राजेन्द्र नाथ तिवारी
सीता का जीवन-वृत्त
जन्म से मुक्ति तक - एक मार्मिक यात्रा
नारी सशक्तिकरण के दर्पण में सीतायण की समग्र दृष्टि
एक जीवन, समग्र दृष्टि से
सीता को प्रायः खंडों में पढ़ा गया है - कहीं वधू के रूप में, कहीं वनवासिनी के रूप में, कहीं बंदिनी के रूप में, कहीं परित्यक्ता के रूप में। प्रत्येक खंड अपने प्रसंग में सत्य है, किन्तु खंडों में बंटा सत्य समग्र सत्य नहीं होता। यह निबंध सीता के सम्पूर्ण जीवन-वृत्त को एक अखंड भावधारा के रूप में देखने का प्रयास है - जन्म से पृथ्वी-प्रवेश तक, बिना किसी घटना को दूसरी से काटे। जब यह जीवन एक साथ, समग्र रूप में देखा जाता है, तो एक पैटर्न उभरता है जो खंडित पाठ में छिप जाता है - हर बार जब संस्था (राजधर्म, लोकाचार, मर्यादा) और व्यक्ति (सीता) के बीच द्वंद्व आया, मूल्य संस्था ने नहीं, स्त्री ने चुकाया। यह आख्यान उसी पैटर्न को, हर चरण पर, बिना अतिरंजना के, उजागर करने का प्रयास है - और साथ ही यह भी दिखाने का, कि प्रत्येक चुकौती के बावजूद सीता कभी विषय (object) नहीं बनीं, अंत तक कर्ता (subject) बनी रहीं। यह पढ़ना कठिन है, क्योंकि इसमें कोई सरल खलनायक नहीं है जिस पर सम्पूर्ण दोष मढ़ा जा सके। राम स्वयं वेदना में जीते हैं, प्रजा स्वयं अपने ही भय और अपवाद की बंदी है, संस्था स्वयं किसी एक व्यक्ति का निर्माण नहीं। यही इस कथा की सबसे मार्मिक विशेषता है - यह किसी की क्रूरता की नहीं, संरचना की करुण कहानी है, जिसमें सबसे कमज़ोर स्थिति में खड़ा व्यक्ति ही बार-बार मूल्य चुकाता है। और फिर भी, इस समूची यात्रा में सीता का स्वर कभी शिकायत का नहीं - गरिमा का बना रहता है।
जन्म - भूमि की संतान;सीता का जन्म ही अपवाद से शुरू होता है - वे किसी गर्भ से नहीं, हल की रेखा से, धरती के गर्भ से प्रकट होती हैं। यह कोई साधारण जन्म-कथा नहीं है; यह एक सांकेतिक उद्घोषणा है कि जिस स्त्री की यह कथा है, वह मनुष्यों की बनाई किसी भी परिभाषा से पहले से अस्तित्वमान है - वह भूमि जितनी ही प्राचीन, उतनी ही सहनशील, और उतनी ही अपरिवर्तनीय है। जनक उसे उठाते हैं, गोद लेते हैं - किन्तु ध्यान देने योग्य है कि जनक स्वयं एक दार्शनिक राजा हैं, जिनके दरबार में अष्टावक्र जैसे मनीषी और गार्गी-सुलभा जैसी विदुषी स्त्रियाँ संवाद करती हैं। सीता का बचपन किसी संकुचित रनिवास में नहीं, एक खुले, प्रश्नाकुल, दार्शनिक वातावरण में बीतता है। यही वातावरण उस स्त्री-चेतना की नींव रखता है, जो आगे चलकर कभी चुप नहीं बैठेगी।
कल्पना कीजिए उस बालिका को, जो प्रतिदिन दार्शनिक संवादों के मध्य बड़ी होती है, जिसके पिता स्वयं प्रश्न करना सिखाते हैं, न कि केवल उत्तर मानना। यही आरंभिक संस्कार सीता को वह भीतरी स्थिरता देता है, जिस पर वे अपने सम्पूर्ण जीवन में -प्रत्येक विपत्ति में - लौट-लौटकर खड़ी होंगी। एक स्त्री की सबसे बड़ी पूंजी बाह्य संरक्षण नहीं, भीतरी दार्शनिक दृढ़ता होती है — सीता का बचपन यही पूंजी उन्हें सौंपता है।
मिथिला और धनुष-यज्ञ - चयन का पहला क्षण; धनुष यज्ञ को प्रायः केवल राम के पराक्रम की कथा के रूप में देखा जाता है। किन्तु ध्यान से देखें तो यह सीता का भी क्षण है - यह स्वयंवर है, अर्थात् स्वयं वरण करने का अधिकार। भले ही परीक्षा का स्वरूप शक्ति-प्रधान हो, सीता इस समूचे आयोजन की केंद्र-बिंदु हैं, वस्तु नहीं जिसे जीता जाए, बल्कि वह उपस्थिति जिसकी स्वीकृति सम्पूर्ण आयोजन को अर्थ देती है।उस सभा-भवन की कल्पना कीजिए - सैकड़ों राजा, विशाल शिव-धनुष, और उसके मध्य एक युवती जिसका भविष्य इस क्षण से निर्धारित होने वाला है। फिर भी सीता भयभीत खड़ी नहीं हैं, वे शांत और आश्वस्त हैं - मानो उन्हें पहले से ज्ञात हो कि नियति का यह क्षण उन्हीं की प्रतीक्षा में है। यह आत्मविश्वास कहीं बाहर से नहीं, मिथिला के दार्शनिक संस्कारों से ही उपजा है।
विवाह के पश्चात् अयोध्या-गमन एक नए जीवन का आरम्भ है - किन्तु यह भी स्मरण रखने योग्य है कि यहीं से सीता का जीवन धीरे-धीरे राजधर्म की उन जटिलताओं से जुड़ने लगता है, जो आगे चलकर उनसे सबसे भारी मूल्य वसूलेंगी। मिथिला की प्रश्नाकुल स्वतंत्रता से अयोध्या के राजसी अनुशासन में यह संक्रमण सरल नहीं रहा होगा। एक स्त्री जिसने दार्शनिक वाद-विवाद की खुली हवा में सांस ली हो, उसके लिए राजमहल की मर्यादाबद्ध दिनचर्या एक नई परीक्षा है। सीता इसे भी सहजता से आत्मसात् करती हैं - यह दर्शाता है कि उनकी शक्ति किसी एक परिवेश की मोहताज नहीं, वे प्रत्येक परिस्थिति में अपने मूल्यों के साथ ढल जाना जानती हैं, बिना उन्हें खोए।
वनगमन - त्याग नहीं, चयन;जब राम को चौदह वर्ष के वनवास की आज्ञा मिलती है, सीता के सम्मुख विकल्प था - अयोध्या में सुविधा-सम्पन्न जीवन, या पति के साथ वन का कठोर जीवन। सीता का उत्तर तर्क से नहीं, अपने स्वयं के मूल्यबोध से निकलता है - वे वन जाने की 'अनुमति' नहीं मांगतीं, वे वन जाने का 'निर्णय' सुनाती हैं। राम के मना करने पर भी वे अडिग रहती हैं। यह क्षण सीता की सम्पूर्ण जीवन-यात्रा की कुंजी है — वे परिस्थिति की शिकार नहीं, परिस्थिति की निर्णायक हैं। यह प्रसंग आधुनिक पाठक के लिए विशेष अर्थ रखता है। सीता का तर्क केवल भावुक पत्नी-प्रेम नहीं है - वे स्पष्ट शब्दों में कहती हैं कि पति के बिना कोई भी सुख-सुविधा उनके लिए निरर्थक है, और यह कि एक स्त्री का स्थान वहीं है जहाँ उसका कर्तव्य और उसका प्रेम, दोनों साथ हों। यह चयन आत्म-त्याग नहीं, आत्म-निर्धारण है - और यही भेद सीतायण की सम्पूर्ण दृष्टि को परिभाषित करता है।
"जिस वन में मेरे राम हैं, वही मेरी अयोध्या है - यह मेरा त्याग नहीं, मेरा चयन है।"
लेखकीय काव्यांश, सीतायण
पंचवटी - प्रकृति के बीच गरिमा;वन में सीता का जीवन अभाव का जीवन नहीं, संतुलन का जीवन है। कुटिया की सादगी में भी वे गरिमा बनाए रखती हैं। शूर्पणखा-प्रसंग में भी सीता किसी भय से नहीं, आत्मविश्वास से उपस्थित रहती हैं। यह पंचवटी-कालखंड सीतायण की दृष्टि में स्त्री की उस शक्ति का प्रतीक है, जो संसाधनों की न्यूनता में भी अपनी अस्मिता को न्यून नहीं होने देती।यहाँ प्रकृति भी मानो सीता की सहचरी बन जाती है — नदी, वृक्ष, पंछी, सब उनके एकांत में साक्षी हैं। यह कालखंड उस स्त्री-जीवन का प्रतिनिधित्व करता है, जो राजसी वैभव से दूर होकर भी दरिद्र नहीं - प्रकृति के साथ तादात्म्य में समृद्ध है। सीतायण इस दृश्य को स्त्री-शक्ति की उस परिभाषा से जोड़ता है, जो बाह्य ऐश्वर्य में नहीं, आंतरिक संतुलन में निहित है। यह कालखंड सीता और राम-लक्ष्मण के बीच के सहज, समान संवाद का भी साक्षी है - वन में सीता केवल अनुगामिनी नहीं, निर्णयों में सहभागी हैं। जब लक्ष्मण-रेखा या स्वर्ण-मृग जैसे प्रसंगों में उनकी राय महत्वपूर्ण हो जाती है, तो यह दर्शाता है कि पंचवटी का यह जीवन एक साझेदारी का जीवन था, न कि केवल आश्रय का।
हरण - बल के समक्ष अकेलापन, फिर भी प्रतिरोध;स्वर्ण-मृग का प्रसंग और उसके पश्चात् रावण द्वारा हरण, सीता के जीवन का सर्वाधिक विदारक क्षण है। किन्तु यहाँ भी ध्यान देने योग्य है कि सीता निष्क्रिय शिकार नहीं बनतीं - वे रावण को स्पष्ट, निर्भीक शब्दों में धिक्कारती हैं, अपने आभूषण गिराकर मार्ग-चिह्न छोड़ती हैं, जटायु के बलिदान की साक्षी बनती हैं। अकेलेपन के इस चरम क्षण में भी सीता की बुद्धि और साहस सक्रिय रहते हैं - यह पीड़ा की कथा है, किन्तु पूर्णतः असहायता की कथा नहीं। कल्पना कीजिए उस भय का, जो एक स्त्री को आकाश-मार्ग से अपहृत होते समय घेरता होगा - और फिर भी, उसी भय के मध्य सीता की चेतना कार्यरत रहती है, भविष्य की योजना बनाती है। यह द्वंद्व - असीम भय और अटूट बुद्धि का सह-अस्तित्व -ही सीता को एक यथार्थवादी, मानवीय नायिका बनाता है, न कि किसी अलौकिक, भावशून्य आदर्श। उनकी वीरता उनके भय के बावजूद है, भय के अभाव में नहीं - और यही वीरता की सबसे सच्ची परिभाषा है।
जटायु का हस्तक्षेप और उसका बलिदान भी इस प्रसंग को विशेष गरिमा देता है - एक वृद्ध पक्षी, जो जानता है कि रावण के समक्ष उसकी कोई शक्ति नहीं, फिर भी सीता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाज़ी लगा देता है। सीता इस बलिदान को कभी नहीं भूलतीं, और आगे चलकर राम को इसकी सूचना देना भी उनकी स्मृति और कृतज्ञता का प्रमाण है - यह दर्शाता है कि विपत्ति के चरम क्षण में भी सीता अपने आस-पास के हर सहयोग को सजगता से आत्मसात् करती हैं।
अशोक वाटिका - मानसिक दृढ़ता का दीर्घ पर्व; अशोक वाटिका में बंदिनी सीता के सम्मुख रावण बारम्बार प्रलोभन और धमकी, दोनों प्रस्तुत करता है। महीनों की यह अवधि सीता के चरित्र की सबसे कठोर परीक्षा है - और सीता एक क्षण के लिए भी नहीं डिगतीं। यह दृढ़ता किसी बाहरी संरक्षण से नहीं, सीता की अपनी आंतरिक शक्ति से उपजती है। हनुमान के आगमन पर भी वे तत्काल विश्वास नहीं करतीं - वे प्रमाण मांगती हैं, विवेक से काम लेती हैं। यह दृश्य सीता को पुनः कर्ता के रूप में, न कि प्रतीक्षारत वस्तु के रूप में, स्थापित करता है। यहाँ विचारणीय है कि सीता का संघर्ष केवल शारीरिक बंधन से नहीं, प्रतिदिन के मानसिक क्षरण से है - निरंतर प्रलोभन, निरंतर धमकी, निरंतर एकांत। किसी भी मनुष्य के लिए यह मानसिक यातना शारीरिक बंधन से अधिक कठिन होती है। फिर भी सीता की आत्म-गरिमा अडिग रहती है - त्रिजटा जैसी सहृदय राक्षसियों का सहारा लेते हुए भी वे अपने भीतर की मर्यादा कभी नहीं त्यागतीं। यह मानसिक अजेयता ही सीतायण की दृष्टि में स्त्री-शक्ति का सर्वोच्च रूपक है। रावण जैसे शक्तिशाली और अहंकारी सम्राट के समक्ष एक निहत्थी, बंदी स्त्री का यह प्रतिरोध साधारण नहीं है। सीता के पास न सेना है, न शस्त्र, न कोई बाह्य सहारा - फिर भी वे रावण को हर भेंट में नैतिक रूप से पराजित करती हैं। यही वह क्षण है, जहाँ सीतायण स्पष्ट करता है कि सच्ची शक्ति भुजबल में नहीं, चरित्र और सिद्धांतों की अटलता में निहित होती है - और इस कसौटी पर सीता, रावण के सम्पूर्ण साम्राज्य से भी अधिक शक्तिशाली सिद्ध होती हैं।
युद्ध और प्रतीक्षा - मूक साक्षी नहीं, केंद्र; लंका-युद्ध के समूचे कालखंड में सीता भौतिक रूप से युद्धभूमि से दूर हैं, किन्तु कथात्मक रूप से वे ही युद्ध का केंद्र-बिंदु हैं। यह युद्ध किसी भूमि या सम्पदा के लिए नहीं, स्त्री की गरिमा और अधिकार की पुनर्स्थापना के लिए लड़ा जा रहा है। सीता की उपस्थिति, यद्यपि मौन, समूचे युद्ध को अर्थ देती है। फिर भी, इस पूरे युद्ध-वर्णन में एक विडंबना छिपी है, जिसे सीतायण नज़रअंदाज़ नहीं करता - युद्ध की योजना, नीति, विजय सब पुरुषों के कंधों पर टिकी दिखाई जाती है, जबकि जिस स्त्री के लिए यह युद्ध लड़ा जा रहा है, वह स्वयं निर्णय-प्रक्रिया से बाहर है। यह विडंबना आगे चलकर उस बड़े प्रश्न की भूमिका बनती है, जो अग्नि-परीक्षा में प्रकट होगा - सीता के भाग्य का निर्णय, स्वयं सीता से अधिक, अन्य लेते प्रतीत होते हैं। यह विडंबना केवल प्राचीन काल तक सीमित नहीं - आज भी अनेक बार स्त्रियों के 'लिए' निर्णय लिए जाते हैं, उनके 'साथ' नहीं। सीतायण की दृष्टि यही है कि सशक्तिकरण का अर्थ केवल स्त्री की रक्षा करना नहीं, उसे निर्णय-प्रक्रिया का केंद्र बनाना है। युद्धभूमि से दूर बैठी सीता, जब अंततः स्वयं बोलती हैं - चाहे वह अग्नि-परीक्षा में हो या अंतिम भूमि-प्रवेश में - तभी वे सच्चे अर्थों में कथा की नायिका बनकर उभरती हैं।
अग्नि-परीक्षा - पहला मूल्य-चुकौता; युद्ध की विजय के तुरन्त पश्चात् जो घटित होता है, वह सीतायण की दृष्टि में सम्पूर्ण कथा का सर्वाधिक पीड़ादायक क्षण है। सीता की शुद्धता पर प्रश्न उठाया जाता है - विजय के हर्ष के मध्य ही उन्हें प्रमाण देने को कहा जाता है। सीता अग्नि में प्रवेश करती हैं, न भय से, अपितु आत्म-सम्मान की उस ऊँचाई से, जहाँ वे स्वयं को प्रमाणित करने को तत्पर हैं, भले प्रमाण की मांग अन्यायपूर्ण हो। कल्पना कीजिए उस क्षण की विडंबना - जिस स्त्री ने महीनों की बंदी-अवस्था में अपनी मर्यादा अक्षुण्ण रखी, विजय के क्षण में उसी से प्रमाण मांगा जाता है, मानो उसकी पीड़ा ही पर्याप्त साक्ष्य न हो। यह क्षण अकेले राम-सीता का नहीं, सम्पूर्ण समाज की उस मानसिकता का दर्पण है, जो स्त्री की परीक्षा लेने में संकोच नहीं करता, किन्तु उसकी पीड़ा को स्वतः प्रमाण मानने में हिचकिचाता है।
चिंतन - मूल्य किसने चुकाया? यहीं सीतायण की केंद्रीय अंतर्दृष्टि सर्वप्रथम प्रकट होती है - राम व्यक्ति के रूप में सीता पर संदेह नहीं करते, वे राजा के रूप में मर्यादा-संस्था के प्रतिनिधि के नाते बंधे हैं। राजधर्म की यह मांग कि राजा को लोक-मर्यादा के समक्ष उत्तरदायी होना है, राम को उस स्थिति में ला खड़ा करती है, जहाँ राज-धर्म और पति-धर्म परस्पर टकराते हैं। राम इस टकराव में राजधर्म चुनते हैं - किन्तु इस चुनाव का मूल्य राम नहीं, सीता चुकाती हैं। यह पैटर्न बार-बार दोहराया जाएगा: संस्था अपनी मर्यादा बचाती है, राजा अपने आसन पर बना रहता है -और स्त्री हर बार अग्नि से गुजरती है। सीतायण इसे न तो राम के चरित्र-हनन के रूप में प्रस्तुत करता है, न ही इसे उचित ठहराता है - यह केवल इतना दर्शाता है कि संस्थाएं जब व्यक्ति से बड़ी मान ली जाती हैं, तब उनका मूल्य सदैव सबसे अधिक भेद्य (vulnerable) व्यक्ति ही चुकाता है। एक क्षण के लिए कल्पना कीजिए, यदि राम व्यक्तिगत रूप से सीता पर विश्वास करते हुए भी संस्था के दबाव को अस्वीकार कर देते, तो कथा का स्वरूप क्या होता। सीतायण जानबूझकर इस 'क्या होता अगर' को खुला छोड़ता है - क्योंकि प्रश्न राम के व्यक्तिगत साहस का नहीं, उस संरचना का है जो एक आदर्श राजा को भी अपनी पत्नी के विरुद्ध निर्णय लेने पर विवश कर सकती है। यही संरचनात्मक विवशता आज भी, भिन्न रूपों में, अनेक स्त्रियों के जीवन में दोहराई जाती है।
अयोध्या-वापसी और राज्याभिषेक - क्षणिक पूर्णता:अयोध्या लौटकर राज्याभिषेक के समय का सीता का जीवन बाह्य रूप से पूर्णता का प्रतीत होता है - रानी के रूप में प्रतिष्ठा, पति के साथ पुनर्मिलन, प्रजा का हर्ष। किन्तु यह पूर्णता अल्पकालिक सिद्ध होती है। सीतायण इस अल्प सुखद अंतराल को भी महत्व देता है - यह दिखाने के लिए कि सीता का जीवन केवल पीड़ा की शृंखला नहीं, आनंद के क्षण भी इसमें प्रामाणिक रूप से उपस्थित हैं। यह संक्षिप्त सुखद अंतराल सीतायण की दृष्टि में विशेष करुणा जगाता है - पाठक जानता है कि यह स्थायी नहीं रहने वाला, फिर भी इस क्षण की प्रामाणिक प्रसन्नता को नकारा नहीं जा सकता। जीवन की यही विडंबना है - सुख का क्षणभंगुर होना उसे झूठा नहीं बना देता। सीता इस अल्प सुख को भी पूर्ण हृदय से जीती हैं, भविष्य की आशंका में वर्तमान को खोए बिना। इस अवधि में सीता एक आदर्श रानी के रूप में भी उभरती हैं - प्रजा के कल्याण, राजकाज की गरिमा, और राम के साथ साझा उत्तरदायित्व में वे पूर्ण भागीदार हैं। यह दर्शाता है कि सीता का व्यक्तित्व किसी एक भूमिका तक सीमित नहीं - वे उतनी ही सहज रानी हैं, जितनी वनवासिनी, जितनी माता। यह बहुआयामी अनुकूलनशीलता ही उनकी सम्पूर्ण स्त्री-चेतना की सबसे बड़ी पहचान है।
द्वितीय वनवास दूसरा, और गहरा, मूल्य-चुकौता;किन्तु लोक-अपवाद पुनः सिर उठाता है। इस बार सीता गर्भवती हैं। राम, पुनः राजधर्म के नाम पर, अपनी व्यक्तिगत भावना को नकारते हुए सीता को वन भिजवाने का आदेश देते हैं - बिना सीता से पूछे, बिना उन्हें प्रत्यक्ष सूचित किए। यह क्षण अग्नि-परीक्षा से भी अधिक क्रूर है, क्योंकि इसमें प्रत्यक्ष संवाद का अवसर तक नहीं दिया जाता। लक्ष्मण को यह अप्रिय कार्य सौंपा जाता है, और वे स्वयं इस आदेश को सुनाते हुए अश्रुपूरित हैं। सीता को गंगा-तट पर छोड़ दिया जाता है - कोई विदाई नहीं, कोई स्पष्टीकरण की प्रतीक्षा नहीं। एक क्षण पहले तक वे अयोध्या की महारानी थीं, अगले ही क्षण वे निर्जन वन में अकेली, गर्भवती, बिना किसी सहारे के खड़ी हैं। यह भारतीय साहित्य के सबसे मार्मिक दृश्यों में से एक है - और सीता इसे भी मौन गरिमा के साथ स्वीकार करती हैं, बिना लक्ष्मण या राम के प्रति कटुता पाले।
चिंतन संस्था की पुनरावृत्ति;यह घटना पहले चिंतन-बिंदु को दोहराती और गहरा करती है। राजा ने पुनः राजधर्म निभाया - मर्यादा-संस्था के बंदी के रूप में उन्होंने वही किया, जो 'लोकरंजक राजा' की परिभाषा उनसे मांगती थी। किन्तु मूल्य पुनः स्त्री ने चुकाया - इस बार दोहरा मूल्य: अपनी और अजन्मे संतान की सुरक्षा अकेले वहन करने का मूल्य। संस्था बची रही, राजा का आसन अडिग रहा - सीता को पुनः वन में अकेला जीवन आरम्भ करना पड़ा। यहाँ सीतायण एक महत्वपूर्ण भेद रखता है - यह राम की करुणा या स्नेह की कमी की कथा नहीं है; वाल्मीकि स्वयं राम की आंतरिक वेदना का वर्णन करते हैं। यह इस बात की कथा है कि जब कोई भी व्यवस्था - चाहे वह कितनी भी न्यायपूर्ण मानी जाए - व्यक्ति की गरिमा से ऊपर रख दी जाती है, तो उसका खामियाजा संरचनात्मक रूप से सबसे कम शक्ति-सम्पन्न व्यक्ति को भुगतना पड़ता है। यही सीतायण की स्त्री-सशक्तिकरण दृष्टि की जड़ है - प्रश्न व्यक्तियों पर दोषारोपण का नहीं, संरचनाओं की जवाबदेही का है।
यह भी उल्लेखनीय है कि इस दूसरी परीक्षा में सीता से कोई सीधा प्रश्न भी नहीं पूछा जाता, कोई अवसर भी नहीं दिया जाता - निर्णय उनकी अनुपस्थिति में लिया जाता है। यह पहली अग्नि-परीक्षा से भी अधिक गहरा अन्याय है, क्योंकि वहाँ कम से कम सीता को अपना पक्ष रखने और अग्नि में प्रवेश कर स्वयं निर्णय लेने का अवसर था। यहाँ वह अवसर भी छीन लिया जाता है - और फिर भी सीता इस अन्याय को भी अपने साहस और आत्मनिर्भरता में बदल देती हैं।
वाल्मीकि आश्रम - एकल मातृत्व और आत्मनिर्भरता; वन में अकेली, गर्भवती सीता किसी करुणा की प्रतीक्षा नहीं करतीं। वे वाल्मीकि के आश्रम में आश्रय पाती हैं और लव-कुश को अकेले जन्म देती और पालती हैं। यह कालखंड सीतायण की दृष्टि में सीता के जीवन का सर्वाधिक सशक्त अध्याय है - यहाँ वे किसी राजमहल की सुरक्षा पर आश्रित नहीं, अपने ही संकल्प और श्रम से अपने पुत्रों को शिक्षा, संस्कार और अस्मिता देती हैं। लव-कुश जब स्वयं रामायण का पाठ सीखते हैं, तो यह सीता के मातृत्व और उनकी आत्मनिर्भर परवरिश का ही प्रतिफल है। यह ध्यान देने योग्य है कि सीता अपने पुत्रों को कटुता या प्रतिशोध की शिक्षा नहीं देतीं। लव-कुश जब बड़े होकर स्वयं राम के समक्ष रामायण गाते हैं, तो उसमें अपने ही पिता के प्रति कोई विद्वेष नहीं, बल्कि निष्पक्ष काव्य-दृष्टि झलकती है - यह सीता के संस्कारों का ही प्रमाण है। एक स्त्री, जिसे स्वयं अन्याय सहना पड़ा, अपने पुत्रों को न्यायप्रियता और निष्पक्षता सिखाती है, प्रतिशोध नहीं - यही सच्चे सशक्तिकरण की पहचान है।
वाल्मीकि स्वयं इस कालखंड में सीता के संरक्षक और साक्षी बनते हैं - उनकी उपस्थिति सीता को वह सम्मानजनक स्थान देती है, जो राजमहल ने छीन लिया था। यह भी उल्लेखनीय है कि यही वह कालखंड है, जब सीता स्वयं एक जीवंत परम्परा की संवाहक बन जाती हैं - अपनी ही कथा को अपने पुत्रों के माध्यम से आगे बढ़ाते हुए। इतिहास की यह विडंबना है कि जिस स्त्री को कथा से बाहर धकेला गया, वही अंततः उस कथा की सबसे प्रामाणिक संवाहक सिद्ध होती है।
"मुझे राजमहल ने नहीं छोड़ा — मैंने वन को अपनी शक्ति बना लिया।"
— लेखकीय काव्यांश, सीतायण
अश्वमेध सभा - अंतिम परीक्षा की मांग;वर्षों पश्चात् अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर सीता की पुनः परीक्षा की मांग उठती है। यह वही चक्र है, तीसरी बार दोहराया जाता हुआ ; संस्था फिर वही प्रमाण मांगती है, जो वर्षों पहले अग्नि में और वर्षों से चले आ रहे एकाकी वनवास में पहले ही, बारम्बार, दिया जा चुका था। इस बिंदु पर सीता का धैर्य अपनी अंतिम सीमा पर पहुँचता है!विचार कीजिए उस स्त्री की मनःस्थिति का, जिसने वर्षों अकेले, बिना शिकायत, अपने बच्चों का पालन किया, और अब पुनः उसी सभा के सम्मुख खड़ी है, जिसने कभी उसे अस्वीकार किया था। यह क्षण सीता के जीवन की सबसे गहरी थकान का क्षण है - किन्तु थकान निराशा में नहीं, स्पष्टता में परिणत होती है। सीता अब समझ चुकी हैं कि यह चक्र कभी समाप्त नहीं होगा जब तक वे स्वयं इसे समाप्त करने का निर्णय न लें।
पृथ्वी-प्रवेश - संप्रभु मुक्ति; सीता तीसरी बार प्रमाण देने से इनकार करती हैं। वे सीधे भूमि माता को साक्षी बनाती हैं, और परम्परा के अनुसार भूमि विदीर्ण होकर उन्हें अपने भीतर समाहित कर लेती है। यह अंत पराजय नहीं है - यह सीता का अंतिम, सर्वोच्च और स्वयं का निर्णय है। जिस संस्था ने बार-बार उनसे प्रमाण मांगा, उस संस्था की स्वीकृति की प्रतीक्षा किए बिना, सीता स्वयं तय करती हैं कि अब मुक्ति ही उत्तर है। यह दृश्य सम्पूर्ण सभा को स्तब्ध कर देता है - राम स्वयं विलाप करते हैं, किन्तु निर्णय अब उनके हाथ में नहीं। यही इस अंत की सबसे गहरी शक्ति है - पूरे जीवन-वृत्त में पहली और अंतिम बार, नियंत्रण पूर्णतः सीता के हाथ में है। जिस स्त्री से जीवन-भर बार-बार प्रमाण मांगे गए, वह अंततः वह क्षण चुनती है जिसमें किसी और को कोई प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं — केवल भूमि माता की गोद, और मुक्ति।
सीता का जीवन-वृत्त - एक दृष्टि में; जब हम इस सम्पूर्ण यात्रा को एक साथ रखकर देखते हैं, तो एक विशेष लय उभरती है ; प्रत्येक चरण में समाज या संस्था की कोई मांग आती है, और सीता का उत्तर सदैव गरिमा से भरा, कभी विद्वेष से नहीं। जन्म में अपवाद, बाल्यकाल में दार्शनिक स्वतंत्रता, विवाह में चयन, वनगमन में आत्म-निर्णय, हरण में प्रतिरोध, बंदी-अवस्था में मानसिक अजेयता, अग्नि-परीक्षा में आत्म-सम्मान, द्वितीय वनवास में आत्मनिर्भरता, और अंततः भूमि-प्रवेश में संप्रभु मुक्ति ; यह चक्र किसी संयोग की नहीं, एक सुसंगत चरित्र की गाथा है। विश्व-साहित्य में स्त्री-पात्रों की तुलना करने पर भी सीता का यह गुण विरल दिखाई देता है वे न तो प्रतिशोध की प्रतीक बनती हैं, न ही मूक सहनशीलता की। वे उस दुर्लभ मध्यमार्ग की प्रतिनिधि हैं, जहाँ प्रतिरोध और करुणा, आत्म-सम्मान और क्षमा, दोनों एक साथ जीवित रह सकते हैं। यही वह विशेषता है, जो सीता को केवल एक पौराणिक चरित्र से आगे, एक शाश्वत स्त्री-आदर्श बनाती है - ऐसा आदर्श जो न तो असंभव रूप से दैवीय है, न ही केवल पीड़िता।
सीता ही भारत है;जब यह सम्पूर्ण जीवन-वृत्त एक साथ देखा जाता है, तो सीता किसी दुःखांत नायिका के रूप में नहीं, अपितु एक ऐसी स्त्री-चेतना के रूप में उभरती हैं, जो हर परीक्षा में विषय नहीं, कर्ता बनी रहीं - चाहे वह वन-गमन का चयन हो, अशोक वाटिका की दृढ़ता हो, एकल मातृत्व का साहस हो, या अंततः मुक्ति का अंतिम निर्णय। संस्थाओं ने बार-बार मूल्य मांगा, और सीता ने बार-बार चुकाया - किन्तु प्रत्येक चुकौती में भी उन्होंने अपनी गरिमा, अपना विवेक और अपनी सम्प्रभुता कभी नहीं खोई। यही कारण है कि सीतायण की केंद्रीय उद्घोषणा है - "सीता ही भारत है।" जिस प्रकार सीता ने प्रत्येक संकट में मूल्य चुकाकर भी अपनी अस्मिता सुरक्षित रखी, उसी प्रकार भारत ने भी अपने प्रत्येक संकटकाल में मूल्य चुकाकर भी अपनी सभ्यतागत अस्मिता को अक्षुण्ण रखा है। नारी-सशक्तिकरण की सच्ची परिभाषा संरक्षण में नहीं, इसी आत्म-निर्णय, आत्म-सम्मान और आत्म-निर्भरता में निहित है - और सीता का सम्पूर्ण जीवन-वृत्त इसी परिभाषा का सबसे प्राचीन, सबसे मार्मिक प्रमाण है। आज की स्त्री के लिए सीता का यह जीवन-वृत्त कोई पुरातन गाथा मात्र नहीं, एक जीवंत दर्पण है। प्रत्येक युग में स्त्रियाँ किसी न किसी रूप में उसी द्वंद्व से गुजरती हैं - संस्था बनाम व्यक्ति, अपेक्षा बनाम अस्मिता, समझौता बनाम आत्म-सम्मान। सीता यह नहीं सिखातीं कि पीड़ा से बचा जा सकता है - वे यह सिखाती हैं कि पीड़ा के मध्य भी गरिमा, विवेक और अंततः आत्म-निर्णय की क्षमता कभी नहीं छोड़नी चाहिए। यही वह शाश्वत संदेश है, जो सीतायण को केवल एक पौराणिक पुनर्कथन नहीं, अपितु प्रत्येक युग की स्त्री के लिए एक जीवन-दर्शन बनाता है।
और अंततः, यह जीवन-वृत्त हमें एक प्रश्न सौंपता है, जिसका उत्तर प्रत्येक पीढ़ी को स्वयं देना है - क्या हम वे संस्थाएं बना पाएंगे, जिनमें किसी सीता को बार-बार अग्नि से गुजरना न पड़े? जब तक यह प्रश्न अनुत्तरित है, सीता की कथा केवल इतिहास नहीं, चेतावनी और प्रेरणा, दोनों बनी रहेगी।

