संपादकीय, श्रम एवं जयते
हरीश द्विवेदी : बस्ती से राष्ट्रीय क्षितिज तक
राष्ट्रीय महामंत्री का दायित्व प्राप्त होने पर हरीश द्विवेदी जी को असीम शुभकामनाएँ।
राजेन्द्र नाथ तिवारी
राजनीति में पद केवल सम्मान नहीं होता, वह संघर्ष, संगठन, विश्वास और दायित्व का सर्वोच्च परीक्षण भी होता है। बस्ती की धरती से राजधानी के राष्ट्रीय क्षितिज तक की यह यात्रा किसी संयोग का परिणाम नहीं, बल्कि स्वकर्म, स्वधर्म और पार्टी-निष्ठा की त्रिवेणी से निर्मित सफलता की सशक्त गाथा है। हरीश द्विवेदी राजनीति के उतार-चढ़ाव के निष्णात यात्री हैं। उन्होंने परिस्थितियों के बदलते रंग देखे हैं, संघर्ष की धूप में चले हैं और सफलता की सीढ़ियाँ अपने परिश्रम से चढ़ी हैं। यही कारण है कि राष्ट्रीय महामंत्री का दायित्व उनके लिए केवल पदोन्नति नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक यात्रा के एक नए और अधिक चुनौतीपूर्ण अध्याय का उद्घाटन है।
एकला चलो का मंत्र जब कर्मनिष्ठा से जुड़ता है तो अकेली यात्रा भी कारवाँ बन जाती है। आज उसी कर्मपथ का कमल राष्ट्रीय महामंत्री के दायित्व से सम्मानित होकर और अधिक पुष्पित हुआ है। राजनीति का यह शिखर आपके साथ सदा एवरेस्ट की तरह अडिग खड़ा रहे-यही कामना है। लेकिन शिखर पर पहुँचने की सबसे बड़ी पहचान यह होती है कि व्यक्ति पीछे मुड़कर अपनी यात्रा को सम्मान से देखे, पर उसकी दृष्टि सदैव अगले लक्ष्य पर रहे।
बस्ती से राजधानी तक की आपकी यात्रा अब राष्ट्रीय राजनीति के व्यापक फलक पर प्रवेश कर चुकी है। यह केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं, बल्कि उस कार्यकर्ता-परंपरा की विजय है जो संगठन को सर्वोपरि मानती है और दायित्व को प्रतिष्ठा नहीं, सेवा का माध्यम समझती है। आज बस्ती गर्व से कह सकती है कि उसकी मिट्टी में पला एक कार्यकर्ता राष्ट्रीय संगठन के शीर्ष दायित्वों में पहुँचा है। यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ी के कार्यकर्ताओं को यह संदेश देती है कि निष्ठा का कोई विकल्प नहीं, परिश्रम का कोई शॉर्टकट नहीं और संगठन के प्रति समर्पण की कोई सीमा नहीं।
हरीश द्विवेदी जी, राष्ट्रीय महामंत्री के रूप में आपकी नई भूमिका राष्ट्र और संगठन के लिए नई ऊर्जा, नई दिशा और नए संकल्प का माध्यम बने-इसी विश्वास के साथ पुनः हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ।बस्ती से राजधानी तक-और अब राष्ट्रीय क्षितिज तक। यात्रा जारी रहे, शिखर और ऊँचे होते रहें। शुभम भुयात ।