सिनाॅप्सिस सीतायण एक वैचारिक चुनौती भारतीय स्मृति में सीता को पुनः स्थापित करने का प्रयास मूल प्रश्न।
हमने सीता को क्यों गलत पढ़ा?
एक सभ्यता, जो स्वयं को ‘सीता’ की उपासक कहती है, उसने ‘सीता’ के साथ क्या किया है? उसने उन्हें त्याग की मूर्ति बना दिया-सहनशील, मौन, धैर्यवान, आदर्श। परंतु आदर्श बनाने की यह प्रक्रिया अक्सर एक चुपचाप घटित होने वाला अपहरण भी हैकृव्यक्ति को गुण में बदलकर उसका अस्तित्व छीन लेना। जिस स्त्री ने राज सिंहासन को ठुकराया, जिसने रावण के समक्ष निर्भय खड़े होकर उसे धिक्कारा, जिसने अग्नि में प्रवेश कर उसे स्वयं अपनी शर्तों पर संप्रभुता के दावे में बदल दिया उसे सीता माता कहकर पूजने के साथ-साथ, हमने उसे निर्णय लेने वाली, विचार करने वाली, विद्रोह करने वाली एक जीवंत चेतना के रूप में देखना भी बंद कर दिया। ‘सीतायण’ की प्रस्थान-बिंदु यही असुविधाजनक प्रश्न है क्या हमारी भक्ति ही हमारी सबसे बड़ी विस्मृति बन गई? यह परियोजना किसी कोमल पुनर्कथन का प्रस्ताव नहीं करती। यह शास्त्रीय ग्रंथों को उतनी ही निर्ममता से पढ़ने का साहस करती है, जितनी निर्ममता से उन्होंने सीता के जीवन को रचा था। और उस पाठ से एक ऐसी सीता निकलती है, जो परंपरा की सुविधाजनक स्मृति से कहीं अधिक तीक्ष्ण, कहीं अधिक असहज करने वाली है।
केंद्रीय विचा-सहना, स्वीकार करना नहीं है। सीतायण का तर्क है कि भारतीय काव्य-मीमांसा ने सीता के प्रत्येक कृत्य को सहन की भाषा में अनूदित कर दिया, जबकि मूल पाठ में वे कृत्य चुनाव की भाषा में रचे गए हैं। सीता वन नहीं गईं उन्हें जाना पड़ा। सीता अग्नि में प्रवेश नहीं कीं पड़ी उन्हें प्रमाणित होना था का साक्षी ना दिया। यह भेद मामूली शब्दार्थ का भेद नहीं है। यह इस बात का भेद है कि हम सीता को इतिहास की वस्तु मानते हैं या इतिहास की कर्ता यह विचार असुविधाजनक है, क्योंकि यह उस पितृसत्तात्मक पाठ-परंपरा को चुनौती देती है, जिसने सदियों से सीता को एक निष्क्रिय आदर्श के साँचे में ढाला एक ऐसा साँचा, जो स्त्री के त्याग की प्रशंसा तो करता है, पर उसके विवेक को श्रेय नहीं देता। सीतायण यह प्रस्तावित करता है कि सीता का त्याग विवेकपूर्ण, सचेत और अंततः राजनीतिक भी था। वे प्रत्येक क्षण जानती थीं कि वे क्या चुन रही हैं और क्यों?
तीन प्रसंग, जो इस विचार की कसौटी पर कसते हैं मिथिला की किशोरी सीता ने जनक के दार्शनिक राजदरबार में पलते हुए, विवाह पूर्व ही उन पारिवारिक रूढ़ियों को प्रश्नांकित किया, जो स्त्री की बुद्धि को उसके सौंदर्य के पीछे छिपा देती थीं। यह प्रसंग साधारणतः बाल-चरित्र-वर्णन तक सीमित कर दिया जाता है, जबकि सीतायण इसे सीता के संपूर्ण जीवन-दर्शन की नींव के रूप में पढ़ता है। अशोक वाटिका में बंदिनी सीता, रावण के प्रत्येक प्रलोभन और प्रत्येक धमकी के समक्ष किसी पीड़िता की भाँति नहीं, अपितु एक अडिग प्रतिपक्ष की भाँति खड़ी रहीं। उन्होंने रावण को उपदेश दिया, चेतावनी दी, धिक्कारा। यह केवल बंदित्व नहीं थाय यह भीतर से लड़ा गया एक युद्ध था। और अग्नि-परीक्षा वह प्रसंग, जिस पर सर्वाधिक विवाद हुआ है और जिसे आधुनिक विमर्श प्रायः स्त्री-अपमान के प्रतीक के रूप में पढ़ता है। ‘सीतायण’ इसे तीसरी दृष्टि से पढ़ने का प्रस्ताव करता है न पीड़ा के आत्मसमर्पण के रूप में, न केवल सामाजिक बाध्यता के रूप में, अपितु सीता द्वारा स्वयं गढ़े गए एक अंतिम, अकाट्य प्रमाण के रूप में, जिसके पश्चात कोई भी उनकी संप्रभुता पर प्रश्न नहीं उठा सकता था। यह पुनर्पाठ आरामदायक नहीं है। यह पाठक को इस प्रसंग की संपूर्ण जटिलता के साथ, बिना किसी सरलीकरण के, जूझने के लिए बाध्य करता है।
यह केवल साहित्यिक प्रश्न नहीं है जिस समाज की स्त्री-कल्पना सीता जैसे चरित्र से गढ़ी जाती है, उस समाज का संपूर्ण स्त्री-दृष्टिकोण इस बात पर निर्भर करता है कि वह सीता को किस रूप में स्मरण रखता है एक ऐसी स्त्री के रूप में जो चुपचाप सहती है, या एक ऐसी स्त्री के रूप में जो चुपचाप निर्णय लेती है और उन निर्णयों के परिणाम स्वयं वहन करती है। यह भेद केवल शास्त्रीय व्याख्या का विषय नहीं है। यह इस बात को आकार देता है कि आज की भारतीय स्त्री अपने त्याग, अपने संघर्ष और अपनी सहनशीलता को किस भाषा में समझती हैकृनिष्क्रियता की भाषा में या संकल्प की भाषा में।
सीतायण इसलिए ‘जनकपुर से जगद्गुरु भारत /2047’ की उस व्यापक सभ्यतागत परियोजना से जुड़ता है, जो यह मानती है कि भारत का पुनर्जागरण उसके अपने प्रतीकों के पुनर्पाठ से ही संभव है बाहरी दृष्टिकोणों से उधार लिए गए नारीवाद से नहीं, अपितु स्वयं अपनी परंपरा के भीतर छिपी हुई, किंतु विस्मृत कर दी गई, स्त्री-संप्रभुता की मूल दृष्टि से।
रचना का दायरा यह तर्क वेदवती-भूदेवी के अवतरण-रहस्य से आरंभ होकर, मिथिला की दार्शनिक किशोरावस्था, विवाह और अयोध्या के मध्य का सांस्कृतिक द्वंद्व, वनगमन एवं दशरथ-वियोग, लंका-पर्व, युद्ध और अग्नि-परीक्षा के पुनर्पाठ से गुजरता हुआ, सीता के द्वितीय वनवास, लोकापवाद, लव-कुश एवं अंततः पृथ्वी-प्रवेश तक विस्तृत होता है। यह विस्तार आकस्मिक नहीं है प्रत्येक पड़ाव पर वही एक थीसिस बार-बार परखी जाती है सीता ने कभी परिस्थितियों को स्वयं पर हावी नहीं होने दियाय उन्होंने प्रत्येक परिस्थिति को अपने संकल्प के अधीन कर लिया, चाहे उसकी कीमत कुछ भी रही हो।
प्रत्येक अध्याय वाल्मीकि, तुलसी, कम्बन, अध्यात्म रामायण एवं भवभूति मनीष त्रिपाठी मिथिला की योद्धा की परंपराओं का तुलनात्मक अध्ययन करता है। किसी परंपरा को दूसरी में घोलकर नहीं, अपितु प्रत्येक के अपने स्वर को सम्मान देते हुए, ताकि पाठक स्वयं देख सके कि यह सशक्त सीता कोई आधुनिक आरोपण नहीं, अपितु स्वयं शास्त्रीय पाठ के भीतर से ही उभरती है। वे आपत्तियाँ, जिनसे यह परियोजना जान-बूझकर टकराती है पहली आपत्ति क्या यह पश्चिमी नारीवादी ढाँचे को सीता पर आरोपित करने का प्रयास है? सीतायण इस आपत्ति को गंभीरता से लेता है और उत्तर में यह स्थापित करता है कि संप्रभुता, विवेक और संकल्प जैसी अवधारणाएँ किसी आयातित सिद्धांत की उपज नहीं हैं। वे स्वयं उपनिषदों की गार्गी-मैत्रेयी परंपरा में, मिथिला के दार्शनिक वातावरण में, पहले से विद्यमान थीं। सीता उसी परंपरा की उत्तराधिकारी थीं। यह पुनर्पाठ इसलिए पश्चिम से उधार नहीं, अपितु भारत की अपनी विस्मृत बौद्धिक विरासत की पुनर्खोज है।
दूसरी आपत्ति क्या सीता को संप्रभु कहकर हम उनके त्याग के धार्मिक-आध्यात्मिक महत्व को कम नहीं कर देते? सीतायण का उत्तर है कि त्याग और संप्रभुता परस्पर विरोधी नहीं हैं। सच्चा त्याग वही है, जो पूर्ण विवेक और स्वतंत्र चुनाव से उपजे, न कि विवशता से। जिस त्याग में चुनाव नहीं, वह त्याग नहीं, केवल भाग्य है। सीता का त्याग महान इसलिए है क्योंकि वह चुना हुआ त्याग था और यही तथ्य उसे और अधिक, न कि कम, आध्यात्मिक गरिमा प्रदान करता है।
तीसरी आपत्ति परंपरावादी वर्ग से आएगी क्या शास्त्रीय ग्रंथों को इस प्रकार पुर्नव्याख्यायित करना उनकी पवित्रता का उल्लंघन नहीं है? सीतायण इसका उत्तर पद्धतिगत अनुशासन में देता है। यह परियोजना कहीं भी मूल श्लोकों को बदलती नहीं, नई घटनाएँ नहीं गढ़ती। यह केवल उन्हीं वर्णित घटनाओं को, उन्हीं शब्दों के भीतर छिपे अर्थ-सामर्थ्य को, नए सिरे से पढ़ने का साहस करती है। पाठ वही रहता है, दृष्टि बदलती है।
एक और असुविधाजनक प्रश्न रू क्या राम स्वयं इस दृष्टि से बच पाते हैं? यदि सीता इतनी संप्रभु थीं, तो अग्नि-परीक्षा की माँग करने वाले राम की स्थिति क्या बनती है? सीतायण इस प्रश्न से बचता नहीं। यह स्वीकार करता है कि रामकथा में राम और सीता, दोनों को एक साथ,बिना किसी को दूसरे से ऊपर या नीचे रखे, समझना आवश्यक हैकृराम की मर्यादा-निष्ठा और सीता की संप्रभुता, दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं, अपितु परस्पर परीक्षित सत्य हैं। यह जटिलता ही इस परियोजना को गहराई देती है। यह किसी एक पात्र के महिमामंडन के लिए दूसरे को छोटा नहीं करता, अपितु दोनों की जटिलताओं को उतनी ही निष्ठा से उभारता है।
अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से भारत की वरन ‘अंतोगोन’ है विश्व-साहित्य में ऐसे चरित्र दुर्लभ नहीं, जो सत्ता के समक्ष अपने विवेक पर अडिग रहे हों। सोफोक्लीज की एंटिगोनी ने राजाज्ञा के विरुद्ध धर्म का पक्ष चुना और आज तक पश्चिमी चिंतन में प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में पढ़ी जाती है। सीता का चरित्र किसी भी विश्व-साहित्यिक नायिका से कम जटिल,कम शक्तिशाली या कम वैचारिक नहीं है। बल्कि सीता का प्रतिरोध विनाश में नहीं, सृजन में परिणत होता है। यह तुलना इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह दिखाती है कि भारतीय परंपरा को अपनी नायिकाओं को समझने के लिए किसी बाहरी कसौटी की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम अपने क्लासिक्स को उतनी ही गंभीरता से पढ़ें,जितनी गंभीरता से विश्व अपने क्लासिक्स को पढ़ता है।
निष्कर्षः- जो प्रश्न अब भी खुला है सीतायण किसी सहज उत्तर के साथ समाप्त नहीं होता। यह पाठक को उस असहज संधि-स्थल पर छोड़ देता है, जहाँ भक्ति और आलोचना, परंपरा और पुनर्पाठ, एक-दूसरे से टकराते हैं।
यदि सीता सचमुच उतनी ही संप्रभु, उतनी ही सचेत थीं, जितना यह पाठ प्रस्तावित करता है, तो प्रश्न यह नहीं रह जाता कि हमने उन्हें कैसे पढ़ा। प्रश्न यह बन जाता है कि हमने उस पाठ से क्या सीखने से इनकार किया। यही वह वैचारिक चुनौती है, जिसे यह परियोजना अपने प्रत्येक पाठक के समक्ष रखती है बिना समझौता किए, बिना सरलीकरण के अंततः सीतायण एक साधारण-सा, किंतु अत्यंत भारी प्रश्न पूछता है यदि आज कोई स्त्री अपने जीवन के सर्वाधिक कठिन क्षणों में सीता को स्मरण करे, तो क्या उसे एक ऐसी आकृति मिले जो केवल सहती है, या एक ऐसी चेतना मिले जो प्रत्येक अंधकार में भी अपने विवेक से मार्ग खोज लेती है? सीतायण का दावा यही है कि इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर स्वयं शास्त्रों के भीतर से, सहस्राब्दियों से, हमारी प्रतीक्षा कर रहा था।
भवदीय
राजेन्द्र नाथ तिवारी
सम्पादक
कौटिल्य का भारत हिन्दी दैनिक
ईमेल-kautilyakabharat@gmail.com
