सीता : राष्ट्र की प्रथम शिक्षिका, लव-कुश : सत्ता से प्रश्न करने वाली पहली पीढ़ी,देश के प्रथम कुलपति वाल्मीकि, प्रथम शिक्षिका सीता और प्रथम छात्र लव-कुश
भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि उसने राष्ट्र को केवल भूगोल नहीं माना। उसके लिए राष्ट्र एक जीवित चेतना था,जिसमें भूमि थी, लोक था, संस्कृति थी, ज्ञान था, न्याय था और आने वाली पीढ़ियों के प्रति उत्तरदायित्व था।इसीलिए रामायण को केवल राजा राम की कथा मान लेना उसके विराट अर्थ को छोटा कर देना है। रामायण के भीतर एक ऐसी कथा भी प्रवाहित होती है जिसमें एक स्त्री,सीता,राजमहल से दूर जाकर एक आश्रम में राष्ट्र के भविष्य का निर्माण करती है; एक ऋषि,वाल्मीकि,ज्ञान को राजसत्ता से स्वतंत्र रखकर उसके लिए संस्थागत आधार तैयार करते हैं; और दो बालक,लव और कुशपहली बार सत्ता के सामने खड़े होकर प्रश्न करते हैं।
यहीं से भारतीय चिंतन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण परंपरा दिखाई देती है,सत्ता बड़ी हो सकती है, लेकिन प्रश्न उससे बड़ा होता है।और प्रश्न यदि सत्य पर आधारित हो, तो उसका उत्तर सत्ता को देना ही पड़ता है।इसी अर्थ में वाल्मीकि को केवल रामायण के आदि कवि के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। वे उस ज्ञान-परंपरा के आचार्य हैं जिसमें शिक्षा राजाज्ञा से नहीं, सत्य की खोज से संचालित होती है।
उनका आश्रम केवल तपोभूमि नहीं था।वह एक प्रकार का ज्ञान-विश्वविद्यालय था। और यदि वाल्मीकि उस ज्ञान-परंपरा के आचार्य थे, तो सीता उसकी प्रथम महान शिक्षिका थीं।लव और कुश उस शिक्षा के प्रथम विद्यार्थी। यह दृश्य भारतीय राष्ट्र-चिंतन की दृष्टि से असाधारण है। एक ओर अयोध्या की सत्ता है। दूसरी ओर वन का आश्रम।,एक ओर राजदंड है।दूसरी ओर ज्ञान। एक ओर मंत्रिपरिषद् है।दूसरी ओर दो बालक।और इन दोनों के बीच खड़ा है—प्रश्न।
सीता : राजमहल से राष्ट्रशाला तकसीता का वनवास यदि केवल व्यक्तिगत पीड़ा की कथा है, तो उसका आधा अर्थ ही सामने आता है। सीता ने राजमहल छोड़ा, लेकिन राष्ट्र नहीं छोड़ा। उन्होंने अयोध्या छोड़ी, लेकिन भारत की चिंता नहीं छोड़ी। उन्होंने सत्ता से दूरी बनाई, लेकिन समाज से दूरी नहीं बनाई। वाल्मीकि आश्रम में सीता का जीवन इस बात का प्रमाण बनता है कि राष्ट्र निर्माण केवल राजसिंहासन पर बैठकर नहीं होता। राष्ट्र निर्माण उस समय भी होता है जब एक माँ अपने बच्चों को यह सिखाती है कि,सत्य क्या है?न्याय क्या है?कर्तव्य क्या है?राजा की मर्यादा क्या है?प्रजा का अधिकार क्या है?और सबसे महत्वपूर्ण-अन्याय के सामने मौन रहना क्या स्वयं अन्याय में भागीदारी नहीं है?सीता ने लव-कुश को केवल शस्त्र नहीं सिखाए। उन्होंने उन्हें शास्त्र का अर्थ समझाया। उन्होंने उन्हें केवल युद्ध के लिए तैयार नहीं किया।उन्होंने उन्हें जीवन के लिए तैयार किया।उन्होंने उन्हें केवल धनुष चलाना नहीं सिखाया। उन्होंने उन्हें विवेक चलाना सिखाया। यही सीता की शिक्षा की सबसे बड़ी विशेषता थी।
वाल्मीकि : राष्ट्र के प्रथम कुलपति की संकल्पना::आधुनिक अर्थ में ‘कुलपति’ शब्द का प्रयोग प्राचीन काल के लिए करना एक व्याख्यात्मक रूपक है, लेकिन उसके भीतर छिपा भाव अत्यंत सार्थक है।वाल्मीकि के आश्रम में ज्ञान किसी राजदरबार की संपत्ति नहीं था।वहाँ प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता थी।वहाँ जीवन का अध्ययन था।वहाँ प्रकृति थी।वहाँ शास्त्र था।वहाँ शस्त्र था।वहाँ काव्य था।वहाँ अनुशासन था।और वहाँ चरित्र निर्माण था।यदि विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल परीक्षा पास कराना नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज का निर्माण करना है, तो वाल्मीकि आश्रम को भारतीय ज्ञान-परंपरा के एक आदर्श गुरुकुल के रूप में देखा जा सकता है।वाल्मीकि ने लव-कुश को केवल राम की कथा नहीं सुनाई।उन्होंने उन्हें ऐसी कथा दी जिसमें राजा भी प्रश्नों से ऊपर नहीं था।यही शिक्षा की वास्तविक शक्ति है।जिस शिक्षा में विद्यार्थी केवल उत्तर याद करे, वह शिक्षा अधूरी है।जिस शिक्षा में विद्यार्थी प्रश्न करना सीख जाए, वही शिक्षा राष्ट्र बनाती है।
सीता : भारत की प्रथम शिक्षिका का भाव::सीता की शिक्षिका के रूप में सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनका पाठ्यक्रम जीवन था।उन्होंने अपने पुत्रों को किसी पुस्तक के पन्नों में बंद ज्ञान नहीं दिया।उन्होंने उन्हें अपने जीवन से पढ़ाया।त्याग से पढ़ाया।पीड़ा से पढ़ाया।धैर्य से पढ़ाया।मर्यादा से पढ़ाया।और सबसे बढ़कर—आत्मसम्मान से पढ़ाया।सीता ने अपने बच्चों को यह नहीं सिखाया कि वे अपने पिता से घृणा करें।उन्होंने उन्हें यह भी नहीं सिखाया कि वे अयोध्या से बदला लें।उन्होंने उन्हें विद्रोह का संस्कार नहीं दिया।उन्होंने उन्हें न्याय का संस्कार दिया।यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है।विद्रोह व्यक्ति के विरुद्ध हो सकता है।न्याय व्यवस्था के विवेक को संबोधित करता है।लव-कुश के भीतर जो शक्ति विकसित हुई, वह प्रतिशोध की शक्ति नहीं थी।वह प्रश्न की शक्ति थी।
लव-कुश : राष्ट्र के प्रथम प्रश्नकर्ता::लव और कुश की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि वे महान योद्धा थे।उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने सत्ता के सामने प्रश्न रखा।उन्होंने राजसत्ता को चुनौती देने के लिए शस्त्र उठाने से पहले शब्द उठाए। वे रामकथा गाते हैं।वे कथा के माध्यम से समाज के सामने उसके अपने आदर्शों का दर्पण रखते हैं।और जब वही कथा राजसत्ता के सामने आती है, तो एक अद्भुत स्थिति पैदा होती है।राजा राम अपने ही जीवन की कथा सुनते हैं।वह कथा किसी दरबारी कवि की प्रशस्ति नहीं है।वह जीवन का आईना है।और आईने के सामने सत्ता भी सामान्य मनुष्य की तरह खड़ी होती है।वह स्वयं को देखती है। पहली बार सत्ता से प्रश्न::भारतीय राजनीतिक चिंतन के इतिहास में यह प्रसंग अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीक बन सकता है।लव-कुश सत्ता से यह नहीं पूछते कि-“हमारे पिता कौन हैं?”वे इससे बड़ा प्रश्न पूछते हैं-“राजधर्म क्या है?”राजा का धर्म केवल प्रजा की बात मानना है या प्रजा को न्याय देना?लोकमत और न्याय में संघर्ष हो तो राजा किसका साथ दे?एक निर्दोष व्यक्ति के साथ केवल संदेह के आधार पर अन्याय हो तो राजधर्म क्या कहता है?क्या राजा का निजी जीवन भी सार्वजनिक नैतिकता का विषय है?और यदि राजा स्वयं अपने निर्णय से पीड़ित हो जाए, तो क्या वह निर्णय स्वतः न्यायपूर्ण हो जाता है?ये प्रश्न केवल राम से नहीं हैं।ये हर युग की सत्ता से हैं।
माँ सीता ने दिया उत्तर::सबसे अद्भुत बात यह है कि इन प्रश्नों का उत्तर सीता देती हैं।सीता प्रत्यक्ष राजनीतिक भाषण नहीं देतीं।उनका जीवन ही उत्तर बन जाता है।उनका वनवास उत्तर है।उनका धैर्य उत्तर है।उनका मातृत्व उत्तर है।उनका मौन उत्तर है।और अंततः उनकी पृथ्वी में वापसी भी एक उत्तर है।सीता कहती हुई प्रतीत होती हैं—राज्य किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है।राजा भी धर्म से बड़ा नहीं है।लोकमत महत्वपूर्ण है, लेकिन न्याय उससे भी ऊपर है। और स्त्री की गरिमा किसी राजकीय निर्णय की कृपा पर निर्भर नहीं हो सकती।यही सीता की सबसे बड़ी राजनीतिक शिक्षा है।
निरुत्तर राम::लव-कुश के सामने राम का मौन पराजय का मौन नहीं है।यह आत्ममंथन का मौन है।राम महान इसलिए नहीं हैं कि उन्होंने कभी कठिन निर्णय नहीं लिया।राम महान इसलिए हैं कि कठिन निर्णयों के परिणामों से वे स्वयं भी बच नहीं पाए।उनका हृदय जानता है कि सीता के साथ हुआ वियोग केवल व्यक्तिगत नहीं है।उसके पीछे राजधर्म की कठोरता है।और राजधर्म की उस कठोरता की कीमत स्वयं राजा को भी चुकानी पड़ती है।लव-कुश जब रामकथा सुनाते हैं, तो राम अपने ही जीवन के सामने खड़े हो जाते हैं।राजा राम के पास सत्ता है, लेकिन उस क्षण उनके पास उत्तर नहीं है।यही उनकी मानवीय महानता है।
निरुत्तर अयोध्या::राम अकेले नहीं हैं।अयोध्या भी उस प्रश्न के सामने खड़ी है।वह अयोध्या जिसने लोकमत को महत्व दिया था, अब उसी लोकमत के परिणाम को देख रही है।एक समाज को यह समझना पड़ता है कि उसके शब्दों की कीमत होती है।यदि समाज किसी के चरित्र पर प्रश्न उठाता है, तो उसके परिणाम किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहते।सीता का वनवास केवल राजमहल का निर्णय नहीं था।वह सामाजिक चेतना की भी परीक्षा थी।इसलिए लव-कुश की कथा अयोध्या से भी प्रश्न करती है-क्या प्रजा केवल राजा से उत्तर मांग सकती है, या उसे अपने प्रश्नों की नैतिक जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी चाहिए?अयोध्या इस प्रश्न पर भी निरुत्तर है।
निरुत्तर मंत्रिपरिषद्::राज्य केवल राजा से नहीं चलता।राज्य के पीछे सलाहकार होते हैं।मंत्री होते हैं।पुरोहित होते हैं।आचार्य होते हैं।प्रशासन होता है।इसलिए जब किसी निर्णय का परिणाम सामने आता है, तो प्रश्न केवल राजा से नहीं होता।मंत्रिपरिषद् से भी होता है।राजधर्म में सलाह देने वालों का धर्म क्या है?क्या मंत्री केवल राजा की इच्छा को स्वीकार करे?या आवश्यकता पड़ने पर राजा से असहमति व्यक्त करे?यदि राजा भावनात्मक दबाव में कोई निर्णय लेने जा रहा हो, तो क्या मंत्री का कर्तव्य नहीं कि वह उसे रोके?लव-कुश का प्रश्न इसलिए मंत्रिपरिषद् तक जाता है।और वहाँ भी एक गहरा मौन दिखाई देता है। सत्ता की सबसे बड़ी कमजोरी तब होती है जब उसके आसपास बैठे लोग सत्य बोलना बंद कर देते हैं।
निरुत्तर आचार्य वशिष्ठ::आचार्य वशिष्ठ भारतीय परंपरा में केवल पुरोहित नहीं हैं।वे ज्ञान, परंपरा और राजधर्म के प्रतिनिधि हैं। इसलिए सीता का प्रसंग उनके सामने भी एक नैतिक प्रश्न बनकर आता है।आचार्य का धर्म राजा का समर्थन करना मात्र नहीं।आचार्य का धर्म है-राजा को धर्म का बोध कराना। जहाँ राजा और धर्म के बीच तनाव उत्पन्न हो, वहाँ आचार्य को धर्म की ओर संकेत करना चाहिए। इसीलिए लव-कुश की उपस्थिति में वशिष्ठ का मौन भी अर्थपूर्ण है। यह मौन हमें आज के लिए प्रश्न देता हैक्या विद्वान सत्ता के निकट जाकर अपनी स्वतंत्रता खो सकता है?और यदि विद्वान सत्य बोलने से डर जाए, तो समाज का मार्गदर्शन कौन करेगा?
वाल्मीकि ने दिया साथ::जब राजसत्ता, समाज और राजसभा सब प्रश्नों के सामने खड़े होते हैं, तब वाल्मीकि आगे आते हैं।उन्होंने सीता को आश्रय दिया।यह केवल एक स्त्री को आश्रम में स्थान देना नहीं था।यह अन्याय से पीड़ित मनुष्य को गरिमा के साथ जीने का अधिकार देना था।उन्होंने लव-कुश को शिक्षा दी।उन्होंने उन्हें ऐसी भाषा दी जिसमें वे सत्ता के सामने बिना भय खड़े हो सकें।और उन्होंने पूरी कथा को काव्य में संरक्षित कर दिया।यह अत्यंत महत्वपूर्ण है।सत्ता के पास राजकीय अभिलेख हो सकते हैं।लेकिन समाज की स्मृति साहित्य में रहती है।वाल्मीकि ने सीता की पीड़ा को इतिहास के हाशिये पर नहीं जाने दिया।उन्होंने उसे महाकाव्य के केंद्र में स्थान दिया।
सीता का वास्तविक विश्वविद्यालय::वाल्मीकि आश्रम को यदि एक विश्वविद्यालय मानें तो उसका सबसे बड़ा विभाग था-चरित्र निर्माण।सीता उसकी पहली महान शिक्षिका थीं-लव-कुश उसके विद्यार्थी।वाल्मीकि उसके कुलपति-सदृश आचार्य।और पाठ्यक्रम था-प्रकृति, नीति, शस्त्र, शास्त्र, संगीत, काव्य, इतिहास और लोकधर्म।यहाँ शिक्षा का उद्देश्य नौकरी नहीं था।यहाँ शिक्षा का उद्देश्य था-ऐसा मनुष्य बनाना जो सत्ता से डरकर सत्य न छोड़े।आज भी किसी राष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था की सफलता का यही अंतिम पैमाना होना चाहिए।
सीता के भीतर गढ़ा गया सशक्त राष्ट्र::सीता ने लव-कुश में जिस राष्ट्र की कल्पना गढ़ी, वह केवल शक्तिशाली राष्ट्र नहीं था।वह न्यायपूर्ण राष्ट्र था।सशक्त राष्ट्र के लिए सेना चाहिए।लेकिन उससे पहले चरित्र चाहिए।सशक्त राष्ट्र के लिए धन चाहिए।लेकिन उससे पहले ईमानदार व्यवस्था चाहिए।सशक्त राष्ट्र के लिए राजा चाहिए।लेकिन उससे पहले जागरूक नागरिक चाहिए।और सशक्त राष्ट्र के लिए शिक्षा चाहिए।लेकिन ऐसी शिक्षा चाहिए जो विद्यार्थी को केवल आज्ञाकारी न बनाएविवेकशील बनाए। लव-कुश इसी शिक्षा के परिणाम हैं।वे सत्ता के शत्रु नहीं हैं। वे सत्ता के नैतिक परीक्षक हैं।
सीता : स्त्री नहीं, एक सभ्यता की चेतना::सीता को केवल त्याग की मूर्ति बनाकर देखना उनके व्यक्तित्व को सीमित करना है।वे प्रश्न हैं। वे प्रतिरोध हैं।वे धैर्य हैं। वे मातृत्व हैं। वे शिक्षा हैं।वे आत्मसम्मान हैं। और वे राष्ट्र की नैतिक चेतना हैं।उन्होंने कोई राजसिंहासन नहीं माँगा।उन्होंने कोई सेना नहीं माँगी।उन्होंने कोई राजनीतिक पद नहीं माँगा। फिर भी उन्होंने आने वाली पीढ़ी को ऐसा संस्कार दिया जिसने राजसभा के सामने प्रश्न खड़ा कर दिया।यही किसी भी महान शिक्षिका की सबसे बड़ी शक्ति है।वह स्वयं सत्ता में नहीं होती। लेकिन उसकी शिक्षा एक दिन सत्ता के सामने खड़ी हो जाती है।
लव-कुश का प्रश्न : आज के भारत के लिए संदेश::लव-कुश की कथा आज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हर युग को अपने प्रश्नकर्ता चाहिए। लोकतंत्र में राजा बदलते हैं।व्यवस्थाएँ बदलती हैं।संविधान और कानून विकसित होते हैं।लेकिन एक बात स्थायी रहती है-सत्ता को प्रश्नों का उत्तर देना पड़ता है।आज का विद्यार्थी भी प्रश्न करे।लेकिन प्रश्न ज्ञान से करे।आज का नागरिक भी प्रश्न करे।लेकिन प्रश्न जिम्मेदारी से करे।आज का पत्रकार भी प्रश्न करे।लेकिन प्रश्न सत्य के आधार पर करे।आज का विद्वान भी प्रश्न करे।लेकिन प्रश्न राष्ट्रहित और न्याय के पक्ष में करे।यही लव-कुश की परंपरा है।
सीता का अंतिम पाठ::सीता ने लव-कुश को सबसे बड़ा पाठ शायद यह दिया-“सत्ता से घृणा मत करना।सत्ता से भयभीत भी मत होना।उसे धर्म का दर्पण दिखाना।”यह शिक्षा किसी एक काल की नहीं। यह हर सभ्यता की आवश्यकता है।जहाँ प्रश्न समाप्त होते हैं, वहाँ लोकतंत्र कमजोर होता है। जहाँ सत्य बोलने वाले समाप्त होते हैं, वहाँ संस्थाएँ खोखली होती हैं।जहाँ शिक्षक केवल पाठ पढ़ाते हैं और चरित्र निर्माण नहीं करते, वहाँ राष्ट्र अपनी आत्मा खो देता है। इसलिए सीता की शिक्षा आज भी प्रासंगिक है।
एक माँ ने इतिहास बदल दिया::सीता ने कोई घोषणा नहीं की।उन्होंने कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं चलाया।उन्होंने कोई राजकीय विद्रोह नहीं किया।उन्होंने केवल अपने पुत्रों को शिक्षित किया।लेकिन कभी-कभी इतिहास बदलने के लिए इतना ही पर्याप्त होता है।एक माँ अपने बच्चे को सत्य बोलना सिखा दे-इतिहास बदल सकता है।एक शिक्षक अपने विद्यार्थी को प्रश्न करना सिखा दे-व्यवस्था बदल सकती है।एक आचार्य ज्ञान को सत्ता से स्वतंत्र रख दे-सभ्यता बच सकती है।और एक कवि सत्य को शब्द दे दे-सदियाँ उसे भूल नहीं सकतीं। वाल्मीकि ने शब्द दिए।सीता ने संस्कार दिए।लव-कुश ने प्रश्न दिए।और रामकथा ने भारत को एक ऐसा दर्पण दे दिया जिसमें हर युग अपनी सत्ता, समाज और स्वयं को देख सकता है।
जहाँ प्रश्न समाप्त होता है, वहाँ राष्ट्र का पतन आरम्भ होता है::सीता की कथा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि राष्ट्र केवल राजमहलों से नहीं बनता।राष्ट्र आश्रमों में बनता है।विद्यालयों में बनता है।माताओं की गोद में बनता है।गुरुओं के चरित्र में बनता है।विद्यार्थियों के प्रश्नों में बनता है।और सत्ता के उत्तरदायित्व में बनता है।इसलिए-वाल्मीकि ज्ञान के प्रहरी हैं।सीता राष्ट्र की प्रथम महान शिक्षिका हैं। लव-कुश प्रश्न करने वाली प्रथम जागरूक पीढ़ी के प्रतीक हैं।और रामउस सत्ता के प्रतीक हैं जिसे अपने ही आदर्शों के सामने उत्तर देना पड़ता है।उस क्षण राम निरुत्तर हैं।अयोध्या निरुत्तर है। मंत्रिपरिषद् निरुत्तर है।आचार्य वशिष्ठ भी प्रश्न के भार से गंभीर हैं। लेकिन वाल्मीकि मौन नहीं हैं।वे इतिहास को लिखते हैं।सीता मौन होकर भी उत्तर देती हैं।लव-कुश बालक होकर भी प्रश्न करते हैं।और यही वह क्षण है जब भारतीय सभ्यता हमें एक अमर सूत्र देती है“सत्ता का सम्मान करो, लेकिन सत्य को सत्ता से बड़ा मानो।”यही सीता की शिक्षा है। यही वाल्मीकि की परंपरा है।यही लव-कुश का प्रश्न है। और यही एक सशक्त राष्ट्र की पहली शर्त है।
