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शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

चार बच्चों की हत्यारिन माँ का समाज, सरकार से अनुत्तरीत प्रश्न?

विचारोत्तेजक सम्पादकीय

वेदप्रकाश सिंह








पानीपत–सोनीपत की  घटना केवल एक आपराधिक समाचार नहीं है, यह हमारे समय की नैतिक विफलता का दस्तावेज़ है। एक बदहाल अस्पताल के कमरे में बैठी 32 वर्षीय पूनम, चार मासूम बच्चों की मौत के सवालों से घिरी है। पुलिस, मनोचिकित्सक और कानून अपना-अपना काम कर रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी अनुत्तरित है—क्या समाज ने अपना काम किया? जब पूनम कहती है कि उसने सिर्फ एक बच्चे की हत्या की और बाकी तीन कैसे मरे, उसे नहीं पता—तो यह कथन केवल जांच का विषय नहीं, बल्कि एक टूटे हुए मानसिक संसार का संकेत है। यह संकेत डराता है, क्योंकि यह बताता है कि अपराध अचानक नहीं हुआ, बल्कि वह बहुत पहले शुरू हो चुका था—जब हम सबने देखना छोड़ दिया था। मानसिक बीमारी: अपराध नहीं, लेकिन उपेक्षा घातक है.हमारे समाज में मानसिक बीमारी को आज भी—शर्म समझा जाता है,कमजोरी माना जाता है,और इलाज से ज़्यादा छुपाने की चीज़
यही सामूहिक सोच ऐसी घटनाओं को जन्म देती है। मानसिक रोगी समय पर इलाज पाता तो शायद अपराधी न बनता। लेकिन जब इलाज की जगह उपेक्षा मिले, तो त्रासदी तय हो जाती है। यह संपादकीय स्पष्ट करती है मानसिक बीमारी अपराध का लाइसेंस नहीं है,लेकिन उसकी अनदेखी सामूहिक अपराध जरूर है।मातृत्व का मिथक और हमारी असहजता,हमने माँ को देवी बना दिया है, इसलिए जब कोई माँ टूटती है,
तो हम सन्न रह जाते हैं। लेकिन माँ भी इंसान है। उस पर भी आर्थिक दबाव है,
भावनात्मक अकेलापन है,और मानसिक असंतुलन की संभावना है।समाज ने माँ को पूजा के योग्य तो बनाया,
लेकिन संभालने योग्य नहीं। कानून अपना काम करेगा, पर क्या राज्य करेगा? कानून पूनम से पूछेगा—
इरादा क्या था,मानसिक स्थिति क्या थी,अपराध सिद्ध होता है या नहीं,लेकिन राज्य से सवाल होना चाहिए—
मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ इतनी बदहाल क्यों हैं? गरीबों के लिए मनोचिकित्सक कहाँ हैं?
परिवार पर दबाव पहचानने की कोई व्यवस्था क्यों नहीं?बदहाल अस्पताल का कमरा केवल एक दृश्य नहीं,
वह नीति-निर्माताओं पर आरोप पत्र है।मीडिया की भूमिका: खबर या चेतावनी?यदि यह खबर केवल “माँ ने बच्चों को मार डाला” बनकर रह गई,तो मीडिया भी दोषी होगा। मीडिया का दायित्व है—सनसनी से आगे जाना
मानसिक स्वास्थ्य पर सवाल उठाना और समाज को आत्ममंथन के लिए मजबूर करना,वरना अगली ऐसी खबर के लिए हम फिर तैयार बैठे होंगे।यह फैसला अदालत नहीं, समाज को सुनाना है,चार बच्चों की मौत की जिम्मेदारी केवल एक महिला पर डालकर,हम अपने हाथ नहीं झाड़ सकते।यह घटना पूछती है—क्या हमने समय रहते मदद की?क्या हमने संकेतों को गंभीरता से लिया? या हम सिर्फ हादसे के बाद नैतिक बनते हैं?आज पूनम कटघरे में है।
कल कोई और होगा। जब तक मानसिक स्वास्थ्य को नीति, बजट और संवेदना—तीनों में जगह नहीं मिलेगी,
तब तक ऐसी त्रासदियाँव्यक्तिगत नहीं, सामाजिक अपराध बनी रहेंगी।यह संपादकीय किसी के पक्ष में नहीं,
समाज के विवेक के पक्ष में है।

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