कचहरियों में पनपता ‘पेशेवर जमानत उद्योग’: जौनपुर से उठा प्रश्न, पूरे उत्तर प्रदेश की चुनौती!
उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था में जमानत एक संवैधानिक अधिकार है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विचाराधीन अभियुक्त अनावश्यक रूप से जेल में न रहे और न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग करे। लेकिन विडंबना यह है कि यही व्यवस्था आज प्रदेश की कचहरियों में एक संगठित “पेशेवर उद्योग” का रूप ले चुकी है। जौनपुर में सात पेशेवर जमानतदारों की गिरफ्तारी इस सड़ांध की केवल एक झलक है; असली समस्या पूरे प्रदेश में गहरी जड़ें जमा चुकी है।पिछले कुछ वर्षों में यह स्पष्ट हुआ है कि कई जिलों की कचहरियों में कुछ चेहरे ऐसे हैं, जो न तो रिश्तेदार हैं, न मित्र, न ही किसी सामाजिक दायित्व से जुड़े—फिर भी वे दर्जनों, कभी-कभी सैकड़ों मामलों में जमानतदार बनते हैं। फर्जी भूमि अभिलेख, झूठे पते, मृत व्यक्तियों के नाम, या आर्थिक हैसियत से परे संपत्ति दिखाकर जमानत देना आम चलन बन चुका है। इसके बदले मोटी रकम ली जाती है। यह सब किसी एक व्यक्ति की करतूत नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित नेटवर्क का परिणाम है। इस नेटवर्क में दलाल, टाइपिस्ट, फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले गिरोह, और कभी-कभी व्यवस्था की कमजोर या भ्रष्ट कड़ियाँ शामिल होती हैं। पुलिस जब किसी आरोपी को पकड़ती है, तो कुछ ही घंटों में “जमानत की व्यवस्था” कर दी जाती है। न आरोपी जमानतदार को जानता है, न जमानतदार आरोपी को—दोनों को जोड़ता है तो केवल पैसा।
जमानत व्यवस्था का यह दुरुपयोग न्यायिक प्रक्रिया पर सीधा हमला है। गंभीर अपराधों में आरोपी आसानी से बाहर आ जाते हैं, कई बार फरार हो जाते हैं, और बाद में न जमानतदार मिलता है, न जिम्मेदारी तय हो पाती है। इससे न केवल पुलिस की जांच प्रभावित होती है, बल्कि आम जनता का न्याय प्रणाली से विश्वास भी डगमगाता है। राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में इस समस्या के स्वरूप अलग-अलग हैं, लेकिन जड़ एक ही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में संगठित अपराध और गैंगस्टर मामलों में पेशेवर जमानतदार सक्रिय हैं। पूर्वांचल में फर्जी भूमि और पहचान दस्तावेजों का जाल फैला है। अवध क्षेत्र में कचहरी के आसपास दलाल-तंत्र अधिक मजबूत दिखता है, जबकि बुंदेलखंड में गरीबी और अशिक्षा का फायदा उठाकर नाम मात्र की रकम पर लोगों को “कागजी जमानतदार” बना दिया जाता है।
जौनपुर की कार्रवाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने यह संदेश दिया है कि पुलिस अब इस मुद्दे को गंभीरता से लेने लगी है। लेकिन केवल गिरफ्तारी से समस्या का समाधान नहीं होगा। सवाल यह है कि क्या यह अभियान निरंतर चलेगा? क्या अन्य जिलों में भी इसी तरह की जांच होगी? क्या बार-बार जमानत देने वालों का राज्यस्तरीय डेटा तैयार किया जाएगा? आज तकनीक के युग में जमानतदारों का सत्यापन कोई कठिन काम नहीं है। आधार, भूमि अभिलेख, निवास प्रमाण—सब कुछ डिजिटल है। आवश्यकता है तो केवल इच्छाशक्ति की। यदि जमानत स्वीकार करने से पहले अनिवार्य डिजिटल क्रॉस-वेरिफिकेशन हो, एक व्यक्ति द्वारा दी जा सकने वाली जमानतों की सीमा तय हो, और फरारी की स्थिति में जवाबदेही स्पष्ट हो, तो इस “उद्योग” पर काफी हद तक रोक लग सकती है। यह भी सच है कि न्यायालयों पर काम का अत्यधिक बोझ है, लेकिन सुविधा के नाम पर व्यवस्था से समझौता स्वीकार्य नहीं हो सकता। जमानत का उद्देश्य आरोपी को न्यायिक प्रक्रिया से जोड़ना है, न कि उसे कानून से बच निकलने का रास्ता देना।
अंततः यह प्रश्न केवल कानून या पुलिस का नहीं है, यह समाज की नैतिकता और शासन की प्रतिबद्धता से जुड़ा है। जब कचहरियों में जमानत एक “रेट लिस्ट” के अनुसार मिलने लगे, तो लोकतंत्र के स्तंभ कमजोर पड़ते हैं। जौनपुर की कार्रवाई ने चेतावनी दी है—अब समय है कि उत्तर प्रदेश इस चेतावनी को अवसर में बदले।
जमानत अधिकार है, व्यापार नहीं।यदि राज्य ने समय रहते कठोर और प्रणालीगत सुधार नहीं किए, तो कचहरियों में पनपता यह पेशेवर जमानत उद्योग न्याय की अवधारणा को ही खोखला कर देगा।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें