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शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

धन की ईमानदार कमाई ही वंश वृद्धि और चरित्रवान संतति का आधार है!

 

धन की ईमानदार कमाई ही वंश वृद्धि और चरित्रवान संतति का आधार है!

राजेंद्र नाथ तिवारी





धन की ईमानदार कमाई ही वंश वृद्धि और चरित्रवान संतति का आधार है, जबकि अधर्मी धन पापी प्रवृत्तियों को जन्म देता है। वैदिक ग्रंथों और पुराणों में इसके अतिरिक्त प्रमाण उपलब्ध हैं जो चरित्र संरक्षण को सर्वोपरि बताते हैं। ये उद्धरण अधर्म के भयंकर परिणामों से सावधान करते हैं।ऋग्वेद के मंत्र (4/32/20-21) में धन प्राप्ति का प्राचीन मंत्र है: "आ नो भजस्व राधसि।।" इसका अर्थ है कि हे लक्ष्मीपते, दानी हो, याचकों को धन दो। यह मंत्र ईमानदार पुरुषार्थ से धन कमाने का संदेश देता है, क्योंकि अधर्मी धन संतति को लोभी बनाता है। ऋग्वेद मंडल 10/117 में दान की प्रशंसा है—धन से दूसरों को संतुष्ट करने वाला कभी क्षय को नहीं प्राप्त होता। अधर्म से कमाया धन दारिद्र्य लाता है, जबकि चरित्र रक्षा से वृद्धि।
ऋग्वेद धन को धर्म के अधीन रखता है, लोभ त्याग का उपदेश देता है। अधर्मी संचय संतान को हीन बनाता है।यजुर्वेद और उपनिष दयजुर्वेद में व्यापार वृद्धि के सूत्र हैं—सत्य, संतुलन, परिश्रम और यज्ञभाव से धन कमाओ। "सन्तः कुर्वन्ति यत्नेन धर्मस्यार्थे धनार्जनम्। धर्माचारविहीनानां द्रविणं मलसञ्चयः।।" अर्थात् संत जन धर्म के लिए धन अर्जित करते हैं, अधर्मी धन मल का ढेर है। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि चरित्रहीन धन संतति को पतित करता है।उपनिषदों में चरित्र निर्माण पर जोर: "वृत्तं यत्नेन संरक्ष्येद् वित्तमेति च याति च। अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः।।" चरित्र धन से श्रेष्ठ है, इसका नाश मनुष्य को जीवित मृत बनाता है। अधर्मी धन से संतान लंपट होती है।
अथर्ववेद की सूक्तियां अथर्ववेद में गोधन को श्रेष्ठ धन कहा गया है, जो धर्मी होता है। "सप्ताह रमेश तू j है। आयुर्वेद से जुड़े अथर्ववेद दीर्घायु धन को सर्वोत्तम बताते हैं, जो चरित्र से प्राप्त होता है।अथर्ववेद षड्यंत्र रचने वालों को शाप देता है, अधर्मी धन पाप फल देता है।�पुराण कथाओं के उदाहरणपुराणों में राजा वेन की कथा है—अधर्मी होकर धन संचय किया, अहंकार से ऋषियों का अपमान किया। परिणामस्वरूप विनाश हुआ, संतति नष्ट। मुनिगण बोले: "वेन! तू अधर्मी है, सृष्टि नाश करेगा।" यह कथा सिद्ध करती है कि अधर्मी धन चरित्र नष्ट कर वंश समाप्त करता है।
भागवत पुराण में विष्णु प्रसाद से धन-धान्य-सुतान्वित होने का वचन है, किंतु अधर्म से नहीं। वेन जैसी कथाएं चेतावनी हैं—लंपट संतति व्यर्थ।चरित्र संरक्षण का मार्ग सुभाषित कहते हैं: "परस्य पीडया लब्धं धर्मस्यौल्लंघनेन च। आत्मावमानसंप्राप्तं न धनं तत् सुखाय वै।।" दूसरों को पीड़ा देकर कमाया धन सुख नहीं देता। चरित्र रक्षा से उत्तम संतति। वैदिक सूक्तियां सिखाती हैं—धन धर्म के लिए कमाओ, अन्यथा मल संचय।
अधर्मी धन 15 दोष लाता है—हिंसा, दंभ आदि। ईमानदारी से कमाई संस्कारवान संतान देती है। पुराण-वेद चरित्र को धन से ऊपर रखते हैं।वैदिक दर्शन में संत जन धर्मार्थ धन कमाते हैं। अधर्मी संचय संतति को नष्ट करता है। चरित्र ही उपाय है।
आज दशम गुरु और उनकी संतान को सभी नत है, बेईमानों को कोई नहीं.


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