बस्ती में दरोगा मनरेगा मजदूर?
वर्दी पर सवाल, मनरेगा में खेल और सरकारी तंत्र की चुप्पी
बस्ती।
सरकारी नौकरी की वर्दी और मनरेगा की मजदूरी-दोनों की अपनी-अपनी मर्यादा है। एक कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी उठाती है और दूसरी गरीब के हाथ को रोजगार देती है। लेकिन जब आरोप यह सामने आए कि कानून के रखवाले की नौकरी के साथ सरकारी मनरेगा योजना में मजदूर के नाम पर भुगतान भी उठ रहा है, तब सवाल केवल एक व्यक्ति का नहीं रह जाता-सवाल पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता का बन जाता है। आखिर वह दरोगा है या मनरेगा मजदूर?::यह सवाल इसलिए विस्फोटक है क्योंकि मनरेगा कोई सरकारी खजाने की खुली तिजोरी नहीं है। यह उस ग्रामीण परिवार के लिए जीवनरेखा है जिसके पास खेत नहीं, रोजगार नहीं और नियमित आय का साधन नहीं। यदि किसी प्रभावशाली अथवा सरकारी कर्मचारी के नाम पर उस धन का भुगतान हुआ है, तो यह केवल कागज पर दर्ज एक अनियमितता नहीं, बल्कि उस गरीब मजदूर के अधिकार पर चोट है जिसके हाथ में वास्तव में फावड़ा होना चाहिए था।सामने आई शिकायत में एक पुलिसकर्मी पर मनरेगा में स्वयं को मजदूर दर्शाकर भुगतान प्राप्त करने का आरोप लगाया गया है। शिकायतकर्ता ने संबंधित मस्टर रोल, जॉब कार्ड, उपस्थिति, भुगतान विवरण और बैंक खाते आदि का मिलान कराने की मांग की है। आरोप सही हैं या नहीं, इसका अंतिम निर्णय जांच ही करेगी। लेकिन जांच से पहले ही यदि व्यवस्था आंखें मूंद ले, तो यह लोकतंत्र के लिए अधिक गंभीर प्रश्न है।
मस्टर रोल में नाम और जमीन पर कौन?::मनरेगा में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कागज पर किसका नाम है। प्रश्न यह है कि काम किसने किया?यदि किसी व्यक्ति की सरकारी सेवा के अभिलेख बताते हैं कि वह निर्धारित समय में पुलिस विभाग में कार्यरत था और उसी अवधि में मनरेगा मस्टर रोल पर उसकी उपस्थिति दर्ज हुई, तो जांच को केवल कागज पलटने तक सीमित नहीं रखा जा सकता। कार्यस्थल की वास्तविक स्थिति, मस्टर रोल, जॉब कार्ड, माप पुस्तिका, भुगतान आदेश, बैंक खाते और संबंधित अधिकारियों के डिजिटल रिकॉर्ड—सबका आपस में मिलान होना चाहिए। और यदि कागज कुछ कहता है तथा जमीन कुछ और, तो कागज पर भरोसा करने के बजाय जमीन की सच्चाई सामने लानी होगी।
अकेला मजदूर नहीं, पूरी श्रृंखला कटघरे में::सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि यदि ऐसी कोई गड़बड़ी हुई, तो केवल कथित लाभार्थी को ही क्यों देखा जाए?मनरेगा में मजदूरी भुगतान कोई एक व्यक्ति अकेले अपने मोबाइल से नहीं कर देता। ग्राम पंचायत स्तर से लेकर रोजगार सेवक, सचिव, तकनीकी स्तर, भुगतान प्रक्रिया और संबंधित प्रशासनिक तंत्र तक अनेक स्तर जुड़े होते हैं। इसलिए यदि जांच में फर्जी उपस्थिति या अनुचित भुगतान सिद्ध होता है, तो जिसने नाम चढ़ाया, जिसने उपस्थिति प्रमाणित की, जिसने भुगतान प्रक्रिया आगे बढ़ाई और जिसने निगरानी नहीं की-हर जिम्मेदार कड़ी की भूमिका जांचनी होगी।वरना होगा वही पुराना खेल—छोटे आदमी पर कार्रवाई, बड़े आदमी पर पर्दा।मनरेगा का पैसा मजाक नहीं है::यह समझना होगा कि मनरेगा में कथित भ्रष्टाचार का अर्थ केवल सरकारी धन का नुकसान नहीं है। इसका सीधा अर्थ है—किसी वास्तविक गरीब की मजदूरी का छिन जाना।जिस मजदूर ने तपती धूप में मिट्टी काटी, तालाब खोदा, सड़क के किनारे काम किया या गांव के विकास में अपना श्रम लगाया, यदि उसका नाम मस्टर रोल से गायब है और किसी ऐसे व्यक्ति के नाम भुगतान दर्ज है जिसने काम ही नहीं किया, तो यह व्यवस्था की आत्मा पर चोट है। सरकारी योजना का पैसा किसी अधिकारी, कर्मचारी, ठेकेदार, बिचौलिए या प्रभावशाली व्यक्ति की सुविधा के लिए नहीं, गांव के सबसे कमजोर नागरिक के अधिकार के लिए है।
पुलिस की वर्दी सवालों से ऊपर नहीं,::पुलिस कानून की रक्षक है। इसलिए पुलिसकर्मी पर लगने वाला आरोप सामान्य आरोप से अधिक गंभीर सार्वजनिक महत्व रखता है। इसका अर्थ यह नहीं कि आरोप लगते ही किसी को दोषी घोषित कर दिया जाए। कानून सबको निष्पक्ष जांच और अपना पक्ष रखने का अधिकार देता है।लेकिन यही सिद्धांत दूसरी दिशा में भी लागू होना चाहिए-वर्दी किसी को जांच से छूट का कवच नहीं दे सकती। यदि आरोप निराधार हैं तो निष्पक्ष जांच के बाद आरोप लगाने वाले को जवाब मिलना चाहिए। और यदि आरोप प्रमाणित होते हैं तो कार्रवाई ऐसी होनी चाहिए कि भविष्य में कोई सरकारी कर्मचारी गरीबों की योजना को अपनी निजी कमाई का माध्यम बनाने का साहस न करे।
अब खानापूर्ति नहीं, डिजिटल फोरेंसिक जांच चाहिए,इस मामले में केवल कागजी जांच पर्याप्त नहीं होगी। प्रशासन को चाहिए कि शिकायत में उल्लिखित अवधि के मस्टर रोल, जॉब कार्ड, आधार-आधारित उपस्थिति/भुगतान से संबंधित उपलब्ध रिकॉर्ड, बैंक भुगतान, कार्यस्थल के अभिलेख, माप पुस्तिका और संबंधित अधिकारियों की स्वीकृतियों का स्वतंत्र रूप से मिलान कराया जाए।
यदि संभव हो तो संबंधित अवधि की ड्यूटी, तैनाती और अवकाश संबंधी पुलिस अभिलेखों का भी मिलान हो। प्रश्न सीधा है,जिस दिन वह सरकारी ड्यूटी पर था, उसी दिन मनरेगा में मजदूरी कैसे कर रहा था?यदि दोनों रिकॉर्ड एक साथ सच साबित होते हैं तो यह सामान्य प्रशासनिक भूल नहीं, बल्कि जांच का गंभीर विषय होगा।
बस्ती में मनरेगा के नाम पर ‘कागजी मजदूर’ नहीं चाहिए,बस्ती की धरती श्रम और संघर्ष की धरती है। यहां मनरेगा के नाम पर यदि कहीं वास्तविक मजदूर की जगह कागजी मजदूर खड़े किए जा रहे हैं, तो यह केवल एक ग्राम पंचायत का मामला नहीं माना जाना चाहिए।यह जांच होनी चाहिए कि पिछले वर्षों में किन-किन पंचायतों में ऐसे लाभार्थी पाए गए जो सरकारी सेवा, नियमित रोजगार या अन्य कारणों से वास्तविक रूप से मनरेगा मजदूरी करने की स्थिति में नहीं थे। डेटा से संदिग्ध भुगतान की पहचान हो सकती है और जांच को व्यक्ति से व्यवस्था तक ले जाया जा सकता है।
असली लड़ाई गरीब के हिस्से की मजदूरी की है,आज सवाल किसी एक दरोगा का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें गरीब का नाम मस्टर रोल में हो और पैसा किसी दूसरे के खाते में चला जाए; मजदूर ने काम किया हो और भुगतान कोई और ले जाए; गांव में विकास का बोर्ड खड़ा हो लेकिन जमीन पर काम न मिले।
यदि आरोप गलत हैं—तो जांच उन्हें गलत साबित करे।यदि आरोप सही हैं—तो दोषी चाहे वर्दी में हो, पंचायत में हो या प्रशासनिक कुर्सी पर-कानून की एक ही कसौटी होनी चाहिए।क्योंकि मनरेगा गरीब की मजबूरी पर सरकार की कृपा नहीं, उसका वैधानिक अधिकार है।और उस अधिकार पर डाका डालने वाले से यह सवाल पूछा ही जाना चाहिए—“साहब, आप दरोगा हैं या मनरेगा मजदूर?”अब जवाब मस्टर रोल नहीं देगा।जांच देगी। बैंक रिकॉर्ड देगा। ड्यूटी रजिस्टर देगा। और सबसे बढ़कर—जमीन पर हुआ वास्तविक काम देगा।सरकार यदि सचमुच भ्रष्टाचार के विरुद्ध शून्य-सहिष्णुता चाहती है, तो इस तरह के आरोपों की जांच भी शून्य-समझौते के साथ होनी चाहिए। गरीब की मजदूरी पर किसी की वर्दी, कुर्सी या पहुंच भारी नहीं पड़नी चाहिए।