वन्देमातरम,परशुराम की प्रतिज्ञा, श्री कृष्ण की चेतावनी और दिनकर का साक्षात् ओज!
त्रिंशतिः श्रृंखला(30)
वन्देमातरम् का ओजस्वी स्वर साहित्य की ऊर्जा वह प्रलयंकारी ज्वाला है जो शब्दों के धरातल से उद्भव होकर राष्ट्र की आत्मा को झंकृत कर देती है, ठीक वैसे ही जैसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1875 में रचित 'वन्देमातरम्' ने स्वतंत्रता संग्राम की लपटें प्रज्वलित कीं। यह ऊर्जा मातृभूमि के सौंदर्य को कोटि-कोटि भुजाओं वाली शक्ति के रूप में चित्रित कर राष्ट्रीय चेतना को जागृत करती है, जहाँ सुजलां सुफलां मलयजशीतलां का वर्णन प्रकृति की समृद्धि से राष्ट्र की सामर्थ्य तक पहुँच जाता है। दिनकर की ओजस्वी शैली में यह ऊर्जा विद्रोह और गौरवगान का संनाद बनती है, जो गुलामी की राख से स्वाभिमान की चिंगारी फूटने का आह्वान करती है।वन्देमातरम्: राष्ट्रीय शक्ति का स्रोतवन्देमातरम् साहित्य की वह ऊर्जा है जो 1882 में 'आनंदमठ' उपन्यास के माध्यम से सन्यासी विद्रोह की प्रतीकात्मक क्रांति बन गयी, और 1905 के बंगाल विभाजन पर जुलूसों में प्रतिरोध का मंत्र बनी।l इसका पहला छंद मातृभूमि की प्राकृतिक गरिमा—नदियाँ, पहाड़, हरियाली—का बखान करता है, जबकि दूसरा सात करोड़ संतानों की सामूहिक शक्ति से शत्रु संहार का उद्घोष करता है, जिसने इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिलाया।
1950 में संविधान सभा द्वारा अपनाया गया यह गीत राष्ट्रवादी चिंतन का मील का पत्थर है, जो भक्ति और आध्यात्मिक आदर्शवाद का संगम रचता है।दिनकर की दृष्टि से यह ऊर्जा अतीत के गौरवगान से वर्तमान जागरण तक फैली है—जैसे उनकी रचनाओं में हिमालय का ओज या 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' का उद्घोष, वैसे ही वन्देमातरम् में मातृशक्ति का प्रेरक स्वर गूँजता है। हिंसात्मक क्रांति की स्वीकृति देते हुए दिनकर की राष्ट्रीयता इस गीत में परशुराम-जैसे विद्रोह की प्रतीक्षा करती दिखती है, जहाँ शक्ति और सौंदर्य का समन्वय राष्ट्र को देदीप्यमान बनाता है।दिनकर शैली में साहित्यिक ऊर्जा का प्रतिबिंब रामधारी सिंह 'दिनकर' के काव्य में साहित्य की ऊर्जा ओज, उत्साह और राष्ट्रीय जागरण की हुंकार है—'कलम, आज उनकी जय बोल' या 'कृष्ण की चेतावनी' जैसे छंदों में विद्रोह की गूँज सुनाई देती है, ठीक वन्देमातरम् की भाँति।
उनकी रचनाएँ सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध क्रांति का आह्वान करती हैं, जहाँ 'राष्ट्रीयता' मूल स्वर है—अतीत का गौरव, वर्तमान क्षोभ और भविष्य का निर्माण। वन्देमातरम् को दिनकर की शैली में देखें तो यह 'हिमालय के प्रति' जैसा ओजस्वी गान बन जाता है: मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है, जनता की साँसों से ताज उड़ता है।यह ऊर्जा समकालीन संदर्भ में भी प्रासंगिक है, जो युवाओं में आत्म सम्मान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण जगाती है, ब्रह्मांड की असीम शक्ति से भारत को जोड़ती हुई दिनकर की भाँति यह गीत शब्द ब्रह्म का गान है, जो राष्ट्र की धमनियों में तरंगित होकर अमर दीपक जलाता रहता है।lसौंदर्य और शक्ति का काव्यात्मक संनाद वन्देमातरम् का सौंदर्य प्राकृतिक तत्वों—शस्यश्यामलाम, मातरम—में निहित है, जो शक्ति के साथ अभिसंगत होकर भावनात्मक आवेश रचता है। दिनकर की कल्पनाशीलता इसमें हिंसक क्रांति की स्वीकृति जोड़ती है, जहाँ अबला केन मा एत बले का प्रश्न राष्ट्र की सामूहिक तलवार बन जाता है। यह साहित्यिक ऊर्जा आज भी बंगाल से बस्ती, हर गांव गली चौपलों तक, हर हृदय में राष्ट्रप्रेम की लहर पैदा करती है।
वन्देमातरम 🙏क्रमशः30श्रृंखला

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