राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और वंदे मातरम्(48) - कौटिल्य का भारत

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शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और वंदे मातरम्(48)

 वंदेमातरम 48वी श्रृंखला अष्टचत्वारिंशत्

 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और वंदे मातरम् : एक गीत नहीं, भारत की आत्मा








जब भी भारत की राष्ट्र-चेतना की बात होती है, दो नाम अनिवार्य रूप से सामने आते हैं—वंदे मातरम् और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ।एक शब्दों में राष्ट्र की आत्मा है, दूसरा कर्म में राष्ट्र की साधना। इन दोनों को लेकर विवाद भी खूब होते हैं, आरोप भी लगाए जाते हैं और जानबूझकर भ्रांतियाँ भी फैलाई जाती हैं। लेकिन प्रश्न यह नहीं है कि कौन क्या कहता है, प्रश्न यह है कि भारत स्वयं क्या कहता है। 
वंदे मातरम् : जब भारत ने स्वयं को पहचाना,वंदे मातरम् की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने की, पर यह केवल साहित्यिक रचना नहीं थी। यह उस दौर की पीड़ा, प्रतिरोध और स्वाभिमान की अभिव्यक्ति थी, जब भारत गुलाम था और भारतीयों को अपनी ही भूमि पर पराया बना दिया गया था।
“सुजलां सुफलां…”इन पंक्तियों में भारत केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि अन्नदाता,जीवनदायिनी और संरक्षण देने वाली माता के रूप में उपस्थित होता है।यही भाव संघ की वैचारिक जड़ में भी है—भारत माता।
संघ: सत्ता की नहीं, राष्ट्र की साधना
संघ की स्थापना 1925 में हुई, उस समय जब देश में
अंग्रेजी शासन था,समाज जाति और वर्ग में बंटा था
और राष्ट्रबोध कमजोर हो चुका था,डॉ. हेडगेवार ने संघ को राजनीतिक पार्टी के रूप में नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और राष्ट्र निर्माण की प्रयोगशाला के रूप में खड़ा किया। संघ का राष्ट्रवाद कहता है—“राष्ट्र सत्ता से नहीं बनता, राष्ट्र संस्कार से बनता है।”और यही संस्कार वंदे मातरम् देता है ,क्या वंदे मातरम् किसी धर्म का गीत है?

यह सवाल बार-बार उठाया जाता है। और यह सवाल जितना राजनीतिक है, उतना ही बौद्धिक बेईमानी से भरा हुआ है। वंदे मातरम् में—किसी देवी की मूर्ति पूजा का आदेश नहीं,किसी धर्म विशेष की श्रेष्ठता का दावा नहीं,किसी संप्रदाय के विरुद्ध एक शब्द नहीं,यह केवल इतना कहता है—“मैं अपनी मातृभूमि को नमन करता हूँ।” संघ का आग्रह भी यही है—भारत को माता मानना कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय कर्तव्य है।
स्वतंत्रता आंदोलन और वंदे मातरम् 1905 के बंग-भंग आंदोलन से लेकर आज़ादी तक, वंदे मातरम् हर संघर्ष का उद्घोष रहा। अंग्रेज इस गीत से डरते थे, क्योंकि यह डर का नहीं, आत्मसम्मान का गीत था।यही कारण है कि
अंग्रेजों ने इसे प्रतिबंधित किया ।और उनके वैचारिक वारिस आज भी इसे “विवादास्पद” बताते
हैं
संघ ने कभी इस गीत को सत्ता के तराजू में नहीं तोला। उसने इसे हमेशा राष्ट्र की धड़कन माना।विरोध की राजनीति : समस्या गीत में नहीं, भावना में है आज जो लोग वंदे मातरम् का विरोध करते हैं, उनका असली संकट गीत नहीं है। संकट यह है कि—वे भारत को माता नहीं मानते,वे राष्ट्र को केवल एक प्रशासनिक ढांचा समझते हैं,वे इतिहास को बोझ और संस्कृति को बाधा मानते हैं, संघ इस सोच से टकराता है। RSS कहता है
“संविधान हमें अधिकार देता है, लेकिन संस्कृति हमें पहचान देती है।”संघ शाखा और राष्ट्रभाव संघ की शाखा में वंदे मातरम् कोई औपचारिक रस्म नहींहैवहाँअनुशासन है सेवा है
और सबसे ऊपर राष्ट्र के प्रति दायित्व का भाव है
वंदे मातरम् उसी भाव की मौन उपस्थिति है।
वामपंथ और संघ : दो दृष्टियाँ, दो भारत वामपंथ का भारत—वर्ग संघर्ष में उलझा जड़ों से कटाऔर आत्मग्लानि से ग्रस्त, संघ का भारत—सांस्कृतिक रूप से आत्मविश्वासी इतिहास से जुड़ा,और भविष्य के प्रति सजग वंदे मातरम् इसी आत्मविश्वास की आवाज है, इसलिए वह खटकता है। आज का भारत और वंदे मातरम् आज जब—राष्ट्र को “टुकड़ों में” समझाने की कोशिश हो रही है,इतिहास को फिर से लिखा जा रहा है
और पहचान की राजनीति ज़हर घोल रही है तब वंदे मातरम् और संघ दोनों एक बात कहते हैं—
भारत कोई प्रयोगशाला नहीं, एक सभ्यता है।
विवाद नहीं, विवेक का विषय
वंदे मातरम् कहना किसी के खिलाफ नहीं है।
संघ से जुड़ना सत्ता की लालसा नहीं है।
यह दोनों मिलकर एक ही बात कहते हैं—
“भारत को समझो,भारत को जियो,
और भारत के लिए खड़े रहो।”
जो भारत को माता मान सकता है, वही भारत की रक्षा भी कर सकता है। वंदे मातरम्।


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