आस्था की टीआरपी और राम मंदिर की गिरती साख

 

राम मंदिर आते पर्यटक,भागते श्रद्धालु !

राम मंदिर: आस्था का शिखर, व्यवस्था पर सवाल?

वशिष्ठ नगर/बस्ती,19अगस्त







अयोध्या में श्रीराम मंदिर केवल एक मंदिर नहीं है। वह करोड़ों भारतीयों की आस्था, संघर्ष, संकल्प और सांस्कृतिक स्मृति का केंद्र है। इसलिए राम मंदिर की व्यवस्था पर सवाल उठाना किसी धार्मिक भावना के विरुद्ध खड़ा होना नहीं, बल्कि उस आस्था की प्रतिष्ठा की रक्षा करना है। यही कारण है कि राम मंदिर से जुड़ी व्यवस्थाओं को लेकर उठने वाली हर शिकायत सामान्य प्रशासनिक शिकायत नहीं मानी जा सकती। यहां व्यवस्था की छोटी-सी चूक भी करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं को प्रभावित करती है। आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिस राम मंदिर को भारत की सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक माना गया, वहां श्रद्धालु स्वयं को कितना सम्मानित और सुरक्षित महसूस करता है? राम के नाम पर बनी व्यवस्था राम के चरित्र की मर्यादा से बड़ी नहीं हो सकती।

यदि दर्शन के नाम पर अव्यवस्था हो, भीड़ प्रबंधन में कमी हो, श्रद्धालु परेशान हों, वीआईपी और सामान्य भक्त के बीच असहज अंतर दिखाई दे, या मंदिर के नाम पर आर्थिक गतिविधियां आस्था पर हावी होती प्रतीत हों, तो प्रश्न पूछे जाएंगे। और प्रश्न पूछना ही स्वस्थ धार्मिक समाज की पहचान है। राम ने कभी विशेषाधिकार की राजनीति नहीं की। राम के सामने निषादराज भी थे, केवट भी था, शबरी भी थी और वनवासी समाज भी। राम की मर्यादा का अर्थ ही था कि सत्ता से बड़ा संबंध और पद से बड़ा मनुष्य। फिर राम के मंदिर में ऐसा कोई वातावरण क्यों बने जिसमें सामान्य श्रद्धालु स्वयं को छोटा और विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्ति स्वयं को बड़ा समझने लगे?

यह केवल प्रबंधन का प्रश्न नहीं—राम की मर्यादा का प्रश्न है।राम मंदिर की साख किसी प्रचार से नहीं, अनुभव से बनेगी राम मंदिर की प्रतिष्ठा विज्ञापन, पोस्टर, वीडियो और सोशल मीडिया की टीआरपी से नहीं बनेगी। उसकी प्रतिष्ठा उस वृद्ध की आंखों में दिखाई देगी जो दर्शन करके संतोष के साथ लौटेगा; उस गरीब परिवार के अनुभव में दिखाई देगी जिसने बिना किसी विशेष पहचान के सम्मानपूर्वक दर्शन किया; उस बच्चे की स्मृति में दिखाई देगी जिसने अयोध्या को केवल भीड़ नहीं, राम की नगरी के रूप में महसूस किया।इसलिए व्यवस्था को एक कठिन कसौटी पर स्वयं को कसना होगा-क्या अयोध्या आने वाला सामान्य भक्त सम्मान लेकर लौट रहा है?यदि उत्तर ‘नहीं’ है तो समस्या भीड़ में नहीं, व्यवस्था की दृष्टि में है।राम मंदिर जितना विशाल होगा, उसकी व्यवस्था उतनी ही पारदर्शी, संवेदनशील और जवाबदेह होनी चाहिए। क्योंकि यह किसी एक संस्था, सरकार या प्रबंधन की निजी प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है। यह भारत की सामूहिक आस्था की प्रतिष्ठा का प्रश्न है।और यहां आलोचना से डरने के बजाय आलोचना को सुधार का अवसर बनाना चाहिए।क्योंकि राम का मंदिर आलोचना से कमजोर नहीं होगा।

राम के मंदिर की साख तभी कमजोर होगी जब राम के नाम पर व्यवस्था सवालों से बचने लगे।टीआरपी से नहीं, मर्यादा से तय हो राम मंदिर की प्रतिष्ठा।आज आवश्यकता इस बात की है कि अयोध्या को केवल सबसे अधिक भीड़ वाला धार्मिक पर्यटन केंद्र बनाने की होड़ न हो। उसे ऐसा तीर्थ बनाया जाए जहां आधुनिक व्यवस्था और सनातन मर्यादा साथ-साथ चलें।राम मंदिर की असली ‘टीआरपी’ यह नहीं कि प्रतिदिन कितने लोग पहुंचे।असली टीआरपी यह होनी चाहिए कि कितने लोग कहें।

“अयोध्या गया था, राम के दर्शन किए और मन में राम लेकर लौटा।” यदि यह अनुभव बचा रहा तो राम मंदिर की साख कोई नहीं गिरा सकता। लेकिन यदि आस्था के ऊपर अव्यवस्था, सुविधा के ऊपर विशेषाधिकार और दर्शन के ऊपर प्रदर्शन हावी हो गया, तो सबसे बड़ा नुकसान मंदिर की इमारत को नहीं, उस विश्वास को होगा जिसके लिए पीढ़ियों ने संघर्ष किया। राम मंदिर केवल पत्थरों से निर्मित भव्यता नहीं है। वह करोड़ों भारतीयों के विश्वास का जीवंत प्रतीक है।इसलिए उसकी व्यवस्था भी राम जैसी,-सरल, न्यायपूर्ण, मर्यादित और सबके लिए समान-होनी चाहिए।

टीम कौटिल्य

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