भूमिजा से भूमि की गोद तक

 सीता: पारिवारिक मान्यताओं का विखण्डन, निर्णय और प्रतिशोध

भूमिजा से भूमि की गोद तक





सीता का जीवन-वृत्त भारतीय चिन्तन-परम्परा में एक विलक्षण वृत्त है - यह वृत्त पृथ्वी से आरम्भ होकर पृथ्वी में ही समाप्त होता है। जनक के हल की नोक से जो कन्या भूमि के गर्भ से प्रकट हुई, वही अन्ततः अपने ही निर्णय से पुनः भूमि की गोद में लौट गई। इन दो बिन्दुओं के मध्य फैला हुआ जीवन केवल एक पत्नी, एक माता अथवा एक रानी की गाथा नहीं है - यह उस स्त्री की गाथा है जिसने बार-बार परिवार, समाज और राज्य की स्थापित मान्यताओं के विखण्डन को सहा, प्रत्येक विखण्डन के उपरान्त एक निर्णय लिया, और अन्ततः अपने निर्णय को ही अपने प्रतिशोध का माध्यम बनाया।

यह प्रतिशोध शस्त्र का नहीं, मौन का प्रतिशोध था - एक ऐसा प्रतिशोध जिसने किसी को आहत नहीं किया, परन्तु सम्पूर्ण अयोध्या को सदा के लिए अपूर्ण छोड़ दिया। यह आलेख सीता के जीवन के तीन प्रमुख आयामों - पारिवारिक मान्यताओं का विखण्डन, उनके स्वयं के निर्णय, और अन्ततः उनका प्रतिशोध - को भूमिजा से भूमि-प्रवेश तक की यात्रा में खोजने का प्रयास है।


प्रथम खण्ड - भूमिजा: जन्म ही प्रथम विखण्डन



सीता का जन्म ही मान्यताओं के विखण्डन से आरम्भ होता है। वाल्मीकि परम्परा में सीता जनक को हल जोतते समय भूमि से प्राप्त होती हैं - वे किसी सामान्य वंश-परम्परा से नहीं आतीं, वे किसी माता के गर्भ से जन्म नहीं लेतीं। यह जन्म ही उस युग की वंश-केन्द्रित पितृसत्तात्मक मान्यता को पहला आघात है, जिसमें कन्या का मूल्य पिता के वंश से जुड़ा माना जाता था। भूमिजा होकर सीता पहले ही क्षण से परम्परा के बाहर खड़ी हो जाती हैं - वे किसी की "पुत्री" कम, स्वयं भूमि की प्रतिनिधि अधिक हैं।

आदि पर्व में जनक इस कन्या को अपनी सन्तान के रूप में स्वीकार अवश्य करते हैं, परन्तु यह स्वीकृति भी परम्परा का अनुसरण नहीं, परम्परा से एक विचलन है। मिथिला के दार्शनिक वातावरण में, जहाँ अष्टावक्र और गार्गी जैसे तत्त्वचिन्तक विचरण करते थे, यह विचलन असामान्य नहीं माना गया - किन्तु यही विचलन आगे चलकर अयोध्या के अधिक रूढ़िवादी परिवेश में सीता के लिए बार-बार संकट का कारण बनता है।


सम्पादकीय स्पष्टीकरण

भूमिजा शब्द का प्रयोग वाल्मीकि रामायण की मूल परम्परा से लिया गया है; इसे किसी आधुनिक व्याख्या से आरोपित नहीं किया गया है। सीता के जन्म-सम्बन्धी विवरण में विभिन्न परम्पराओं (वाल्मीकि, अध्यात्म रामायण, अद्भुत रामायण) में भिन्नता है, जिसे यहाँ पृथक-पृथक स्वीकार किया गया है, न कि परस्पर मिश्रित।



द्वितीय खण्ड - प्रथम निर्णय: वनगमन और मान्यताओं का पुनः विखण्डन



राम के वनगमन के समय सीता का साथ जाने का निर्णय भारतीय पारिवारिक मान्यताओं की दूसरी बड़ी परीक्षा है। उस युग की मान्यता यह थी कि राजमहल की रानी वन के कष्ट सहने के योग्य नहीं, और पत्नी का धर्म पति की अनुपस्थिति में राजपरिवार की सेवा में है, न कि पति के साथ वन में भटकने में। राम स्वयं सीता को अनेक तर्कों से रोकने का प्रयास करते हैं - वन के भय, हिंसक पशु, कठिन जीवन।

किन्तु सीता का उत्तर मान्यता को नहीं, धर्म की गहरी परिभाषा को स्वीकार करता है - पत्नी का स्थान पति के साथ है, चाहे राजमहल हो या वन। यह सीता का प्रथम स्वतन्त्र, आत्म-निर्णीत कदम है, जो उस युग की स्त्री-सम्बन्धी परम्परागत मान्यता - कि स्त्री का निर्णय पिता, पति अथवा पुत्र द्वारा ही लिया जाना चाहिए - को भीतर से चुनौती देता है, भले ही ऊपर से यह आज्ञाकारिता प्रतीत हो। सीता आज्ञा नहीं मानतीं, वे स्वयं निर्णय लेती हैं कि आज्ञा का पालन करना है या नहीं - और यह अन्तर मार्मिक है।


तृतीय खण्ड — अग्निपरीक्षा: विश्वास और सन्देह के द्वंद्व में विखण्डन



लंका-विजय के उपरान्त राम द्वारा सीता की पवित्रता पर उठाया गया प्रश्न पारिवारिक विश्वास की सबसे गहरी दरार है। यह क्षण केवल राम-सीता के दाम्पत्य का ही नहीं, अपितु उस सम्पूर्ण मान्यता का विखण्डन है जिसके अनुसार दीर्घ विरह और शत्रु के बन्दीगृह में रहने के उपरान्त स्त्री की निष्ठा पर प्रश्न उठाना समाज-सम्मत माना गया।

सीता अग्नि में प्रवेश करने का निर्णय स्वीकृति में नहीं, प्रतिवाद में लेती हैं। यह आत्मदाह नहीं, आत्म-प्रमाण है - एक ऐसा निर्णय जो मान्यता के समक्ष झुकने के स्थान पर मान्यता को ही परीक्षा में डाल देता है। अग्नि परीक्षा से सीता का शुद्ध होकर निकलना केवल उनकी पवित्रता का प्रमाण नहीं, अपितु राम की मान्यता पर प्रकृति एवं दैवीय सत्ता द्वारा दिया गया मौन उत्तर भी है।


दूसरा पक्ष

कतिपय विद्वान इस प्रसंग को सीता के आत्मसमर्पण के रूप में पढ़ते हैं, जिसमें वे परम्परा के समक्ष अपनी निष्ठा प्रमाणित करने हेतु बाध्य होती हैं। यह दृष्टिकोण अग्निपरीक्षा को सीता की विवशता के रूप में देखता है, न कि उनके सशक्त निर्णय के रूप में। दोनों दृष्टिकोणों का पाठक स्वतन्त्र रूप से मूल्यांकन कर सकता है।



चतुर्थ खण्ड - द्वितीय वनवास: मौन विखण्डन, मौन निर्णय



अयोध्या लौटकर भी सीता को स्थायी स्वीकृति नहीं मिलती। लोकापवाद के भय से राम द्वारा गर्भवती सीता का पुनः वनवास पारिवारिक मान्यताओं का सर्वाधिक क्रूर विखण्डन है - इस बार सीता के विरुद्ध कोई प्रत्यक्ष आरोप नहीं, केवल अनाम प्रजा की शंका है। राजधर्म के नाम पर पतिधर्म और पारिवारिक उत्तरदायित्व का यह त्याग सीता के जीवन का सबसे गहरा आघात है।

किन्तु इस आघात के उपरान्त सीता का आचरण उल्लेखनीय है - वे न शाप देती हैं, न विलाप में डूबती हैं। वाल्मीकि के आश्रम में लव-कुश का पालन-पोषण करते हुए वे स्वयं को पुनः स्थापित करती हैं, इस बार पत्नी या रानी के रूप में नहीं, अपितु माता और स्वतन्त्र सत्ता के रूप में। यह मौन ही उनका द्वितीय बड़ा निर्णय है -प्रतिवाद के स्थान पर आत्मनिर्भरता का चयन।


पंचम खण्ड - भूमि-प्रवेश: निर्णय की चरम परिणति और सच्चा प्रतिशोध



अश्वमेध यज्ञ में जब राम पुनः सीता से लोक-समक्ष शुद्धता सिद्ध करने की अपेक्षा करते हैं, तब सीता का अन्तिम निर्णय आता है - भूमि से प्रार्थना कि यदि वे सर्वदा मन-वचन-कर्म से शुद्ध रही हों, तो भूमि उन्हें अपनी गोद में समा ले। यह प्रार्थना स्वीकार होती है, और भूमि विवर देकर सीता को अपने भीतर ले लेती है।

यहीं सीता की सम्पूर्ण यात्रा का अन्तिम एवं सर्वाधिक मार्मिक अर्थ प्रकट होता है। यह पलायन नहीं, प्रतिशोध का सर्वोच्च रूप है - किन्तु ऐसा प्रतिशोध जिसमें कोई हिंसा नहीं, कोई शाप नहीं, केवल स्वयं की गरिमा का अन्तिम एवं अखण्डनीय प्रमाण है। सीता तीसरी बार परीक्षा देने से इनकार करती हैं - यह इनकार ही उनका प्रतिशोध है। वे राम को, अयोध्या को, और उस सम्पूर्ण मान्यता-व्यवस्था को, जो स्त्री से बार-बार प्रमाण माँगती रही, यह सन्देश देकर जाती हैं कि प्रमाण की एक सीमा होती है, और उस सीमा के पार केवल आत्म-सम्मान शेष रहता है।

भूमिजा का भूमि में लौटना इस अर्थ में वृत्त का पूर्ण होना है - किन्तु यह पूर्णता विषाद की नहीं, विजय की पूर्णता है। सीता उस भूमि में लौटती हैं जिससे वे आईं, इस प्रकार यह सिद्ध करते हुए कि उनकी सत्ता किसी वंश, किसी विवाह अथवा किसी राजसत्ता की मुखापेक्षी कभी नहीं थी।


सम्पादकीय स्पष्टीकरण

भूमि-प्रवेश की कथा वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में वर्णित है, जिसकी प्रामाणिकता को लेकर विद्वानों में मतभेद रहा है। यहाँ इस प्रसंग को परम्परा-सम्मत कथा के रूप में स्वीकार करते हुए प्रस्तुत किया गया है, न कि ऐतिहासिक तथ्य के रूप में।



उपसंहार - प्रतिशोध का पुनर्पाठ



क्या सीता का भूमि-प्रवेश वस्तुतः प्रतिशोध था? परम्परागत अर्थ में प्रतिशोध वह होता है जो प्रतिपक्ष को दण्डित करे। किन्तु सीता का प्रतिशोध इस परिभाषा को भी विखण्डित करता है - वे किसी को दण्डित नहीं करतीं, वे केवल स्वयं को उस व्यवस्था से मुक्त करती हैं जिसने बार-बार उनसे प्रमाण माँगा। यही मुक्ति उनका सर्वाधिक शक्तिशाली प्रतिशोध बनती है, क्योंकि इसके उपरान्त राम को, अयोध्या को और सम्पूर्ण भावी पीढ़ियों को यह प्रश्न सदा कचोटता रहा - कि क्या यह आवश्यक था?

भूमिजा से भूमि की गोद तक की यह यात्रा हमें स्मरण कराती है कि सीता केवल सहनशीलता की प्रतिमूर्ति नहीं थीं - वे प्रत्येक विखण्डन के उपरान्त एक नया निर्णय लेने वाली सशक्त चेतना थीं, और अन्ततः उन्होंने ही निर्णय लिया कि इस यात्रा का अन्त कब और कैसे होगा। यही सीतायण का मूल स्वर है - सीता कथा की केन्द्र-चेतना सदा रहीं, चाहे कथाकार उन्हें परिधि पर रखने का कितना भी प्रयास करें।


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