाराओं से परे जाकर जन-जन को जोड़ता है। “सुजलां सुफलां” से आरंभ होकर यह गीत भारत की समृद्धि और पवित्रता का बोध कराता है।

ब्रिटिश शासन के दौरान वन्दे मातरम् कहना एक अपराध जैसा बन गया था। यह अंग्रेजी सत्ता के लिए केवल एक गीत नहीं, बल्कि विद्रोह का उद्घोष था। यही कारण था कि जेलों में बंद स्वतंत्रता सेनानी इसे गुनगुनाने मात्र से दंडित किए जाते थे। अंडमान की सेलुलर जेल भी इससे अछूती नहीं रही।

अंडमान और कालापानी: दमन की प्रयोगशाला,,ब्रिटिश शासन ने अंडमान-निकोबार द्वीप समूह को राजनीतिक कैदियों के लिए एक विशेष दंड स्थल के रूप में विकसित किया। इसे आम भाषा में कालापानी कहा गया। समुद्र पार भेजा जाना सामाजिक, धार्मिक और मानसिक रूप से सबसे बड़ा दंड माना जाता था।1906 में निर्मित सेलुलर जेल ब्रिटिश दमन नीति की पराकाष्ठा थी। इसकी बनावट ही अमानवीय थी — सात पंखुड़ियों की तरह फैली इमारत, जिसमें कैदी एक-दूसरे को देख तक नहीं सकते थे। हर कैदी को एकांतवास में रखा जाता था ताकि सामूहिकता, संवाद और संगठन की कोई संभावना न रहे।

यह जेल केवल शरीर को नहीं, आत्मा को तोड़ने का केंद्र थी। तेल पेरना, कोल्हू चलाना, भूखा रखना, कोड़े मारना, बेड़ियों में जकड़ना — ये सब सामान्य दंड थे। लेकिन इन यातनाओं के बीच भी राष्ट्रभक्ति की लौ बुझी नहीं।

सेलुलर जेल में वन्दे मातरम् की गूंज,,सेलुलर जेल की दीवारों ने वह दृश्य देखा है, जब भूखे, थके और घायल कैदी भी धीमे स्वर में “वन्दे मातरम्” का उच्चारण करते थे। यह नारा उनके लिए भोजन, दवा और प्रार्थना — तीनों का काम करता था। ब्रिटिश अधिकारी इस नारे से भयभीत रहते थे क्योंकि यह उनके दमन तंत्र को चुनौती देता था। वन्दे मातरम् कहना जेल नियमों का उल्लंघन माना जाता था, फिर भी कैदी इसे त्यागने को तैयार नहीं थे। यह गीत उन्हें यह याद दिलाता था कि वे अपराधी नहीं, बल्कि राष्ट्र के लिए बलिदान देने वाले सपूत हैं।

वीर सावरकर: क्रांति, विचार और संघर्ष,,वीर विनायक दामोदर सावरकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे जटिल, प्रभावशाली और विवादास्पद व्यक्तित्वों में से एक हैं। वे केवल क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि विचारक, इतिहासकार, कवि और समाज सुधारक भी थे। लंदन में रहते हुए उन्होंने इंडिया हाउस को क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बनाया। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को उन्होंने “स्वतंत्रता का प्रथम संग्राम” कहकर राष्ट्रीय चेतना को नई दिशा दी। यही पुस्तक ब्रिटिश सरकार के लिए असहनीय बनी।

1910 में सावरकर को गिरफ़्तार कर अंडमान की सेलुलर जेल भेज दिया गया। उन्हें दो आजीवन कारावास — कुल मिलाकर 50 वर्ष की सजा सुनाई गई।

सावरकर और सेलुलर जेल की यातनाएं,सेलुलर जेल में सावरकर को जो यातनाएं दी गईं, वे कल्पना से परे हैं। उन्हें कोल्हू में बैल की तरह जोता गया, नारियल का तेल पेरने को मजबूर किया गया, महीनों तक एकांतवास में रखा गया।

उनके हाथों में बेड़ियां, पैरों में जंजीरें और शरीर पर कोड़ों के निशान आम बात थी। भोजन इतना अल्प और घटिया होता था कि जीवित रहना ही संघर्ष बन जाता था। लेकिन इन सबके बीच सावरकर का मन टूट नहीं पाया। उन्होंने जेल में ही कविताएं रचीं, इतिहास पर विचार किया और अपने सह-कैदियों में साहस का संचार किया।

वन्दे मातरम् और सावरकर की चेतना थी,सावरकर के लिए वन्दे मातरम् केवल नारा नहीं, बल्कि वैचारिक प्रतिरोध का माध्यम था। वे मानते थे कि राष्ट्रभक्ति का संबंध केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और स्वतंत्र चेतना से है।

जेल में उन्होंने अन्य कैदियों को समझाया कि दमन का उद्देश्य केवल शरीर को नहीं, बल्कि विचारों को नष्ट करना है। ऐसे में वन्दे मातरम् का उच्चारण एक मानसिक विद्रोह था। सावरकर की कविताओं और विचारों में मातृभूमि को देवी और माता के रूप में देखने की भावना स्पष्ट दिखाई देती है, जो वन्दे मातरम् की मूल भावना से मेल खाती है।

सेलुलर जेल: तीर्थ से स्मारक तक,,स्वतंत्रता के बाद सेलुलर जेल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया। यह केवल एक इमारत नहीं, बल्कि बलिदान की जीवित स्मृति है। आज जब पर्यटक यहां आते हैं, तो वे केवल पत्थर नहीं देखते, बल्कि उन चीखों, प्रार्थनाओं और नारों की गूंज महसूस करते हैं। वन्दे मातरम्, जो कभी अपराध था, आज यहां सम्मान के साथ गूंजता है। यह परिवर्तन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सफलता का प्रतीक है।

सावरकर का ऐतिहासिक मूल्यांकन,,सावरकर को लेकर मतभेद रहे हैं और रहेंगे, लेकिन उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता। वे उन क्रांतिकारियों में थे, जिन्होंने सशस्त्र और वैचारिक — दोनों स्तरों पर संघर्ष किया। सेलुलर जेल में उनका संघर्ष यह प्रमाणित करता है कि वे केवल विचारों के नहीं, बल्कि त्याग के भी प्रतीक थे। वन्दे मातरम् की भावना उनके जीवन और लेखन में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।


वन्दे मातरम्, अंडमान की सेलुलर जेल और वीर सावरकर — ये तीनों भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे अध्याय हैं, जो एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। वन्दे मातरम् ने संघर्ष को आत्मा दी, सेलुलर जेल ने बलिदान को पराकाष्ठा तक पहुंचाया और सावरकर जैसे व्यक्तित्वों ने इस संघर्ष को वैचारिक दृढ़ता प्रदान की। आज जब हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं, तब यह हमारा दायित्व है कि इन प्रतीकों को केवल स्मरण तक सीमित न रखें, बल्कि उनके मूल संदेश — स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और राष्ट्रभक्ति — को अपने आचरण में उतारें।

वन्दे मातरम् केवल अतीत की गूंज नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा है।

वन्दे मातरम्।

🙏


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