श्रीकृष्ण के स्यमन्तक-मणि प्रसंग का नैतिक प्रतिमान बहुत शक्तिशाली है-उन पर आरोप लगा तो उन्होंने आरोप लगाने वाले को चुप कराने के लिए सत्ता या पद का सहारा नहीं लिया, बल्कि स्वयं सत्य की खोज में निकले और मणि वापस लाकर अपनी निर्दोषता प्रमाणित की।
कृष्ण पर मणि चोरी का आरोप था-तो आज राम की नगरी में सवालों से डर क्यों? स्यमन्तक मणि से राममंदिर तक : आस्था का सबसे बड़ा आभूषण पारदर्शिता है ,भारतीय संस्कृति में आरोप नया नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण तक पर स्यमन्तक मणि की चोरी का आरोप लगा था। अंतर केवल इतना था कि कृष्ण ने आरोप को अपनी प्रतिष्ठा पर हमला मानकर आरोप लगाने वालों को दबाने का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने कहा-सत्य सामने आना चाहिए। फिर वे स्वयं मणि की खोज में निकले, घटनाक्रम की तह तक पहुँचे और अंततः वही मणि लेकर लौटे जिसके कारण उनके ऊपर कलंक लगाया गया था। सत्राजित के आरोप का उत्तर कृष्ण ने भाषण से नहीं, प्रमाण से दिया।
यही प्रसंग आज अयोध्या के लिए एक असाधारण नैतिक कसौटी बन गया है। आज राम की नगरी में मंदिर के चढ़ावे और उससे जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर जांच चल रही है। हाल की रिपोर्टों के अनुसार जांच का दायरा ट्रस्ट के गठन के समय से जुड़े रिकॉर्ड तक बढ़ाया गया है और पुराने कर्मचारियों से भी पूछताछ की जा रही है। ऐसे समय में प्रश्न किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा गिराने का नहीं है। प्रश्न है—क्या राम के नाम पर चलने वाली व्यवस्था कृष्ण की तरह अपने ऊपर उठे हर प्रश्न का उत्तर प्रमाण से देने को तैयार है?
चंपत राय हों, अनिल मिश्रा हों, गोपाल राव हों या ट्रस्ट से जुड़े कोई अन्य जिम्मेदार व्यक्ति—किसी को भी बिना जांच दोषी घोषित करना न्याय नहीं है। लेकिन इसके ठीक उलट, किसी पदाधिकारी का नाम जांच के संदर्भ में आ जाने भर से प्रश्न पूछना भी अपराध नहीं हो सकता। यही लोकतांत्रिक और धार्मिक मर्यादा का अंतर है।
कृष्ण ने कहा नहीं-दिखाया::स्यमन्तक मणि की कथा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि प्रतिष्ठा की रक्षा केवल वक्तव्य जारी करके नहीं होती। कृष्ण के सामने आरोप था। उनके पास शक्ति थी। वे चाहते तो आरोप लगाने वाले को दंडित करा सकते थे। लेकिन उन्होंने उससे भी बड़ा रास्ता चुना—सत्य को स्वयं सामने लाने का। यही कारण है कि कृष्ण का चरित्र आज भी करोड़ों लोगों के लिए नैतिक आदर्श है। उन्होंने यह नहीं कहा कि,“मैं कृष्ण हूँ, इसलिए मुझ पर विश्वास करो।”उन्होंने व्यवहार से सिद्ध किया कि,“मैं निर्दोष हूँ, इसलिए सत्य की जांच से मुझे भय नहीं।” यही वह कसौटी है जिस पर आज अयोध्या की व्यवस्था को भी स्वयं को परखना चाहिए।
राममंदिर कोई सामान्य संस्था नहीं,,राममंदिर केवल पत्थरों से निर्मित भवन नहीं है। वह करोड़ों लोगों की आस्था, असंख्य कारसेवकों के संघर्ष, संतों की तपस्या और पीढ़ियों की प्रतीक्षा का परिणाम है। इसलिए मंदिर के चढ़ावे का एक-एक रुपया केवल लेखे की एक संख्या नहीं है। वह श्रद्धालु की आस्था का अंश है। जिस व्यक्ति ने अपनी कमाई से दस रुपये मंदिर में दिए, उसके लिए वह दस रुपये भी उतने ही पवित्र हैं जितना किसी बड़े दानदाता का दस करोड़ रुपये का योगदान।
इसलिए मंदिर की वित्तीय व्यवस्था में पारदर्शिता कोई प्रशासनिक सुविधा नहीं—धार्मिक दायित्व है।चंपत राय और अनिल मिश्रा पर प्रश्न,उत्तर जांच देगी,वर्तमान विवाद में चंपत राय और अनिल मिश्रा जैसे नाम सार्वजनिक चर्चा में आए हैं। मीडिया रिपोर्टों में चंपत राय की भूमिका को लेकर विभिन्न आरोप और राजनीतिक बयान सामने आए हैं, जबकि जांच अभी अपने निष्कर्ष तक नहीं पहुँची है।
इसलिए संपादकीय धर्म यही कहता है_न आरोप को फैसला बनाइए, न सफाई को जांच का विकल्प।यदि आरोप निराधार हैं तो दस्तावेज सामने रखिए।यदि व्यवस्था निर्दोष है तो पूरा हिसाब सार्वजनिक कीजिए।यदि कहीं गड़बड़ी हुई है तो दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए।और यदि किसी पदाधिकारी की कोई भूमिका नहीं है तो जांच की निष्पक्षता ही उसके लिए सबसे बड़ी ढाल होगी। राम के मंदिर में कृष्ण की परीक्षा क्यों याद आनी चाहिए?यह विरोधाभास नहीं, भारतीय धर्मदर्शन की सुंदर निरंतरता है।राम मर्यादा के प्रतीक हैं और कृष्ण सत्य को परिस्थितियों के भीतर स्थापित करने की अद्भुत क्षमता के।कृष्ण पर मणि चोरी का आरोप लगा तो उन्होंने कहा—सत्य खोजो।आज यदि राममंदिर की व्यवस्था पर आर्थिक पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो उत्तर भी वही होना चाहिए-
सत्य खोजो।न किसी को बचाओ।न किसी को फँसाओ। न प्रतिष्ठा के नाम पर प्रश्न दबाओ। न राजनीति के नाम पर आरोप को फैसला बनाओ। सबसे बड़ा प्रश्न चढ़ावे का नहीं, विश्वास का हैराममंदिर का सबसे बड़ा धन सोना, चाँदी या नकद नहीं है।उसका सबसे बड़ा धन है,जनता का विश्वास। यह विश्वास एक बार टूट जाए तो करोड़ों रुपये की व्यवस्था भी उसे वापस नहीं खरीद सकती।
इसीलिए जांच हो रही है तो उसे पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। जिन-जिन वर्षों के रिकॉर्ड की जांच होनी है, हो। जिन लोगों से पूछताछ जरूरी है, उनसे पूछताछ हो। जिस स्तर तक जांच जाना आवश्यक है, वहाँ तक जाए। हालिया रिपोर्टों में SIT द्वारा जांच को ट्रस्ट के शुरुआती वर्षों तक विस्तारित किए जाने की बात सामने आई है। और जब निष्कर्ष आए तो उसे सार्वजनिक विमर्श के सामने स्पष्टता से रखा जाए।
कृष्ण की सीख : प्रतिष्ठा बचानी है तो सत्य से मत भागिएकृष्ण ने अपना सम्मान बचाने के लिए आरोप लगाने वाले को समाप्त नहीं किया; उन्होंने उस आरोप का सत्य समाप्त किया।यही अंतर महान नेतृत्व और सामान्य सत्ता-व्यवहार के बीच है।राममंदिर की व्यवस्था से जुड़े लोगों के सामने भी आज इतिहास का यही प्रश्न खड़ा है,क्या आप कृष्ण की तरह प्रमाण प्रस्तुत करेंगे? यदि हाँ, तो कोई आरोप टिक नहीं सकता।यदि नहीं, तो हर चुप्पी एक नया प्रश्न पैदा करेगी।और यह प्रश्न किसी व्यक्ति का नहीं है।यह प्रश्न है-राम के मंदिर में व्यवस्था राम की मर्यादा से चलेगी या सत्ता की सुविधा से? स्यमन्तक मणि ने कृष्ण की परीक्षा ली थी। आज की पारदर्शिता की परीक्षा अयोध्या की व्यवस्था की है। और इस परीक्षा में न कोई पद काम आएगा, न प्रतिष्ठा, न संगठन। केवल सत्य काम आएगा। क्योंकि राम के मंदिर की सबसे बड़ी सुरक्षा दीवार पत्थर की नहीं -विश्वास की है।
वी के त्रिपाठी, संवाददाता