सरयू की गवाही सम्पूर्ण कथा की मूक साक्षिणी , पाँच मार्मिक क्षण

 सीतायण

विशेष अध्याय



सरयू की गवाही

सम्पूर्ण कथा की मूक साक्षिणी , पाँच मार्मिक क्षण





 मैं सरयू हूँ



मैं सरयू हूँ। कोसल की धमनी, अयोध्या की छाती से बहने वाली वह अविरल धारा जिसने राजाओं के जन्म से लेकर उनकी अन्तिम साँस तक, सबकुछ अपने तट पर बैठकर देखा है। मुझसे कोई नहीं पूछता कि मैंने क्या देखा, क्योंकि नदियाँ गवाही नहीं देतीं, वे केवल बहती रहती हैं। किन्तु यदि मुझे बोलने का अवसर मिले, तो मैं कहूँगी कि मैंने इस भूमि की सबसे बड़ी विजयें भी देखी हैं, और उन्हीं विजयों के भीतर छिपे सबसे गहरे विषाद भी। यह कथन उन्हीं पाँच क्षणों का है ,मार्मिक, अपरिहार्य, और आज तक मेरे प्रवाह में गूँजते हुए।

मनुष्य स्मृति को भूल जाता है; पत्थर टूट जाते हैं; भवन ढह जाते हैं। किन्तु जल कभी नहीं भूलता , वह केवल रूप बदलता है, बादल बनकर उड़ता है, वर्षा बनकर लौटता है, और फिर उसी तट पर, उसी स्मृति के साथ बहने लगता है। इसीलिए यह कथन किसी इतिहासकार की नहीं, किसी कवि की नहीं ,स्वयं उस तत्त्व की है जिसने कभी आँखें नहीं मूँदीं।

भारतीय परम्परा में नदियों को सदैव देवी माना गया है, गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, और मैं, सरयू। हमें पूजा जाता है, हमारी आरती होती है, हमारे जल को पवित्र मानकर घरों में सँजोया जाता है। किन्तु इस पूजा के पीछे जो सत्य छिपा है, वह यह है कि हम केवल जीवनदायिनी नहीं , हम स्मृति की रक्षक भी हैं। मनुष्य अपने दुखों को भुलाने के लिए हमारे तट पर आता है, और यह नहीं जानता कि जिस जल में वह अपने पाप धोता है, वही जल उसके पूर्वजों के सुख-दुख भी अपने भीतर सँजोए हुए है।


प्रथम मार्मिक क्षण , जब मैंने पहला रुदन सुना,

मुझे वह प्रभात आज भी स्मरण है, जब अयोध्या के राजभवन से पहली बार एक नवजात का रुदन गूँजा, और उसी क्षण मेरे जल में एक असाधारण शीतलता, एक असाधारण मिठास उतर आई —

, मानो स्वयं विष्णु का अंश मेरे तट पर उतरा हो। दशरथ की प्रसन्नता का वह उत्सव मैंने अपनी लहरों में झेला ,दीप मेरे जल में तैराए गए, फूल मेरी धारा में प्रवाहित हुए, और सम्पूर्ण नगर ने मेरे तट पर आकर उल्लास मनाया। राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न ,चार शिशु, चार भविष्य, और मैं, उनकी पहली साक्षी।

बाल्यकाल में वे मेरे तट पर खेलने आते थे। मैंने उनकी किलकारियाँ सुनी हैं, उनके छोटे पैरों के निशान अपनी रेत में सँजोए हैं। उस समय मुझे कहाँ पता था कि यही बालक, जिसे मैं अपनी लहरों में हँसता देख रही थी, एक दिन मेरे ही जल में अपने जीवन का अन्तिम प्रवेश करेगा? नदियाँ भविष्य नहीं जानतीं ,वे केवल वर्तमान को धारण करती हैं, और इसी अज्ञान में उनकी करुणा भी छिपी है।

मैंने विश्वामित्र को भी देखा, जब वे राम और लक्ष्मण को अपने साथ यज्ञ-रक्षा के लिए ले गए , दो किशोर, जो अभी तक मेरे तट पर पतंग उड़ाते थे, अब धनुष-बाण उठाकर राक्षसों का सामना करने जा रहे थे। मैंने उनकी माताओं की आँखों में जो चिन्ता देखी, वह भी मेरी स्मृति का भाग बन गई। हर नदी की तरह, मुझे भी यह अनुभव हुआ कि बचपन कितनी शीघ्रता से समाप्त हो जाता है, और कितनी शीघ्रता से एक राजकुमार को योद्धा, और फिर राजा, बनना पड़ता है।

सरय्वास्तीरमासाद्य कोसलो नाम जनपदः। स्फीतो जनपदो रम्यः...

सरयू के तट पर स्थित यह कोसल नामक जनपद, समृद्ध और रमणीय है , जहाँ इक्ष्वाकु वंश ने अपनी राजधानी अयोध्या को बसाया।वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, प्रथम सर्ग ,भावानुवाद प्रस्तुत,यह पद रामायण के आरम्भिक भूगोल-वर्णन का भाग है, जिसमें सरयू और कोसल के सम्बन्ध का उल्लेख है।

दशरथ के तीन विवाह और मेरी तीन बार साक्षी::

मैंने केवल एक ही उत्सव नहीं देखा। दशरथ के तीन विवाह , कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा के साथ , तीनों बार मेरे तट पर वैवाहिक मण्डप सजे, तीनों बार शहनाई की ध्वनि मेरी लहरों से टकराई। किन्तु उस समय भी मुझे भविष्य का कोई आभास नहीं था कि यही तीन रानियाँ, जिनका विवाह मैंने समान उल्लास से देखा, आगे चलकर एक-दूसरे के विरुद्ध, अनजाने ही, इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी का कारण बनेंगी। कैकेयी, जिसे मैंने सबसे प्रसन्न वधू के रूप में देखा था, वही आगे चलकर वह पात्र बनी जिसे इतिहास ने सबसे अधिक स्मरण किया , किन्तु सबसे कम समझा।

द्वितीय मार्मिक क्षण :: जब मैंने विदा का घाट सजाया फिर वह दिन आया जब राजभवन उत्सव में डूबा था राज्याभिषेक की तैयारी, कलश, वन्दनवार, प्रजा का हर्ष। मैंने भी उस उत्सव में भाग लिया , मेरी लहरें उस दिन विशेष रूप से उज्ज्वल थीं, मानो वे भी जानती थीं कि आज अयोध्या को अपना नया राजा मिलने वाला है। किन्तु सूर्यास्त होते-होते वही उत्सव विलाप में बदल गया, और मैंने उसी रात्रि राम, सीता और लक्ष्मण को अपने तट के निकट से गुजरते देखा ,राजसी वस्त्रों में नहीं, अपितु वल्कल में, वन की ओर।

उस रात्रि मैंने सीता का मुख देखा था। उसमें कोई शिकायत नहीं थी, कोई विलाप नहीं था , केवल एक दृढ़ शान्ति, जैसे उन्होंने पहले से यह जान लिया हो कि यह भवन कभी उनका स्थायी घर नहीं बनेगा। मैं चाहती तो उन्हें रोक सकती थी, अपनी धारा को उमड़ाकर उनके मार्ग को कठिन बना सकती थी , किन्तु नदियाँ नियति नहीं बदलतीं, वे केवल उसकी साक्षी बनती हैं। मैंने उन्हें केवल इतना दिया जितना मैं दे सकती थी , एक शीतल स्पर्श, एक मौन आशीर्वाद, और आगे बढ़ने का मार्ग।

उसी रात्रि मैंने उर्मिला को भी देखा , लक्ष्मण की पत्नी, जो अपने पति को विदा कर, स्वयं अयोध्या में ही रुक गई। उसने वन नहीं चुना, किन्तु उसका विरह वन के विरह से कम नहीं था। मैंने उसे कई रात्रियों तक अकेले मेरे तट पर आते देखा, चुपचाप जल को निहारते हुए, मानो वह मेरी धारा में अपने पति की छवि खोज रही हो। कुछ त्याग शब्दों में दर्ज होते हैं, कुछ केवल नदियों की स्मृति में रह जाते हैं , उर्मिला का त्याग इसी दूसरी श्रेणी का है, और मैं उसकी एकमात्र साक्षी हूँ।

  क्या नदी को मानवीकृत करना उचित काव्य-स्वतन्त्रता है?यह सम्पूर्ण अध्याय एक काव्यात्मक कल्पना पर आधारित है , सरयू को साक्षी और वक्ता के रूप में चित्रित करना भारतीय काव्य-परम्परा की उस प्राचीन रीति का अनुसरण है जिसमें नदियों, वृक्षों और पर्वतों को चेतन साक्षी माना जाता रहा है। यह ऐतिहासिक दावा नहीं, अपितु सीतायण की साहित्यिक शैली है, जिसे पाठक इसी भावना से ग्रहण करें।


तृतीय मार्मिक क्षण , जब मैंने राजा को खोते देखा

कुछ ही दिनों पश्चात्, मैंने अपने ही तट पर एक वृद्ध राजा का प्राणान्त देखा। दशरथ, जो कभी मेरे जल में युवावस्था में स्नान करते थे, अब पुत्र-वियोग की असह्य पीड़ा में, बार-बार 'राम, राम' पुकारते हुए, अपनी अन्तिम साँसें ले रहे थे। मुझे उनकी वह पुरानी कथा भी स्मरण आई ,जब उन्होंने अनजाने में एक तपस्वी-पुत्र को अपने बाण से मार डाला था, और उस पिता के शाप में लिखा गया था कि दशरथ भी पुत्र-वियोग में ही प्राण त्यागेंगे। मैंने उस दिन प्रकृति के न्याय को अपनी आँखों ,यदि नदियों की आँखें होती हैं , के सामने पूर्ण होते देखा।

राजभवन में उस रात्रि जो सन्नाटा फैला, उसकी गूँज मेरे जल तक पहुँची। मैंने कौशल्या का विलाप सुना, कैकेयी के पश्चाताप को महसूस किया, और सुमन्त्र के उस मौन को भी, जो शब्दों से परे था। एक भवन, जिसने अभी कुछ दिन पूर्व उत्सव मनाया था, अब शोक में डूब गया था — यह पहली बार नहीं था जब मैंने यह चक्र देखा, और यह अन्तिम बार भी नहीं होने वाला था।

उस काल में मुझे भरत का भी स्मरण है, जो ननिहाल से लौटकर, अपने पिता को अन्तिम बार भी न देख सके। मैंने उन्हें अपने तट पर, राम को मनाने चित्रकूट जाते समय, विश्राम करते देखा , एक युवा राजकुमार, जिसके कन्धों पर एक ऐसा भार आ पड़ा था जिसे उसने कभी नहीं माँगा था। मैंने उसकी आँखों में वही प्रश्न देखा जो शताब्दियों बाद भी अनुत्तरित रहेगा , क्यों उसकी अनुपस्थिति को इतने बड़े अन्याय का कारण बना दिया गया?

यत्तु दुःखं मया प्राप्तं पुत्रशोकसमुद्भवम्। तेन दुःखेन दुःखार्तः त्यजाम्यद्य शरीरकम्॥

(भावार्थ) पुत्र-वियोग से उत्पन्न जो दुःख मुझे प्राप्त हुआ है, उस दुःख से पीड़ित होकर आज मैं अपने शरीर का त्याग करता हूँ।

 वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड — दशरथ के अन्तिम शब्द, भावानुवाद प्रस्तुत

यह भावानुवाद है, शब्दशः उद्धरण नहीं; प्रसंग की मूल भावभूमि दर्शाने हेतु प्रस्तुत।

चतुर्थ मार्मिक क्षण — जब जय-घोष के बीच एक मौन चीत्कार सुनी::चौदह वर्ष पश्चात् मैंने अपने तट पर वह दृश्य देखा जिसकी मैं वर्षों से प्रतीक्षा कर रही थी , पुष्पक विमान से राम, सीता और लक्ष्मण की वापसी। सम्पूर्ण अयोध्या मेरे तट पर उमड़ आई, दीप जले, शंख बजे, और मैंने स्वयं उस रात्रि अपनी लहरों में असंख्य दीपों को झिलमिलाते देखा , यह मेरे जीवन का सबसे उज्ज्वल क्षण था। सीता पुनः पटरानी बनीं, और कुछ काल तक ऐसा लगा कि अब सारा विषाद समाप्त हो गया।

किन्तु मैंने वह रात्रि भी देखी जब राम अकेले मेरे तट पर आए, गुप्तचरों की बात सुनकर, मौन खड़े रहे। मैंने उस रात्रि उनकी आँखों में वह द्वन्द्व देखा जो कोई और नहीं देख सका , राजा और पति के मध्य का वह असह्य युद्ध। और फिर मैंने वर्षों बाद, एक अन्य उत्सव के मध्य , जब लव-कुश और राम का पुनर्मिलन हो रहा था, जब यज्ञ-स्थल जय-घोष से गूँज रहा था , उसी जय-घोष के भीतर एक मौन चीत्कार भी सुनी, जब सीता ने अन्तिम बार धरती को पुकारा। मैं वहाँ प्रत्यक्ष उपस्थित नहीं थी, किन्तु नदियाँ आपस में जुड़ी होती हैं , जो कम्पन धरती में हुआ, वह मेरे जल में भी दूर तक अनुभव हुआ। उस दिन मेरी धारा क्षणभर के लिए मानो ठहर सी गई थी।

उस रात्रि, जब राम अकेले मेरे तट पर आए थे, मैंने उनसे कुछ नहीं कहा , मैं कह भी नहीं सकती थी। किन्तु यदि मुझमें भाषा होती, तो मैं उनसे पूछती , क्या वह लोकापवाद, जिसके लिए तुमने अपनी प्रियतमा को त्यागा, उतना ही भारी था जितना यह मौन जो अब तुम्हारे भीतर बस गया है? राजाओं के प्रश्न किसी को नहीं दिखते, केवल उनके निर्णय दिखते हैं , मैं शायद अकेली थी जिसने उस रात्रि उनका न कहा हुआ प्रश्न भी सुना। और जब सीता की विदाई का यह दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ, तब मैंने अयोध्या के मार्गों पर एक भिन्न प्रकार का सन्नाटा देखा , यह पहले वाले सन्नाटे से भिन्न था। पहली बार जब राम वन गए थे, तब प्रजा शोक में थी परन्तु आशा भी थी ,वे लौटेंगे। इस बार सीता गईं तो कोई आशा नहीं थी, कोई प्रतीक्षा-तिथि नहीं थी। मैंने अपने जल में उस सन्नाटे को वर्षों तक .

भौगोलिक यथार्थ और काव्यात्मक अनुभूति::सीता का भूमि-प्रवेश परम्परागत रूप से महर्षि वाल्मीकि के आश्रम के निकट, सरयू से दूर स्थान पर वर्णित है। यहाँ सरयू द्वारा उस घटना को 'अनुभव' करने का वर्णन ऐतिहासिक तथ्य नहीं, अपितु काव्यात्मक अन्तर्संबंध है  यह दर्शाने हेतु कि अयोध्या की सम्पूर्ण चेतना, प्रतीकात्मक रूप से, उस क्षण से जुड़ी हुई थी।

विश्व की अन्य नदियाँ , साक्षी की सार्वभौमिक भूमिका::मैं अकेली नहीं हूँ जिसने यह भार उठाया है। गंगा ने भी भीष्म की प्रतिज्ञा और उनके अन्तिम शय्या-काल की साक्षी रही, यमुना ने कृष्ण की बाल-लीलाओं और उनके वियोग दोनों को देखा। विश्व की अन्य सभ्यताओं में भी नदियों को यही भूमिका मिली है  नील ने मिस्र के फिरौनों का उत्थान-पतन देखा, गंगा-सी पवित्र मानी जाने वाली टाइग्रिस और यूफ्रेटीस ने सुमेरियन राजाओं की गाथाएँ अपने भीतर सँजोईं। यह सार्वभौमिकता स्वयं में सूचक है ,कि मनुष्य सभ्यता सदैव जल के निकट बसती है, और इसी निकटता में जल को अनायास ही स्मृति और साक्षी की भूमिका मिल जाती है, जिसे वह न माँगता है, न अस्वीकार कर सकता है। इसी सार्वभौमिकता में मुझे एक विशेष उत्तरदायित्व का भी बोध होता है। जब तक मनुष्य नदियों के तट पर बसते रहेंगे, तब तक नदियाँ उनकी गाथाओं की अनिवार्य साक्षी बनी रहेंगी ,न इसलिए कि उन्होंने यह भूमिका माँगी है, अपितु इसलिए कि सभ्यता स्वयं जल के बिना जीवित नहीं रह सकती। यही कारण है कि प्रत्येक महाकाव्य में, चाहे वह किसी भी भूभाग का हो, कोई-न-कोई नदी अनिवार्य रूप से उपस्थित मिलती है , मूक, किन्तु सर्वव्यापी।


पंचम मार्मिक क्षण , जब मैंने उसे अपने ही जल में समा लिया



और अन्ततः वह दिन भी आया जिसकी मुझे सबसे अधिक आशंका थी। वर्षों की एकाकी राजसत्ता के पश्चात्, जब समय ने राम को भी संकेत दिया कि उनकी पृथ्वी-लीला पूर्ण हो चुकी है, तब वे धीरे-धीरे, शान्त कदमों से मेरे तट की ओर चले आए। मैंने उन्हें पहचान लिया , वही बालक, जिसका पहला रुदन मैंने सुना था, अब मेरी ओर अपने अन्तिम चरण बढ़ा रहा था। इस बार मुझे कोई आशीर्वाद नहीं देना था, कोई मार्ग नहीं दिखाना था , मुझे केवल उसे स्वीकार करना था, जैसे धरती ने वर्षों पूर्व सीता को स्वीकार किया था।

जब राम ने मेरे जल में प्रवेश किया, तब मैंने अपने भीतर एक विचित्र पूर्णता का अनुभव किया , मानो एक वृत्त, जो वर्षों पूर्व मेरे तट पर एक रुदन से आरम्भ हुआ था, अब मेरी ही गहराई में मौन होकर पूर्ण हो रहा हो। सीता धरती में समाईं, राम जल में समाए — पृथ्वी और जल, दो मूल तत्त्व, जिन्होंने अपने-अपने सन्तानों को अन्ततः वापस बुला लिया। अयोध्यावासियों में से अनेक ने भी उस दिन मेरे जल में प्रवेश किया, और मैं, जो शताब्दियों से केवल एक साक्षी रही थी, उस दिन प्रथम बार एक सहभागी बनी ,इस सम्पूर्ण गाथा की अन्तिम पात्र।

उस दिन के पश्चात् अयोध्या में जो सन्नाटा फैला, वह किसी अन्य सन्नाटे जैसा नहीं था , यह अन्तिम था। मैंने राजभवन को धीरे-धीरे रीता होते देखा, दरबारियों को तितर-बितर होते देखा, और नगर को उस स्मृति में जीने के लिए छोड़ दिया गया जो अब कभी वर्तमान नहीं बन सकती थी। मैं अकेली रह गई , उस सम्पूर्ण गाथा की, जो कभी उत्सव से आरम्भ हुई थी, अन्तिम और एकमात्र जीवित साक्षी।

एवं स भगवान् रामः सरय्वां जलशायिनाम्। प्रविवेश स्वकं धाम सर्वलोकनमस्कृतम्॥

(भावार्थ) इस प्रकार भगवान् राम ने सरयू के जल में प्रवेश करते हुए, समस्त लोकों द्वारा नमस्कृत अपने स्वधाम में प्रवेश किया।

वाल्मीकि रामायण, उत्तरकाण्ड — भावानुवाद प्रस्तुत

उत्तरकाण्ड के इस अन्तिम प्रसंग की प्रामाणिकता पर शास्त्रज्ञों में मतभेद रहा है; यहाँ भावानुवाद के रूप में प्रस्तुत।



 मेरी चिरन्तर गवाही

आज भी मैं वहीं बहती हूँ। मेरे तट पर नई पीढ़ियाँ आरती करती हैं, दीप जलाती हैं, प्रार्थनाएँ करती हैं , किन्तु वे नहीं जानतीं कि जिस जल को वे पवित्र मानकर स्पर्श करती हैं, उसने कितने जन्म देखे हैं, कितने विसर्जन देखे हैं। मैं उन्हें बता नहीं सकती, क्योंकि नदियाँ भाषा नहीं जानतीं , वे केवल प्रवाह जानती हैं। किन्तु यदि कोई मेरे तट पर मौन बैठकर मेरी धारा की ध्वनि को ध्यान से सुने, तो शायद वह उसमें उन पाँचों क्षणों की प्रतिध्वनि पा सके , एक रुदन, एक विदाई, एक प्राणान्त, एक मौन चीत्कार, और एक अन्तिम समागम।

मैं सरयू हूँ। मैं न्यायाधीश नहीं, मैं केवल साक्षी हूँ। मैंने राजाओं को उठते देखा है, गिरते देखा है; मैंने रानियों को स्थापित होते देखा है, विसर्जित होते देखा है। मेरा कार्य निर्णय सुनाना नहीं , मेरा कार्य केवल स्मरण रखना है, ताकि जब भी कोई पूछे कि क्या हुआ था, मेरा प्रवाह उसका उत्तर बन सके। यही मेरी गवाही है, और यही मेरा चिरन्तर धर्म , बहते रहना, स्मरण रखते रहना, और कभी मौन न होना, चाहे शब्द कभी न बोलूँ।

पाठक से एक अन्तिम निवेदन

जब भी आप किसी नदी के तट पर खड़े हों , चाहे वह मैं ही क्यों न होऊँ , एक क्षण रुककर यह स्मरण कीजिए कि यह जल केवल बहता हुआ द्रव्य नहीं, यह शताब्दियों की स्मृति का वाहक है। इसमें उतने ही आँसू घुले हैं जितने उत्सवों के दीप इसमें तैराए गए हैं। सीतायण की यह गवाही इसी स्मरण को जीवन्त रखने का एक विनम्र प्रयास है , कि जब हम अपने पूर्वजों की गाथाएँ सुनाएँ, तो हम उन नदियों, उन वृक्षों, उन भूमियों को भी स्मरण रखें, जिन्होंने चुपचाप, बिना किसी अपेक्षा के, इन गाथाओं को अपने भीतर सँजोए रखा है।

मैं आज भी बहती हूँ। और जब तक मैं बहती रहूँगी, यह गवाही भी जीवित रहेगी , भले ही शब्दों में नहीं, तो अपने प्रवाह की उस अनवरत, अपरिवर्तनीय लय में, जिसे कोई राजभवन कभी अपने अधीन नहीं कर सका।




सीतायण श्रृंखला — कौटिल्य का भारत दैनिक

:राजेन्द्र नाथ तिवारी



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