जब राम ने लोकापवाद पर सीता को त्याग दिया - फिर मंदिर के 'दान चोरी' के दोषियों को क्यों बचाया?

 जब राम ने लोकापवाद पर सीता को त्याग दिया - फिर मंदिर के 'दान चोरी' के दोषियों को क्यों बचाया?

संपादकीय ·

रामराज्य के आदर्श बनाम आज के मन्दिर-प्रबंधन का आचरण





मर्यादा पुरुषोत्तम राम का सबसे कठोर निर्णय वह था, जब उन्होंने एक धोबी के लांछन - मात्र एक लोकापवाद - पर अपनी सर्वाधिक प्रिय, निर्दोष पत्नी सीता को त्याग दिया। यह निर्णय व्यक्तिगत सुख के विरुद्ध और जनता की धारणा के पक्ष में था। राम ने स्वयं कहा था कि राजा का आचरण संदेह से भी परे होना चाहिए, और प्रजा का विश्वास राजा के निजी सुख से बड़ा है। यही रामराज्य की आधारशिला है -जवाबदेही, पारदर्शिता और जनविश्वास सर्वोपरि।

प्रश्न यह है कि जिस राम के नाम पर अयोध्या में भव्य मंदिर खड़ा हुआ, क्या उसका प्रबंधन उसी राम के आदर्श का पालन करता है? अयोध्या के श्रीराम मंदिर में दान-चढ़ावे की चोरी के प्रकरण ने इस प्रश्न को अत्यंत तीखा बना दिया है।

अब तक क्या सामने आया - तथ्यों की समयरेखा?


जांच एजेंसियों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पुष्ट तथ्य निम्न हैं:

13 जून को दान-गणना कार्य से जुड़े दो कर्मचारियों की गिरफ्तारी हुई; एक कर्मचारी लवकुश मिश्रा के घर से लगभग 10 लाख रुपये नकद बरामद किए गए।जांच आगे बढ़ने पर कुल 8 आरोपी गिरफ्तार हुए और लगभग 79.8 लाख रुपये बरामद हुए। राज्य सरकार ने IAS, IPS तथा वित्त विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की एक विशेष जांच दल (SIT) गठित की। ट्रस्ट की बैठक में चंपत राय और अनिल मिश्रा ने 'नैतिक जिम्मेदारी' लेते हुए त्यागपत्र दिया, जिसे स्वीकार कर पूर्व IFS अधिकारी कृष्ण मोहन को अंतरिम महासचिव नियुक्त किया गया। जांच का दायरा बढ़ाकर दान-गणना से जुड़े लगभग 50 कर्मचारियों तथा ट्रस्ट के भूमि-सौदों तक विस्तृत किया गया है। ट्रस्ट ने गणना-व्यवस्था में सुधार करते हुए सभी 36 पुराने गणना-कर्मियों को हटाकर अब यह कार्य केवल भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के नियमित कर्मचारियों को सौंप दिया है।

सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रकरण से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए SIT से स्थिति-रिपोर्ट तलब की है और केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार तथा मंदिर ट्रस्ट को नोटिस जारी किए हैं।"राम ने प्रजा के संशय पर स्वयं का सुख त्याग दिया ,पर मंदिर-प्रबंधन आज भी 'बड़े जिम्मेदारों' को कठघरे से बाहर रखे हुए है।"प्रबंधन राम को पूजता है, राम के निर्णय को नहीं


यहीं वह विरोधाभास उभरता है जो इस संपादकीय का मूल स्वर है। एक समाचार-पत्र की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रस्ट की बैठक में हुई चर्चा में पूरा दोष बैंक की प्रक्रियागत लापरवाही पर मढ़ दिया गया, जबकि न्यासी मंडल के अपने बड़े जिम्मेदारों की भूमिका पर कोई प्रश्न नहीं उठाया गया — मानो चोरी केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित थी।

यह वही मंदिर-प्रबंधन है जो हर प्रवचन और हर उद्घोषणा में राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहकर पूजता है। परंतु मर्यादा केवल भाषण की वस्तु नहीं, आचरण की कसौटी है। राम ने प्रजा की इच्छा को अपने पारिवारिक सुख से ऊपर रखा था ,क्या मंदिर-प्रबंधन प्रजा (श्रद्धालुओं) की जवाबदेही की मांग को अपनी संस्थागत साख से ऊपर रखने को तैयार है, या केवल दो त्यागपत्रों से जनभावना को शांत कर मूल प्रश्नों को टाल दिया जाएगा?

दूसरा पक्ष — ट्रस्ट एवं प्रबंधन की स्थिति-ट्रस्ट के प्रवक्ताओं और सरकारी सूत्रों का कहना है कि जांच अभी भी अपने अंतिम चरण में है, और स्थिति स्पष्ट होने से पहले किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं।ट्रस्ट के अनुसार 2020 से अब तक मंदिर को लगभग 3,264 करोड़ रुपये का दान-चढ़ावा प्राप्त हुआ है, जिसका पूरा हिसाब-किताब व ऑडिट कराया गया बताया जा रहा है; कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि व्यवस्थित भ्रष्टाचार के आरोप उपलब्ध जांच-तथ्यों से मेल नहीं खाते।

दो शीर्ष पदाधिकारियों — चंपत राय व अनिल मिश्रा — के इस्तीफे और सम्पूर्ण गणना-व्यवस्था को SBI को सौंपने के निर्णय को ट्रस्ट अपनी पारदर्शिता व जवाबदेही के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करता है।

ट्रस्ट का यह भी कहना है कि गणना-प्रक्रिया में बैंक के साथ हुए अनुबंध (MoU) के अनुपालन में वास्तविक चूक हुई, इसलिए बैंक-व्यवस्था पर सवाल उठाना निराधार नहीं है।

सम्पादकीय स्पष्टीकरण

यह प्रकरण अभी न्यायालय व SIT की निगरानी में जांचाधीन है; अंतिम दोष अथवा निर्दोषिता का निर्धारण जांच पूर्ण होने और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही हो सकेगा।

'बड़े जिम्मेदारों को बचाने' और कर्मचारियों को 'संरक्षण मिलने' से जुड़े दावे अनाम जांच-सूत्रों पर आधारित मीडिया रिपोर्टों से लिए गए हैं; इन्हें प्रमाणित तथ्य के बजाय अपुष्ट आरोप के रूप में ही लिया जाना चाहिए।

विपक्षी नेताओं द्वारा लगाए गए राजनीतिक आरोपों को इस संपादकीय में तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है; वे केवल विवाद के राजनीतिक आयाम को दर्शाते हैं।

रामराज्य की कसौटी !


राम की कथा हमें यह सिखाती है कि आदर्श राज्य में जवाबदेही किसी पद, प्रतिष्ठा या निकटता से मुक्त नहीं होती चाहे वह स्वयं की पटरानी ही क्यों न हो। यदि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट सचमुच राम के नाम पर खड़ा है, तो उसे यह सिद्ध करना होगा कि जांच केवल निचले कर्मचारियों पर न रुके, बल्कि हर उस अधिकारी तक पहुंचे जिसकी निगरानी में यह चोरी वर्षों तक चलती रही। अन्यथा 'राम को मानने' और 'राम की मानने' के बीच का यह अंतर मंदिर की साख पर स्थायी प्रश्नचिह्न बनकर रह जाएगा।

— सम्पादकीय, कौटिल्य का भारत दैनिक


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