विभाजन की विभीषिका और भारत : पाकिस्तान, बांग्लादेश और बलूचिस्तान की आज की प्रासंगिकता

 

आज 14 अगस्त 2026 को पाकिस्तान अपना स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, जबकि भारत में यही समय विभाजन की स्मृति और उसके मानवीय परिणामों पर विचार का अवसर भी है।





विभाजन की विभीषिका और भारत : पाकिस्तान, बांग्लादेश और बलूचिस्तान की आज की प्रासंगिकता

“विभाजन केवल भूगोल का विभाजन नहीं था; वह स्मृतियों, परिवारों, संस्कृतियों और मनुष्यता के हृदय पर खींची गई एक ऐसी रेखा थी, जिसकी पीड़ा आज भी उपमहाद्वीप की चेतना में जीवित है।” 14 अगस्त 1947—एक ओर पाकिस्तान के जन्म का दिवस, दूसरी ओर भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास का वह क्षण, जब सदियों से साथ रहने वाले समाजों के बीच एक राजनीतिक सीमा खींच दी गई। अगले दिन भारत स्वतंत्र हुआ। किंतु स्वतंत्रता का यह प्रभात करोड़ों मनुष्यों के लिए विस्थापन, हिंसा, अनिश्चितता और अपनों से बिछुड़ने की रात्रि से होकर आया था। विभाजन को केवल भारत और पाकिस्तान के निर्माण की संवैधानिक घटना मान लेना इतिहास के साथ अन्याय होगा। यह आधुनिक दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में से एक था। लाखों लोग अपने घरों से उखाड़े गए, परिवार बिछुड़े और असंख्य जीवन हिंसा की भेंट चढ़े। इसलिए 14 अगस्त की स्मृति भारत के लिए किसी राष्ट्र के विरुद्ध घृणा का अवसर नहीं, बल्कि इतिहास से सीख लेने का अवसर है। पश्चिम बंगाल सहित विभिन्न स्थानों पर आज भी विभाजन-विभीषिका स्मरण के कार्यक्रम इसी उद्देश्य से आयोजित किए जा रहे हैं। विभाजन का मूल प्रश्न : क्या भूगोल से सभ्यता विभाजित होती है?

भारत की सभ्यता की प्रकृति राजनीतिक सीमाओं से कहीं अधिक प्राचीन और व्यापक है। सिंधु से गंगा, ब्रह्मपुत्र से कावेरी और कश्मीर से कन्याकुमारी तक अनेक भाषाएँ, पंथ, परंपराएँ और जीवन-पद्धतियाँ विकसित हुईं, किंतु इनके बीच संवाद की एक दीर्घ सांस्कृतिक परंपरा बनी रही। 1947 में राजनीतिक मानचित्र बदला, किंतु सभ्यता का इतिहास समाप्त नहीं हुआ। यही कारण है कि आज भी लाहौर, ढाका, कराची, पेशावर, मुल्तान, रावलपिंडी, क्वेटा और काबुल की ओर जाने वाली ऐतिहासिक स्मृतियाँ भारतीय इतिहास-बोध में अपरिचित नहीं लगतीं। इन नगरों का वर्तमान राजनीतिक परिचय भिन्न हो सकता है, पर उनका अतीत भारतीय उपमहाद्वीप की साझा ऐतिहासिक यात्रा से जुड़ा हुआ है। इस दृष्टि से विभाजन की सबसे बड़ी त्रासदी शायद यह थी कि उसने मनुष्य को उसके घर से ही नहीं, उसकी स्मृति से भी विस्थापित करने का प्रयास किया।

पाकिस्तान : एक राजनीतिक प्रयोग और उसकी ऐतिहासिक परीक्षा

पाकिस्तान का निर्माण द्विराष्ट्र सिद्धांत की राजनीतिक अवधारणा पर हुआ। पाकिस्तान की अपनी आधिकारिक संसदीय ऐतिहासिक व्याख्या भी इस निर्माण को मुस्लिमों के लिए पृथक राष्ट्र की मांग और 1947 के सत्ता-हस्तांतरण से जोड़ती है।

लेकिन इतिहास की विडंबना देखिए-जिस तर्क के आधार पर भारत का विभाजन हुआ, उसी विभाजित भूभाग के भीतर कुछ ही दशकों बाद एक दूसरा विभाजन हो गया। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बना। यह घटना केवल पाकिस्तान के इतिहास की घटना नहीं थी; यह 1947 के सिद्धांत की एक गंभीर ऐतिहासिक परीक्षा थी। यदि धर्म ही राष्ट्र की पर्याप्त और अंतिम आधारशिला होता, तो समान धार्मिक पहचान के बावजूद पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान के बीच भाषा, संस्कृति, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक असमानता और क्षेत्रीय आत्मसम्मान के प्रश्न इतने निर्णायक क्यों बनते?

बांग्लादेश का जन्म इस बात का ऐतिहासिक प्रमाण बना कि राष्ट्र की निर्मिति केवल धार्मिक पहचान से नहीं होती। भाषा, संस्कृति, राजनीतिक अधिकार, आर्थिक न्याय, क्षेत्रीय अस्मिता और लोकतांत्रिक भागीदारी भी राष्ट्र की आत्मा के अनिवार्य तत्व हैं।

बांग्लादेश : विभाजन के भीतर से निकला दूसरा विभाजन

बांग्लादेश का 1971 में उदय दक्षिण एशिया के इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। 1947 में जिस उपमहाद्वीप को धार्मिक आधार पर विभाजित किया गया था, उसी में 24 वर्षों बाद एक नया राष्ट्र भाषाई-सांस्कृतिक और राजनीतिक अस्मिता के प्रश्न पर अस्तित्व में आया। इस इतिहास का भारतीय संदर्भ अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत के लिए बांग्लादेश केवल पड़ोसी राष्ट्र नहीं है; बंगाल की सांस्कृतिक स्मृति दोनों ओर विस्तृत है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर, काजी नजरुल इस्लाम, बंकिमचंद्र, चैतन्य परंपरा, लोक-संस्कृति, नदी-सभ्यता और बंगाली भाषा—इन सबकी विरासत राजनीतिक सीमा से बड़ी है।

अतः भारत-बांग्लादेश संबंधों को केवल 1971 की युद्ध-स्मृति तक सीमित करना भी उचित नहीं। यह संबंध इतिहास, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, नदी-जल, सीमा और जनजीवन के अनेक स्तरों पर विकसित होते हैं। बांग्लादेश हमें एक गहरी ऐतिहासिक शिक्षा देता है—किसी समाज को केवल एक पहचान में सीमित करके उसकी बहुस्तरीय अस्मिता को समाप्त नहीं किया जा सकता।

बलूचिस्तान : 1947 के अधूरे प्रश्नों का जीवित संदर्भ

बलूचिस्तान का प्रश्न और भी जटिल है। 1947 की पूर्वसंध्या पर बलूचिस्तान कोई एकसमान प्रशासनिक इकाई नहीं था। ब्रिटिश-प्रशासित क्षेत्र और कलात, मकरान, लसबेला तथा खारान जैसे रियासती क्षेत्रों की अलग-अलग राजनीतिक स्थितियाँ थीं। कलात के पाकिस्तान में विलय का प्रश्न आज भी इतिहास और राजनीति में विवाद का विषय है। 27 मार्च 1948 को खान-ए-कलात के पाकिस्तान से विलय के बाद असहमति और विद्रोह की पहली घटनाएँ सामने आईं। उसके बाद 1948, 1958-59, 1962-63 और 1973-77 में विभिन्न विद्रोह हुए; 2003 से एक नई और दीर्घकालिक उग्रवादी लहर चली। आज भी बलूचिस्तान पाकिस्तान की सबसे जटिल आंतरिक चुनौतियों में है। अगस्त 2026 में भी वहाँ सुरक्षा अभियानों और बलूच अलगाववादी हिंसा की खबरें सामने आई हैं।

यहाँ भारत के लिए एक महत्वपूर्ण बौद्धिक सावधानी आवश्यक है।

बलूचिस्तान का प्रश्न भारत के लिए न तो केवल पाकिस्तान-विरोधी राजनीतिक हथियार होना चाहिए और न ही उसे सरलतापूर्वक “भारत बनाम पाकिस्तान” के चश्मे से देखा जाना चाहिए ,बलूचिस्तान के भीतर स्वायत्तता, संसाधनों पर अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सांस्कृतिक पहचान और सुरक्षा-व्यवस्था से संबंधित वास्तविक प्रश्न हैं। पाकिस्तान स्वयं संघीय सरकार और बलूचिस्तान प्रांत के बीच विश्वास तथा सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता स्वीकार करता है। अर्थात बलूचिस्तान आज हमें यह प्रश्न पूछने के लिए बाध्य करता है कि क्या किसी राष्ट्र की एकता केवल सैन्य शक्ति से सुरक्षित रह सकती है, या उसके लिए न्यायपूर्ण संघवाद, राजनीतिक सहभागिता और सांस्कृतिक सम्मान भी आवश्यक हैं?

पाकिस्तान, बांग्लादेश और बलूचिस्तान : तीन अलग-अलग ऐतिहासिक दर्पण::इन तीनों को एक ही सूत्र में बाँधना ऐतिहासिक सरलीकरण होगा।पाकिस्तान 1947 के विभाजन का परिणाम है।

बांग्लादेश 1971 में पाकिस्तान के भीतर हुए दूसरे विभाजन का परिणाम है। बलूचिस्तान पाकिस्तान के भीतर दीर्घकालिक क्षेत्रीय, राजनीतिक और राष्ट्रीय अस्मिता के संघर्ष का जटिल उदाहरण है।

तीनों को जोड़ने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राष्ट्र-निर्माण केवल मानचित्र खींच देने से पूरा नहीं होता।

राष्ट्र को न्याय चाहिए।राष्ट्र को संवाद चाहिए।राष्ट्र को सांस्कृतिक सम्मान चाहिए।राष्ट्र को आर्थिक भागीदारी चाहिए।

और सबसे बढ़कर-राष्ट्र को अपने नागरिकों के मन में वैधता अर्जित करनी पड़ती है। जहाँ राज्य नागरिक के मन से दूर होता जाता है, वहाँ केवल प्रशासन बचता है; राष्ट्रभाव कमजोर होने लगता है।

भारत के लिए आज की प्रासंगिकता::2026 में विभाजन की चर्चा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दक्षिण एशिया अभी भी 1947 की विरासत से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ है। भारत-पाकिस्तान संबंधों में अविश्वास, जम्मू-कश्मीर का प्रश्न, सीमापार आतंकवाद, जल-संसाधन, परमाणु प्रतिरोध और राजनीतिक तनाव—ये सभी किसी न किसी रूप में विभाजन की अधूरी विरासत से जुड़े हैं। हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच गंभीर सैन्य तनाव भी हुआ है और संबंधों में तनाव बना हुआ है। लेकिन भारत को अपने भविष्य की दिशा अतीत के आक्रोश से नहीं, इतिहास की समझ से निर्धारित करनी होगी।

विभाजन-विभीषिका का स्मरण आवश्यक है, किंतु उसका उद्देश्य प्रतिशोध नहीं होना चाहिए।स्मृति यदि विवेक पैदा करे तो वह इतिहास है;

स्मृति यदि केवल घृणा पैदा करे तो वह इतिहास-बोध नहीं, राजनीतिक उत्तेजना बन जाती है। भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह विभाजन को भूले नहीं, लेकिन विभाजन की मानसिकता में भी न जिए।अखंड सांस्कृतिक चेतना बनाम राजनीतिक सीमाएँभारत की सांस्कृतिक चेतना की शक्ति उसकी समावेशी प्रकृति में रही है। राजनीतिक सीमाएँ बदलती हैं; सभ्यताएँ अपनी स्मृतियों को लेकर आगे बढ़ती हैं।इसलिए आज “अखंड भारत” की अवधारणा पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए-भावनात्मक या तत्काल राजनीतिक भूगोल के रूप में नहीं, बल्कि एक साझी सभ्यतागत स्मृति के रूप में।

लाहौर का इतिहास भारतीय इतिहास से अलग नहीं लिखा जा सकता। ढाका का सांस्कृतिक इतिहास भारतीय उपमहाद्वीप की कथा से अलग नहीं हो सकता। बलूचिस्तान की ऐतिहासिक जटिलता को 1947 की राजनीतिक उथल-पुथल से अलग नहीं समझा जा सकता।इसका अर्थ यह नहीं कि वर्तमान संप्रभु राज्यों की सीमाओं को बलपूर्वक बदलने का कोई कार्यक्रम हो। इसका अर्थ यह है कि इतिहास को राजनीतिक सीमाओं का बंदी न बनाया जाए।

विभाजन से भारत की अंतिम सीख::विभाजन ने भारत को एक अत्यंत कठोर ऐतिहासिक शिक्षा दी—राष्ट्र केवल भूमि का नाम नहीं है; राष्ट्र मनुष्य, स्मृति, संस्कृति, न्याय और साझा भविष्य का नाम है।

1947 में भारत का भूगोल विभाजित हुआ, पर भारतीय सभ्यता समाप्त नहीं हुई।1971 में पाकिस्तान का दूसरा विभाजन हुआ, लेकिन दक्षिण एशिया की साझा सांस्कृतिक स्मृतियाँ समाप्त नहीं हुईं।

आज बलूचिस्तान का संघर्ष यह दिखाता है कि राजनीतिक एकता और भावनात्मक एकता एक ही बात नहीं हैं। इसलिए भारत को अपनी शक्ति का आधार केवल सैन्य सामर्थ्य में नहीं, बल्कि लोकतंत्र, आर्थिक प्रगति, सांस्कृतिक आत्मविश्वास, संवैधानिक संस्थाओं और मानवीय मूल्यों में भी खोजना होगा। विभाजन की विभीषिका का वास्तविक उत्तर यही है कि भारत इतना शक्तिशाली, समृद्ध, न्यायपूर्ण और आत्मविश्वासी बने कि इतिहास की त्रासदियाँ उसके भविष्य की नियति न बन सकें। विभाजन हमें बाँट गया—पर इतिहास हमें जोड़ने की संभावना आज भी देता है। आज पाकिस्तान की स्वतंत्रता का दिवस है। कल भारत का स्वतंत्रता दिवस होगा। इन दो तिथियों के बीच खड़ा इतिहास हमें स्मरण कराता है कि राजनीतिक स्वतंत्रता और सभ्यतागत आत्मबोध दो अलग-अलग किंतु परस्पर जुड़े आयाम हैं। भारत को अपने अतीत पर न तो अपराध-बोध चाहिए, न प्रतिशोध-बोध।::उसे चाहिए—इतिहास-बोध।क्योंकि जो राष्ट्र अपने घावों को समझता है, वही भविष्य की भूलों से बचता है। और विभाजन की सबसे बड़ी विभीषिका शायद यही थी कि हमने एक भूभाग को तो बाँट दिया, लेकिन मनुष्यों के हृदयों में खिंची रेखाओं को आज तक पूरी तरह मिटा नहीं सके।

इसलिए 14 अगस्त केवल विभाजन की तिथि नहीं है; यह आत्ममंथन की तिथि है। भारत के लिए इसका संदेश स्पष्ट है-

सीमाएँ इतिहास बनाती हैं, पर संस्कृति सभ्यता बनाती है।

राज्य भूगोल बनाते हैं, पर समाज राष्ट्र बनाते हैं। और राष्ट्र तभी स्थायी होते हैं, जब उनके भीतर न्याय, संवाद और आत्मसम्मान जीवित रहता है।

राजेंद्र नाथ तिवारी

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