कांग्रेस, मुस्लिम लीग की मनोवृत्ति और वंदे मातरम् :
राष्ट्रबोध बनाम सत्ता-साधना एक गीत नहीं, एक राष्ट्रचेतना:“वंदे मातरम्” कोई साधारण गीत नहीं है।
यह भारत की राजनीतिक चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वतंत्रता-संघर्ष का घोषवाक्य रहा है। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि यही वंदे मातरम् कांग्रेस की वैचारिक कमजोरी, मुस्लिम लीग की पृथकतावादी मानसिकता और तथाकथित सेक्युलर राजनीति की किं मनोवृत्ति (servility) को उजागर करने वाला सबसे बड़ा दर्पण भी बना।प्रश्न यह नहीं कि वंदे मातरम् किसे प्रिय है,
प्रश्न यह है कि कौन इसे राष्ट्र मानता है और कौन इसे केवल सत्ता-समझौते की बाधा समझता है।कांग्रेस का प्रारंभिक राष्ट्रबोध
कांग्रेस के प्रारंभिक वर्षों में वंदे मातरम् राष्ट्रध्वनि था।
1905 के बंग-भंग आंदोलन से लेकर क्रांतिकारी आंदोलनों तक—सुरेंद्रनाथ बनर्जी,अरविंद घोष,बिपिनचंद्र पाल,लाला लाजपत राय सबके मुख पर एक ही उद्घोष था—वंदे मातरम्। उस समय कांग्रेस में राष्ट्र सर्वोपरि था
राजनीति साधन थी सत्ता लक्ष्य नहीं लेकिन जैसे-जैसे कांग्रेस सत्ता के निकट आती गई,वैसे-वैसे राष्ट्रबोध समझौते की भाषा सीखने लगा। मुस्लिम लीग का उदय और मानसिक ढांचा 1906 में मुस्लिम लीग का गठन केवल एक राजनीतिक दल का जन्म नहीं था,
बल्कि यह एक मानसिक विभाजन की शुरुआत थी।
मुस्लिम लीग की राजनीति की तीन मूल विशेषताएँ थीं—
पृथक पहचान की राजनीति ब्रिटिश सत्ता से सामंजस्य
हिंदू सांस्कृतिक प्रतीकों से असहजता वंदे मातरम् इन तीनों के विरुद्ध खड़ा था।यह गीत—भूमि को माता कहता था,सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को स्वर देता थाभारत को सभ्यता के रूप में प्रस्तुत करता था।यही कारण था कि मुस्लिम लीग ने इसे “धार्मिक गीत” कहकर खारिज किया, जबकि वह मूलतः राष्ट्रीय गीत था। किं मनोवृत्ति की शुरुआत : कांग्रेस का पहला वैचारिक समर्पण यहीं से कांग्रेस की कि मनोवृत्ति आरंभ होती है।कांग्रेस ने राष्ट्र को एक करने के नाम पर राष्ट्रगीत को ही विवादित बना दिया।मुस्लिम लीग को नाराज न करने के लिए ,तथाकथित “सांप्रदायिक सौहार्द” के नाम पर,और सत्ता-साझेदारी की राजनीति के तहत,कांग्रेस ने वंदे मातरम् को आंशिक स्वीकार्यता दे दी।
यह भारत की राजनीतिक चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वतंत्रता-संघर्ष का घोषवाक्य रहा है। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि यही वंदे मातरम् कांग्रेस की वैचारिक कमजोरी, मुस्लिम लीग की पृथकतावादी मानसिकता और तथाकथित सेक्युलर राजनीति की किं मनोवृत्ति (servility) को उजागर करने वाला सबसे बड़ा दर्पण भी बना।प्रश्न यह नहीं कि वंदे मातरम् किसे प्रिय है,
प्रश्न यह है कि कौन इसे राष्ट्र मानता है और कौन इसे केवल सत्ता-समझौते की बाधा समझता है।कांग्रेस का प्रारंभिक राष्ट्रबोध
कांग्रेस के प्रारंभिक वर्षों में वंदे मातरम् राष्ट्रध्वनि था।
1905 के बंग-भंग आंदोलन से लेकर क्रांतिकारी आंदोलनों तक—सुरेंद्रनाथ बनर्जी,अरविंद घोष,बिपिनचंद्र पाल,लाला लाजपत राय सबके मुख पर एक ही उद्घोष था—वंदे मातरम्। उस समय कांग्रेस में राष्ट्र सर्वोपरि था
राजनीति साधन थी सत्ता लक्ष्य नहीं लेकिन जैसे-जैसे कांग्रेस सत्ता के निकट आती गई,वैसे-वैसे राष्ट्रबोध समझौते की भाषा सीखने लगा। मुस्लिम लीग का उदय और मानसिक ढांचा 1906 में मुस्लिम लीग का गठन केवल एक राजनीतिक दल का जन्म नहीं था,
बल्कि यह एक मानसिक विभाजन की शुरुआत थी।
मुस्लिम लीग की राजनीति की तीन मूल विशेषताएँ थीं—
पृथक पहचान की राजनीति ब्रिटिश सत्ता से सामंजस्य
हिंदू सांस्कृतिक प्रतीकों से असहजता वंदे मातरम् इन तीनों के विरुद्ध खड़ा था।यह गीत—भूमि को माता कहता था,सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को स्वर देता थाभारत को सभ्यता के रूप में प्रस्तुत करता था।यही कारण था कि मुस्लिम लीग ने इसे “धार्मिक गीत” कहकर खारिज किया, जबकि वह मूलतः राष्ट्रीय गीत था। किं मनोवृत्ति की शुरुआत : कांग्रेस का पहला वैचारिक समर्पण यहीं से कांग्रेस की कि मनोवृत्ति आरंभ होती है।कांग्रेस ने राष्ट्र को एक करने के नाम पर राष्ट्रगीत को ही विवादित बना दिया।मुस्लिम लीग को नाराज न करने के लिए ,तथाकथित “सांप्रदायिक सौहार्द” के नाम पर,और सत्ता-साझेदारी की राजनीति के तहत,कांग्रेस ने वंदे मातरम् को आंशिक स्वीकार्यता दे दी।
यह कोई छोटी घटना नहीं थी। यह संकेत था कि—
कांग्रेस अब राष्ट्र से अधिक गठबंधनों के बारे में सोचने लगी है। 1920–1940 : तुष्टिकरण का संस्थानीकरण
1920 के बाद कांग्रेस ने जिस राजनीति को अपनाया,
उसमें तीन बातें स्पष्ट दिखती हैं—मुस्लिम लीग की हर असहमति को “संवेदनशीलता” कहा गया,हिंदू समाज की भावनाओं को “बहुसंख्यक होने का अपराध” बताया गया
कांग्रेस अब राष्ट्र से अधिक गठबंधनों के बारे में सोचने लगी है। 1920–1940 : तुष्टिकरण का संस्थानीकरण
1920 के बाद कांग्रेस ने जिस राजनीति को अपनाया,
उसमें तीन बातें स्पष्ट दिखती हैं—मुस्लिम लीग की हर असहमति को “संवेदनशीलता” कहा गया,हिंदू समाज की भावनाओं को “बहुसंख्यक होने का अपराध” बताया गया
और वंदे मातरम् जैसे प्रतीकों को विवाद से बचने की वस्तु बना दिया गया,यही किं मनोवृत्ति थी—अपनी संस्कृति से क्षमा माँगने की मानसिकता।जिन्ना और वंदे मातरम् : असली मंशाजिन्ना ने कभी भी वंदे मातरम् को केवल गीत के रूप में नहीं देखा।उनके लिए यह—एक सांस्कृतिक चुनौती था,एक सभ्यतागत दावा था और दो-राष्ट्र सिद्धांत के विरुद्ध सबसे बड़ा प्रमाण था। इसलिए मुस्लिम लीग का विरोध भावनात्मक नहीं, रणनीतिक था।और कांग्रेस?
कांग्रेस ने इस रणनीति को समझने के बजायउसेसंवेदनशीलता मान लिया।
विभाजन से पहले का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण
1946–47 आते-आते स्थिति स्पष्ट हो चुकी थी—
मुस्लिम लीग पाकिस्तान चाहती थी,कांग्रेस सत्ता चाहती थी और राष्ट्र विभाजन की ओर बढ़ रहा था
लेकिन कांग्रेस ने तब भी यह नहीं कहा कि—
“वंदे मातरम् राष्ट्र की आत्मा है, इस पर कोई समझौता नहीं होगा।”यह मौन ही किं मनोवृत्ति का चरम था। विभाजन के बाद भी अपराधबोध: सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि— देश विभाजित होने के बाद भी कांग्रेस का अपराधबोध समाप्त नहीं हुआ। वंदे मातरम् को पूर्ण राष्ट्रगीत का दर्जा नहीं मिला उसे आधा-स्वीकार, आधा-छुपाया गया
और राष्ट्रीय प्रतीकों पर निरंतर सफाई दी जाती रही
यह वही मानसिकता थी— जो लीग को संतुष्ट करने के लिए अपनाई गई थी, लेकिन अब वोट-बैंक को संतुष्ट करने में बदल गई।
वंदे मातरम् बनाम सत्ता की राजनीति,:वंदे मातरम् पूछता है—“तुम भारत को माता मानते हो या मात्र भू-भाग?”
यही प्रश्न कांग्रेस और मुस्लिम लीग—दोनों के लिए असहज था। लीग के लिए यह इस्लामी पहचान से टकराता था।
कांग्रेस के लिए यह तुष्टिकरण की राजनीति से इसलिए दोनों ने अपने-अपने ढंग से इससे दूरी बनाई।
किं मनोवृत्ति का स्थायी मॉडल आज की राजनीति में जो दिखता है—राष्ट्रीय प्रतीकों पर संकोच,सांस्कृतिक प्रश्नों पर चुप्पी और हर विरोध को “सांप्रदायिक” कह देना
यह सब उसी मानसिक ढांचे की विरासत है। जिसकी नींव कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के सामने रखी थी।
वंदे मातरम् का अपराध क्या था? वंदे मातरम् का एक ही “अपराध” था—उसने भारत को राष्ट्र माना, सौदे की वस्तु नहीं। कांग्रेस और मुस्लिम लीग की राजनीति नेइसे या तो चुनौती माना या असुविधा। यही कारण है कि आज भी— वंदे मातरम् राष्ट्रभक्ति की कसौटी बना हुआ है।
विभाजन से पहले का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण
1946–47 आते-आते स्थिति स्पष्ट हो चुकी थी—
मुस्लिम लीग पाकिस्तान चाहती थी,कांग्रेस सत्ता चाहती थी और राष्ट्र विभाजन की ओर बढ़ रहा था
लेकिन कांग्रेस ने तब भी यह नहीं कहा कि—
“वंदे मातरम् राष्ट्र की आत्मा है, इस पर कोई समझौता नहीं होगा।”यह मौन ही किं मनोवृत्ति का चरम था। विभाजन के बाद भी अपराधबोध: सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि— देश विभाजित होने के बाद भी कांग्रेस का अपराधबोध समाप्त नहीं हुआ। वंदे मातरम् को पूर्ण राष्ट्रगीत का दर्जा नहीं मिला उसे आधा-स्वीकार, आधा-छुपाया गया
और राष्ट्रीय प्रतीकों पर निरंतर सफाई दी जाती रही
यह वही मानसिकता थी— जो लीग को संतुष्ट करने के लिए अपनाई गई थी, लेकिन अब वोट-बैंक को संतुष्ट करने में बदल गई।
वंदे मातरम् बनाम सत्ता की राजनीति,:वंदे मातरम् पूछता है—“तुम भारत को माता मानते हो या मात्र भू-भाग?”
यही प्रश्न कांग्रेस और मुस्लिम लीग—दोनों के लिए असहज था। लीग के लिए यह इस्लामी पहचान से टकराता था।
कांग्रेस के लिए यह तुष्टिकरण की राजनीति से इसलिए दोनों ने अपने-अपने ढंग से इससे दूरी बनाई।
किं मनोवृत्ति का स्थायी मॉडल आज की राजनीति में जो दिखता है—राष्ट्रीय प्रतीकों पर संकोच,सांस्कृतिक प्रश्नों पर चुप्पी और हर विरोध को “सांप्रदायिक” कह देना
यह सब उसी मानसिक ढांचे की विरासत है। जिसकी नींव कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के सामने रखी थी।
वंदे मातरम् का अपराध क्या था? वंदे मातरम् का एक ही “अपराध” था—उसने भारत को राष्ट्र माना, सौदे की वस्तु नहीं। कांग्रेस और मुस्लिम लीग की राजनीति नेइसे या तो चुनौती माना या असुविधा। यही कारण है कि आज भी— वंदे मातरम् राष्ट्रभक्ति की कसौटी बना हुआ है।
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