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शनिवार, 27 दिसंबर 2025

दो संगठनों का शताब्दी काल : एक राष्ट्र के साथ खड़ा रहा, दूसरा राष्ट्र के सामने खड़ा रहा!


दो संगठनों का शताब्दी काल 
एक राष्ट्र के साथ खड़ा रहा,
 दूसरा राष्ट्र के सामने खड़ा रहा!




आरएसएस बनाम कम्युनिस्ट पार्टी — भारत को प्रभावित करने की असली तस्वीर
भारत में वैचारिक संघर्ष कोई नया नहीं है। लेकिन शताब्दी के मोड़ पर खड़े होकर अब सवाल इतिहास का नहीं, हिसाब का  है,जों सौ साल में किसने देश को मजबूत किया,और किसने देश को शक की निगाह से देखा?राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन—दोनों लगभग सौ वर्ष पुराने हैं,लेकिन आज दोनों की हैसियत, स्वीकार्यता और प्रभाव एक-दूसरे के विपरीत ध्रुव पर खड़े हैं। जन्मस्थान ही दिशा तय कर देता है
आरएसएस का जन्म 1925 में नागपुर में हुआ। भारत की मिट्टी, भारत की सामाजिक स्थिति और भारत की सांस्कृतिक चिंता से। कम्युनिस्ट पार्टी का वैचारिक जन्म 1920 में ताशकंद में हुआ।विदेशी क्रांति, विदेशी एजेंडा और अंतरराष्ट्रीय आदेश से।1925 मे वैचारिक आयात  भी नागपुर मे ही हुआ.यहीं से फर्क साफ है—
एक की चिंता भारत था, दूसरे की प्राथमिकता विचारधारा। स्वतंत्रता संग्राम : निर्णायक परीक्षा में कौन फेल हुआ 1942 — भारत छोड़ो आंदोलन।
पूरा देश सड़कों पर, जेलों में, फांसीघरों की ओर। और कम्युनिस्ट पार्टी?ब्रिटेन का समर्थन। कारण साफ— सोवियत संघ की रणनीति। यह कोई आरोप नहीं, इतिहास का दर्ज तथ्य है। यानी जब भारत आज़ादी मांग रहा था, कम्युनिस्ट पार्टी अंतरराष्ट्रीय समीकरण गिन रही थी। इसके विपरीत, आरएसएस सत्ता की राजनीति में नहीं था,
लेकिन समाज को खड़ा कर रहा था। कैडर, अनुशासन और राष्ट्रीय चेतना—
जो किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र की बुनियाद होती है। आजादी के बाद : सत्ता मिली, स्वीकार्यता नहीं,कम्युनिस्टों को आज़ादी के बाद सत्ता मिली—पश्चिम बंगाल, केरल, त्रिपुरा। 
पर सवाल यह है—दशकों की सत्ता के बाद भी जनता उनसे क्यों छिटक गई?
कारण साफ हैं—कैडर हिंसा,उद्योग-विरोधी सोच,राष्ट्र से ज्यादा वर्ग की बात,संस्कृति से निरंतर टकराव,34 साल की सरकार के बाद बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी राजनीतिक नक्शे से लगभग गायब है। सत्ता थी, लेकिन भरोसा नहीं। आरएसएस : सत्ता से दूर रहकर भी प्रभाव में केंद्र में,आरएसएस पर प्रतिबंध लगे,आरोप लगे,चरित्र हनन हुआ। फिर भी संगठन—टूटा नहींझुका नहीं,समाज से कटा नहीं,आज परिणाम सामने है—शिक्षा में प्रभाव,सेवा क्षेत्र में स्वीकार्यतानीति विमर्श में वैचारिक उपस्थिति
आरएसएस चुनाव नहीं लड़ता, लेकिन राष्ट्रीय विमर्श तय करता है। यही असली प्रभाव होता है। संस्कृति का प्रश्न : यहीं कम्युनिस्ट पिछड़े,भारत में राजनीति केवल रोटी की नहीं होती, राष्ट्र-स्मृति की भी होती है।आरएसएस ने—संस्कृति को शर्म नहीं माना राष्ट्रवाद को अपराध नहीं कहा,परंपरा को बोझ नहीं समझा,कम्युनिस्ट पार्टी ने
राम को मिथक कहा,मंदिर को पिछड़ापन,राष्ट्रवाद को फासीवाद,नतीजा यह हुआ कि जनता ने उन्हें ‘बुद्धिजीवी’ नहीं,जन विमुख मान लिया।
 आज की स्थिति : आंकड़े खुद बोलते हैं आज—आरएसएस का करोङो स्वयंसेवक, देशभर में नेटवर्क,कम्युनिस्ट सीमित राज्य, सीमित वोट, सीमित प्रभाव,आज—आरएसएस : समाज के बीच कम्युनिस्ट : कैंपस और टीवी डिबेट तक सीमित,यह गिरावट संयोग नहीं,वैचारिक अस्वीकृति है। शताब्दी का फैसला आ चुका है,इतिहास ने फैसला दे दिया है—जो राष्ट्र को केंद्र में रखता है, वही टिकता है,जो राष्ट्र को संदेह की दृष्टि से देखता है, वही सिमटता है,आरएसएस से असहमति हो सकती है, लेकिन उसकी जड़ें समाज में हैं।
कम्युनिस्ट पार्टी की समस्या यह नहीं कि वह हारी,समस्या यह है कि उसने भारत को समझा ही नहीं।और भारत अंततः उसी को स्वीकार करता है जो उसके साथ खड़ा होता है,उसके ऊपर प्रयोग नहीं करता।
कम्युनिष्ट ने अपनी डोर ताशकड, पेकिंग, क्यूबा, लओस कोरिया को अपना आदर्श मना पर
हुआ क्या आज भारत की प्रणवायु की तरह आरएसएस और उपेक्षा, उपहास और घृणा का पात्र कम्युनिष्ट पार्टियां.
न खुदा ही मिला न विशाले सनम, न इधर क़े रहे न  उधर क़े रहे
राजेंद्र नाथ तिवारी

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